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बह गए बाढ़ में जो. .

17 जुलाई 2019

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बह गए बाढ़ में जो. .

कुछ दिन तो ठहरो प्रियतम!
मत आना मेरे सपनों में,
मैं ढूँढ़ रहा हूँ तुमको ही,
'दरभंगा' के डूबे अपनों में.. '

' कोसी' में डूबे कुछ अपने,
कुछ 'ब्रह्मपुत्र' की भंवरों में,
कुछ 'बागमती' से दरकिनार,
कुछ 'घाघरा' की लहरों में..

मैं यह कह कर के आया था,
लौटूंगा, सुनो! दशहरे में,
मुस्का कर विदा किया सबने,
आशा थी सबके चेहरे में..

पर आज प्रलय के इस पल ने,
मुझको पहले ही बुला लिया,
मेरी आँखों के आगे ही,
"प्रलयंकर" ने उनको मिटा दिया..

कुछ दिन श्रृंगार रहित कर दो,
कुछ दिन तो मनाओ शोक पिए!
तेरह दिन तो हो जाने दो,
इस बाढ़ की याद न आये हिये..

—प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा की अन्य किताबें

प्रियंका शर्मा

प्रियंका शर्मा

बहुत ही भावुक कविता उनके लिए जिन्हे हम जानते तो नहीं पर अफ़सोस होता है इनके लिए और कुदरत की इस कठोर सज़ा पर !

18 जुलाई 2019

रेणु

रेणु

आदरणीय सर -- मन के कसकते भावों में पिरोई गई इस मार्मिक रचना के लिए निशब्द हूँ |! बाढ़ में कोई इन्सान नहीं अपितु किसी के अनगिन सपने भी साथ बह जाते हैं | सादर प्रणाम और आभार

17 जुलाई 2019

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कुछ तुम से ...

22 मार्च 2018
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मैं शायर नहीं मगर तुमने सबको मेरी ग़ज़लें सुना दिया , कुछ फूल चढ़ाकर पत्थर पे क्यों मुझे देवता बना दिया ?

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पहला अधिकार

23 मार्च 2018
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संघर्षों के गंभीर अरण्य में, जब खुद को तुम एका पाओ ,तब याद किसी को करने का पहला अधिकार मुझे देना .....दरवाज़े पर बन कर भिक्षुक जब मृत्यु , अटल सी खडी रहे, तब दान - दक्षिणा देने का पहला अधिकार मुझे देना. ...अंतिम शय्या कैसी भी

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जीवन गति

24 मार्च 2018
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कुछ मेरी बात सुनो तुम भी , कुछ अपनी मुझसे कहने दो,है जीवन कहने सुनने का बहती साँसों को बहने दो...क्या जाने कब रुक जाएँगी बहती साँसों की धाराएँ,बाँटो दुःख-सुख, मिल करके सबदुनिया लड़ती है, लड़ने दो. ...

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मीठा झगड़ा (बच्चों के लिए)

24 मार्च 2018
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अकड़ के बोली गोल जलेबी, मुझसा कौन रसीला ?मुझको चाहे सारी दुनिया, गाँव, शहर, क़बीला .... रबड़ी बोली , चुप कर झूठी! मुझको क्या बतलाती , मुझको पाकर सारी दुनिया, बर्तन चट कर जाती ....काला जाम हंसा हो हो कर, नहीं मिसाल हमारी, जिसका काला रंग हो उसपर, मरती दुनिया सारी. .....

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कन्या -रत्न (प्रथम अंश )

25 मार्च 2018
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मेरे क्षण को मत बांधो तुम , उन्मुक्त हवा में उड़ने दो दूषित हो रही प्रेम-भाषा , मुझे चंद्र-सूर्य को सुनने दो.....भीगे पत्तों के चादर पर, खेलती रश्मि मुस्काती सी ,पापा के कहने पर वैसे, जागे बिटिया अलसाती सी ...माथे का काजल फैला है, पर दांत दूध के खिले हुए, मन में निद्रा का है उमंग, थोड़े सपने अ

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एकाकी

26 मार्च 2018
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कुछ भी न सार्थक जीवन में, मैं बंधा हार के बंधन में, करबद्ध व्यर्थ ही खड़ा रहा मंदिर के सूने प्रांगण में. ...स्वार्थ व्यर्थ, परमार्थ व्यर्थ ,अवरुद्ध हुआ चीत्कार व्यर्थ, मैं दीन , दलित सा खड़ा हुआ अर्चना व्यर्थ, प्रार्थना व्यर्थ. ...अपने ही पैरों को छूकर आशीष दे रहे हाथ

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मिला तुम करो ....

31 मार्च 2018
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कई बार देखा है मैंने तुम्हे, ख़ुशी होती है देख कर बार बार .......महीने में अक्सर मिला तुम करो, मेरी सैलरी मेरी जाने बहार ......

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अंतर्मन से

2 अप्रैल 2018
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जो तुमने सुनी, सुनी. ..न सुनी. .मेरे अंतर्मन की पीड़ा थी .... अनवरत कह रहा हूँ गाथा, पुष्पों को छंदों में बांधे, हूँ थका हुआ, नहिं सोया मैं पलकों से अंजलि दे दे कर ... मेरे शब्दों में छद्म नहीं मिटटी में मिलावट क्या होगी ?अस्

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अलोकाभास

4 अप्रैल 2018
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तुम दबे रहे पन्नों के पीछे जाने कब तक मेरे साथी,तुम साथ चले मेरे चिंतन में हो साथ नहीं फिर भी साथी. ..मैं व्यक्ति मगर, मैं व्यक्त नहीं गूँगा हूँ खुद को कहने में, कल-कल कर बहता ही रहता बिछड़ा जल जैसे बहने में. ...जाने कितने सुरभित पल, क्षण मुस्कान मार कर चले गए,

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हे पिता !

6 अप्रैल 2018
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मेरी कविता " हे पिता ! " के कुछ अंश ....तुमने कितना कुछ दिया मुझेमैं तुमको क्या दे पाउँगा,जन्मों जन्मों तक जनक मेरे ! मैं याचक बन कर आउंगा. कितनी मन्नत, कितनी पूजा,कितनी कामना किया होगा,पुत्रों का पथ हो निष्कंटकपल पल आशीष दि

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अमावस्या की रात

20 अप्रैल 2018
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अमावस्या की रात भली लगती है. ..कलुषित कला, काली करतूतें ,कुलटा कमनीय, कोकिला क्रंदन, कठोर कपूत, कॉकटेल, कुंदन केशवानंद का कामदेव पूजन. ....शायद इसी से मर्यादा बनती है. .. अमावस्या की रात भली लगती है. ....आधारित जनसंख्या निराधार रोग, मोक्ष पाने का शायद यही संयोग. ..चक्षु न

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झुर्रियाँ (एक ग़ज़ल)

1 मई 2018
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झुर्रियां झुर्रियां चेहरे पे मेरी शान हैंये तजुर्बे की मेरी पहचान हैं.. वक़्त ने कितने थपेड़े जड़ दिए,हर शिकन गुजरे हुए पैगाम हैं... खिलखिलाती धूप दिखती है मगर,पर्त के नीचे अंधेरी शाम हैं.... आँख मूंदी तो लकीरें दिख गयीं,नेकनामी हैं, कहीं

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कविता

6 मई 2018
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कविता..... कविता ! तू मेरे मन की कसकतू है उमंग अरमानों की,शब्दों में तरल तरंगित होबहती दिल में, दीवानों की....कभी टीस ह्रदय की बन करके उद्वेलित करती मन, विचार,कभी करुणा, दया, स्नेह लेकरबिखराती स्नेहिल, मृदुल प्यार...कभी रौद्र रूप, कभी घ्रणित भेष,कभी वीर शब्द के चमत्कार,कभी शांत कभी, श्रृंगार कभी कभी

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पचपन का यौवन (हास्य)

10 मई 2018
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पचपन का यौवन दाढ़ी जब से सफ़ेद है मेरी , हुस्नवालों ने आँख है फेरी ....कैसे बतलाऊं इनको, कैसा हूँ ,यारों ! मैं नारियल के जैसा हूँ ...हाथ में ले के मुझको तोड़ो तो !मेरे अन्दर गिरी को फोड़ो तो !कितना समझाया इन हसीनों को ,ठीक करता हूँ मैं मशीनों को ....एक बोइंग सा हाल है मेरा , दिल अभी भी कमाल है मेरा .

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माँ ! तुम होतीँ जो आस पास. ..

13 मई 2018
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माँ ! तुम होतीं जो आस पास... जीवन की गाथा में उलझा,जब सोच सोच कर थक जाता,तेरे आँचल में मैं सो जाता...माँ तुम होतीं जोआस पास.. इनकी उनकी कटु वाणी सुन,जब व्यथित ह्रदय मेरा होता, कुंठितमन लिए लौटता घर,तुम हाथ मेरे सर पर रखतीं,मन पुनः प्रफुल्लित हो जाता.....माँ ! तुम होतींजो आस पास... इतना जीवन आराम मगर

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पढ़ो, न पढ़ो. ..

3 जून 2018
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तुम मुझको पढ़ो, पढ़ो न पढ़ो, मैं तो बस लिखता जाऊँगा. .. तुम आगे बढ़ो, बढ़ो न बढ़ो, मैं राह बनाता जाऊँगा. ..अभिव्यक्ति मेरी , अंदाज़ मेरे , मिलते तो किसी से होंगे ही, तुम राह बदल कर चल भी दो, मैं तुम्हे ढूंढता आऊँगा. ..यदि कभी भूल कर भी

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शक्ति-हींन राम

18 जून 2018
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कल शाम सीता का पति राम गंदी गलियों से गुज़रता चला आया रावण के पास और बोला-- हे रावण !सीता का हाथ थाम और कर मेरे कुछ खाने का इंतज़ाम ........हे रावण ! ऋषि-मुनि भी हमें अब सताते हैं

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अग्नि परीक्षा का अभिशाप

31 जुलाई 2018
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अग्नि-परीक्षा का अभिशापकापुरुष हैं बात करते, नीचता से जिस तरह,राम ! तुम क्यों कर रहे हो, बात मुझसे उस तरह.वीर हो तुम, वीरता है बस तुम्हारे तीर में,तुम नहीं समझोगे शक्ति, जो बंधी इस चीर में.प्रश्न पूँछूँ मै अगर, तुम भी अकेले थे यहाँ,अपने शुचिता की परीक्षा, तुमने किसको दी, कहाँ?अर्धांगिनी कहकर मगर दास

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भैस

25 अगस्त 2018
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भैंस “अकल बड़ी या भैंस” सुना जब, मेरा मन चकराया,भैंस देखने के खातिर मैं, बड़े तबेले आया.कामराज सा रंग, अंग बैंगन सा सुन्दर पायागाय लगे गोरी, शायद इसलिए श्यामली काया.कमसिन, कठिन कमर, कर कोमलमूक, मगर विचलित होंठों के दलअर्ध-वृत्त में मुड़ी दो सींघेंतैल-लिप्त, चमकाती तिल-तिलभाव-हीन, पगुराता चेहरास्नेहिल,

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बंधे बंधे से साथ चलें

14 जुलाई 2019
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बंधे बंधे से साथ चलें ...मैं अक्षर बन चिर युवा रहूं, मन्त्रों का द्वार बना लो तुम,हम बंधे बंधे से साथ चलें, मुझे भागीदार बना लो तुम.जीवन की सारी उपलब्धि, कैसे रखोगे एकाकी? तुमको संभाल कर मैं रखूँ, मेरे मन में जगह बना लो तुम.कोई मुक्त नहीं है दुनिया में, ईश्वर, भोगी या संन्यासी,प्रिय! कैसे मुक्

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तुमसे हे पिता

14 जुलाई 2019
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पिता पर लिखी अपनी एक बहुत पुरानी रचना याद आ गयी..कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ.."तुमसे हे पिता !"कितनी मन्नत कितनी पूजा,कितनी कामना किया होगा,पुत्रों का पथ हो निष्कंटक पल पल आशीष दिया होगा...मेरे लिए कभी तुमने रूखी सूखी रोटी खायी ,दरदर भटके मेरी खातिर संचित की पाई-पाई .

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इस्तीफा

14 जुलाई 2019
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कांग्रेस में बढ़ते इस्तीफे का चलन देखकर मेरी पत्नी का शौक चर्राया.. और उसने कुछ लिख कर एक कागज़ का टुकड़ा मेरी तरफ बढ़ाया .."चालीस साल तक तुम्हारे साथ रहने के बाद तुम्हारी जवानी खो जाने की ज़िम्मेदारी ले रही हूँ,और इसीलिए "गृहणी " के पद से इस्तीफा दे रही हूँ."बेबस कांग्रेस की तरह मैंने भी चारो तरफ नज़र

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बह गए बाढ़ में जो. .

17 जुलाई 2019
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बह गए बाढ़ में जो. . कुछ दिन तो ठहरो प्रियतम! मत आना मेरे सपनों में, मैं ढूँढ़ रहा हूँ तुमको ही, 'दरभंगा' के डूबे अपनों में.. '' कोसी' में डूबे कुछ अपने, कुछ 'ब्रह्मपुत्र' की भंवरों में,कुछ 'बागमती' से दरकिनार, कुछ 'घाघरा' की लहरों में..मैं यह कह कर के आया था, लौटूं

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दुर्गा ! तेरे रूप अनेक. .

18 जुलाई 2019
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दुर्गा! तेरे रूप अनेक - माँ दुर्गा, भिक्षा लेकर केलौटी माटी के प्रांगण में,आधे से ज़्यादा शेष हुएचावल उसके, ऋण-शोधन में…बाक़ी जो बचे हुए उससेकैसे पूरा होगा, गणेश !कार्तिकेय भूख से बिलख रहागांजा पीकर बैठे महेश…इतने अभाव की सीमा मेंलक्ष्मी, सरस्वती भी पलती है,दुर्गा आँसू

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एक ग़ज़ल --बेवफाई

24 जुलाई 2019
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एक ग़ज़ल: बेवफाई मैंने भी इक गुनाह, यहाँ आज कर लिया,बाहों में भर के उनको, तुम्हे याद कर लिया..फिर से हुयी है दस्तक, कहीं पर ख़याल की,जाकर के दिल ने दूर से, फिर दर्द भर लिया..माजी की खाहिशें हैं, ये भूलती नहीं,गुज़रा हुआ था वक़्त, गले फिर से मिल लिया...शायद खड़े थे तुम वहां

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कारगिल शहीद के माँ कीअंतर्वेदना

26 जुलाई 2019
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कारगिल शहीद के माँ की अंतर्वेदना :-यह कविता एक शहीद के माँ का, टीवी में साक्षात्कार देख कर १९९९ में लिखा था ...२० वर्ष बाद आप के साथ साझा कर रहा हूँ:हुआ होगा धमाका,निकली होंगी चिनगारियाँ बर्फ की चट्टानों पर फिसले होंगे पैर बिंधा होगा शरीर गोलियों की बौछार से ...अभी भ

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तुम्हारी आँखें--

30 जुलाई 2019
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तुम्हारी आँखें-- (यदि दान करो तो !)किसी ने देखा माधुर्य तुम्हारी आँखों में, कोई बोला झरनों का स्रोत तुम्हारी आँखों में..कोई अपलक निहारता रहा अनंत आकाशतुम्हारी आँखों में,कोई खोजता रहा सम्पूर्ण प्रकाश तुम्हारी आँखों में...कोई बिसरा गया तुम्हारी आँखों में कोई भरमा गया तुम्हारी आँखों में...किसी के लिए

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शहादत की रूह

5 अगस्त 2019
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सुबह की ग़ज़ल --शाम के नाम आज़ाद होने के बाद से भारत के शहीदों की शहादत सबसे अधिक कश्मीर से जुड़े इलाकों में हुयी है. उन शहीदों की रूहें आज तक घूम घूम कर पूरे भारत के लोगों से गुहार कर रही हैं कि तिरंगे का केसरिया रंग कश्मीर के केसर से मिलाओ. शहीदों की यादें सब को छू कर गुज़रती हैं...बड़ी सुनसान राहें हैं

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निगाहें ढूँढ़ लेती हैं

13 अगस्त 2019
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--निगाहें ढूँढ़ लेती हैं हमारे दिल की बदनीयत , निगाहें ढूढ़ लेती हैं,जो ढूँढों रूह को मन से, निगाहें ढूढ़ लेती हैं.भरी महफ़िल हो कितनी भी, हों कितने भी हँसी चेहरेमगर बेबाक शम्मां को , निगाहें ढूँढ़ लेती हैं. ..कोई भी उम्र ढक सकती नहीं, माजी की तस्वीरेंतहों में झुर्रियों के भी, निगाहें ढूँढ़ लेती हैं

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हिन्दी दिवस के अवसर पर

14 सितम्बर 2019
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हिंदी दिवस के अवसर पर :-"ह" से "ह्रदय" ह्रदय से "हिंदी", हिंदी दिल में रखता हूँ,"नुक्ता"लेता हूँ "उर्दू" से, हिन्दी उर्दू कहता हूँ..शब्द हो अंग्रेज़ी या अरबी, या कि फारसी, तुर्की हो,वाक्य बना कर हिन्दी में, हिन्दी धारा में बहता हूँ..हिंदी-ह्रदय विशाल बहुत है, हर भाषा के शब्द समेटे,शुरू कहीं से करूं

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पानी

17 नवम्बर 2019
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पानी:- नमी ज़िंदगी में नहीं अब रही है,बहुत खुश्क, बेदम, हवा बह रही है,“अगर प्यार करता है बच्चों से अपने बचा ले तू पानी”, फिजा कह रही है..नहीं काम आयेगा रुपया या पैसा,गला कर इन्हें तू न पी पायेगा,बदन में हुयी गर कमी पानी की तोऐ मरदूद ! जीवन न जी पायेगा..न बर्बाद कर पानी की बूंद कोई,न नदियों को बदहाल

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सुतहीन करो इस धरती को

30 नवम्बर 2019
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सुतहीन करो इस धरती को.. दग्ध देह, धर्षित शरीर,जलता चमड़ा, वह मूक चीख,मानव कितना कायर है रे !पुरुषत्व, नपुंसक का प्रतीक..जो पुरुष नृशंस हुआ कामीअब शब्द नहीं उसका निदान,अब तर्क-वितर्क नहीं कोईहे भीड़ ! हरो सत्वर वो प्राण...अब नष्ट करो वह पापात्माजो मानव को ना पहचाने,अधिका

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वर्ष की अंतिम बेला

31 दिसम्बर 2019
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अंतिम संध्या, अंतिम बेला,अंतिम किरणों का अन्त्य गीत,अंतिम पल का यह अंतर्मनअंतिम पुकार देता, हे मीत !अंतिम धारा, अंतिम प्रवाहअंतिम कलरव, अंतिम है कूकअंतिम बंधन में बाँध रखोधडकन की अंतिम ह्रदय-हूक.अंतिम है दृश्य-पटल, यह नाट्यअंतिम दर्शक, अंतिम समूह,अंतिम का अंत न कर देनाअंकित कर लो यह छवि दुरूह.अंतिम

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