नील वापस अपने देश लौट रहे थेअपने साथ भारत की अविस्मरणीय यादें समेट। चेहरे पर जॉन से मिलने की खुशी थी तो भारतीय आध्यात्मिकता से दूर होने का बिछोह भी। जहाज में बैठे नील के आगे पूरा दृश्य एक चलचित्र की भांति आ- जा रहा था। उन यादों में कुछ अद्भुत था तो बापू की अहिंसा, जिसमें उनका जीवन दर्शन ही बदल दिया था! सोचो का दायरा विस्तृत होने लगा था। अब चित्रों के माध्यम से समाज को देने के लिए और भी बहुत कुछ मिल गया था।
जहाज जब जमीन के पास आया तो सबसे पहले उन्होंने जिस चेहरे पर ध्यान दिया वह जॉन का था ।काफी खुश था वह ।थोड़ी देर बाद नील जॉन के साथ अपने घर लौट रहे थे।
" कैसा रहा आपका सफर ?"जॉन ने पूछा।
" तुम कैसे थे?" नील पूछा।" याद आती थी मेरी?"
" बताना जरूरी है? क्या आपको इसका एहसास नहीं, क्या आप वहां अकेले खुश थे? नहीं न? फिर मैं कैसे?" नील ने देखा जॉन के शब्द नम हो गए थे ।उन्होंने बात का रुख दूसरी ओर किया।
" तुम नहीं जानते जॉन मेरी भारत- यात्रा मेरे जीवन के लिए कितना सार्थक रहा। जी तो करता था बस वही बस जाऊं। कितनी दिव्यता थी वहां की भूमि में! सच कहें तो जीवन के हलचलो से दूर एक आत्मिक अनुभव जहां भौतिकता से दूर वहां का सब कुछ कुछ पावन... बिल्कुल तुम्हारी तरह। जिसने मुझे अंदर तक आल्हादित किया और उनमे ं जो सबसे महत्वपूर्ण चीज मैंने पाई वह थे --बापू और अहिंसा !"
"ये बापू क्या होता है सर?"
" बापू अर्थात फ़ादर, यानी पिता, यानी आस्था, एक श्रद्धा जिसने पूरे इंडिया को एक सूत्र में जोड़े रखा है। पूरा भारत उन्हें अपना पिता मानता है। त्याग की प्रतिमूर्ति हैं वे। पूरे बदन पर सिर्फ एक कपड़ा लपेटे साक्षात देवत्व की अनुभूति कराते हैं वे।.".. महात्मा गांधी की विशेषताएं बताते उनके चेहरे पर अद्भुत जोश दिखाई पड़ रहा था।
"और सर अहिंसा क्या होती है ?"
"अहिंसा यानी.... नील को जैसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल पा रहे थे।... यानी देवत्व ...यानी ...प्रेम ...सत्य दया... और मानवीयता का निचोड़ ..जो सारे धर्मों का मूल है!... जिसका प्रयोग हमें परमात्मा के समकक्ष खड़ा कर देता है। अहिंसा... यानी जीसस!"
जॉन हैरत से नील को देख रहा था।
" और हमें भी इसे आत्मसात करना होगा जॉन तभी हम इस विश्व को कुछ देख सकते हैं। तभी हमारा जीवन सार्थक है। तभी इस जीवन के मायने हैं। तुम समझ रहे हो ना जॉन?"
जॉन ने उनके हाथों पर अपना हाथ रख दिया जैसे उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हो ।
नील का घर आ चुका था ।जॉन ने उनके लिए कॉफी बनाई और उनके पास बैठ गया।
"तुम्हारी पढ़ाई जॉन?" नील ने पूछा।" प्रतिदिन होती थी कि नहीं ?"
"हां सर, उस ने आश्वस्त किया। और आपको पता है पूरे स्कूल में मेरे सबसे अच्छे मार्क्स आए हैं और आगे की पढ़ाई के लिए मुझे स्कॉलरशिप मिलने वाला है।"
"ओह जॉन!" नील ने उसका माथा चूम लिया ।"आज तुमने मेरे विश्वासों को और भी बल दे दिया ।तुमने साबित कर दिया है कि जिन आकांक्षाओं के लिए मैंने तुम्हारा चयन किया उसे तुम पूरा कर दिखाओगे। जहां मैं तुम्हें देखना चाहता हूं उस ऊंचाई को तुम जरूर छू लोगे"
समय के साथ जॉन अपने आगे बढ़ने की क्षमता को और भी मजबूती प्रदान करता रहा और नील तो उसके साथ थे ही, उसकी प्रेरणा स्रोत। उसे और उसकी महत्वाकांक्षा ओं को सहारा देते चाहे वह सहारा शब्दों का हो या फिर पैसों का। भारत भ्रमण के बाद नील ने जो वैचारिक अनुभव समेटे थे, उन्हें वह चित्रों में ढालना चाहते थे। जिसके लिए उन्होंने अपने साथी चित्रकारों और छात्रो की मदद ली। अब उनका ज्यादातर समय उन्हीं के साथ बितता ।वे अपना विचार, अपना रेखांकन उन्हें बताते जिससे कि उनके विचारों की अभिव्यक्ति की सशक्तता में कोई कमी न रह जाए ।उनके साथी चित्रकार ,उनके छात्र उनकी बातों को तल्लीनता से सुनते ।नील अपने स्टूडियो में इतना मगन हो गए थे कि जॉन भी उनसे विस्मृत हो जाता ।वह उनसे मिलने आता है उन्हें पेंटिंग में मगन देखता और चला जाता। हां उनके छात्रों से उसकी जान-पहचान जरूर हो गई थी। वे लोग उससे नील का सगा मानते ।
नील की व्यस्तता आज कई दिनों बाद खत्म हुई थी ।चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे ।उनका कार्य जो पूरा हो चुका था ।
सामने जॉन बैठा था ,उपेक्षिता सा।
" क्या हुआ जॉन?" नील ने पूछा ।"तुम इतने उदास क्यों हो?"
" कुछ भी तो नहीं सर, बस ऐसे ही। उसने रुखा सा जवाब दिया ।
नील उसकी यह तब्दीली कई दिनों से महसूस कर रहे थे। नन्हा जॉन अपने विचारों के साथ उम्र में भी बड़ा होता जा रहा था और नील के अथाह प्रेम ने उसे थोड़ा जिद्दी बना दिया था ।नील को वह अपने उद्देश्यों से भटकता प्रतीत हो रहा था। लेकिन उसे वह प्रत्यक्ष नहीं करना चाहते थे ।
"सर, मैं जाऊं ?"उसने पूछा।
नील को उसका व्यवहार आहत कर रहा था ।उन्होंने उसे रोका नहीं। वह कोई गीत गुनगुनाता चल पड़ा।
एलिस जॉन की मित्र और नील की छात्रा थी ।अगर एलिस आज कला जगत में विकास की सीढ़ियां चढ़ रही थी तो इसमें नील का ही योगदान था। उसके साथ जॉन का आकर्षण नील के स्टूडियो से ही हुआ था। अपने चित्रों के सिलसिले में वह नील के घर भी आती- जाती रहती । हिरनी सी चंचल, स्वच्छंद, गहरी नीली आंखों वाली जिस पर सुनहरे बाल खूब फबते थे। वह चित्र बनाती तो उसकी तल्लीनता,उसका समर्पण देखते ही बनता था ।और यही कारण था कि नील के अन्य स्टूडेंट्स से काफी आगे निकल गई थी ।जॉन का ज्यादातर समय अब उसी के साथ गुजरता था।
जॉन काफी दिनों बाद आज नील के पास आया था। वे आहत तो काफी थे जॉन के इन दिनों के बदलाव से पर उन्होंने खुद को संयमित रखा।
" कहां थे जॉन इतने दिनों तक?" उन्होंने पूछा ।
उसे कोई उत्तर देते नहीं बना।"बस ऐसे ही इन दिनों काफी व्यस्त था।" अचानक उसने सपाट सा उत्तर दिया ।
नील को उसके एक-एक शब्द चुभते से प्रतीत हो रहे थे। उन्होनें दोबारा कुछ न पूछा।
" तुम एलिस के साथ थे ना?" अचानक वे बोले ।यही थी तुम्हारी व्यस्तता?" जॉन को ऐसा लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।
" क्यों झूठ कहा तुमने जॉन?"
" आप की तसल्ली के लिए सर ।"उसने बताया। जॉन को महसूस हो रहा था कि नील उसके इस व्यवहार से दुखी हैं।
" मेरा इरादा आपको दिल दुखाना नहीं था सर ,यह बात अलग है कि मैंने आपसे झूठ बोला। पर यह भी वास्तविकता है कि मैं आपसे दूर नहीं हूं ।नहीं रह सकता आपके बिना!"
" फिर झूठ!" जॉन तुम जाओ ।"अचानक नील की आवाज तेज हो गई। जॉन ने उन्हें नाराज देखा तो मनाने की कोशिश की पर भी कुछ ना बोले।
अंदर जाकर उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया। जॉन कुछ देर तक इंतजार करता रहा फिर वापस चला गया।
नील को लगा उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। वह बाहर आए। उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था। उन्हें लगा वे गलत है ---"यह मेरा अन्याय ही तो है उसके प्रति !आखिर उसका अपना भी वजूद है, वह भी तो स्वतंत्र है अपना जीवन जीने के लिए ।मैं क्यों बांधना चाहता हूं उसे ।उसे जिम्मेदार बनाने के चक्कर में खुद की जिम्मेदारियां क्यों भूलता जा रहा हूं। उसके बालमन के आगे खुद बाल- सुलभ हरकतें कर बैठा। अत्यधिक चाहत या अपनत्व में यही होता है शायद ।उसकी ज्यादा नज़दीकियां पाकर मैं कुछ ज्यादा ही स्वार्थी होता जा रहा हूं। मैंने उसे डांटा, दुखी किया उसे। पर वह क्यों ऐसा करता है मेरे साथ! वह तो जानता है मुझे? पता है उसके बिना मेरा एक एक पल कैसे गुजरता है। फिर भी इतने दिनों तक दूर! हां जान तुम गलत मत समझना मुझे ।कुछ ऐसा जुड़ाव ही हो गया है तुमसे कि बिना तुम्हारी खुद की कल्पना ही नहीं कर पाता।"
सोचते नील की उदासियां बढ़ती ही जा रही थी ।उन्हें लगा वे कुछ भी निश्चय नहीं कर पाएंगे। आंखें बंद कर वे सोफे पर धम्म से बैठ गए। जॉन के विरुद्ध होकर भी वे जॉन के पक्ष में अपने विचारों को समेट रहे थे। और इस विरोधाभास का प्रभाव उनके चेहरे की पेशियां व्यक्त कर रही थी।
"एलिस आज सर ने मुझे डांटा !"जॉन की आवाज भर्राती जा रही थी।" तुम सुन रही हो ना ?"
एलिस समझ नहीं पा रही थी जॉन क्या कहना चाहता है। वह उसके चेहरे को गौर से देख रही थी ।
"क्यों जॉन?" उसने पूछा।" जहां तक मैं जानती हूं तुम उनके सबसे ज्यादा करीब हो, फिर उन्होंने क्यों डाँटा?"
" वह नहीं चाहते मैं उनसे दूर रहू।ऐसा लगता है जैसे मैं बँध सा गया हूं। खुद के लिए कुछ सोच ही नहीं पाता। क्या जरूरी है मैं खुद जीवन उनके अनुसार जीऊं ?क्या ये उनका मेरे ऊपर नियंत्रण नहीं है ?"
उसके शब्दों में बेबसी थी ।वह आश्चर्य से जॉन को देख रही थी। वह जानती थी जॉन जो कुछ भी कह रहा है वह गलत है। जॉन के प्रति नील की संवेदनाएं वह समझती थी। एलिस को आश्चर्य हो रहा था इस जॉन की इस प्रतिक्रिया पर।
"जॉन तुम्हें पता है तुम किस के विषय में कह रहे हो? क्या तुम्हें लगता है कि वे तुम्हें बांधना चाहते हैं ?"नहीं जॉन ।अगर ऐसा होता तो आज जो कुछ भी तुम हो या फिर मैं जो कुछ हूं वह नहीं होता ।तुम पीछे जाओ और खुद को देखो कहां होते तुम। मैं मानती हूं तुम मे योग्यता थी, पर तुम चूक रहे हो ..कुछ महान... कुछ रहस्यात्मक... क्योंकि हमें अपनी गहराइयों के विषय में तभी पता चलता है जब दूसरा कोई उसे छूता है। किसी दूसरे के द्वारा तुम खुद के अंतस के बारे में सचेत होते हो। किसी दूसरे के द्वारा ही हम खुद को खोज पाते हैं। वे तुम्हें..... वे तुम्हें ... ऊंचाई पर देखना चाहते हैं जान।" एलिस के शब्दों में दृढ़ता थी ।
जॉन को लगा एलिस ने उसे सोते से जगा दिया हो।
"क्या वे मुझे माफ कर देंगे ?"जॉन ने पूछा।
" तुम्हें अगर ऐसा नहीं लगता तो मैं बात करूंगी जॉन ।एलिस ने सांत्वना दी। क्योंकि "वे" तुम्हारे लिए बहुत जरूरी है !यह मैं भी जानती हूं तुम्हारी खुशियों के लिए तुम्हारे जीवन में उनका सामंजस्य जरूरी है ।"
एलिस नील के यहां चल पड़ी।