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अब गीत सुनाता हूँ

19 सितम्बर 2015

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उम्र की इस ढलान पर
भीतर भावों का उद्वेलन है

पर बाहर निश्चेष्टता,

वर्तमान में बन्द हो गए हम ।

अतीत भूला-भूला सा है

भविष्य का पता नहीं

सब कुछ धुंधला सा शब्दहीन,

स्पन्दनहीन मृतप्राय है ।

अब गीत सुनाता हूँ लिखता नहीं,

न जाने कितने विगत के चित्र

आँखों के सामने उभरते हैं

मिटते हैं पर उन्हें- कैनवस पर उतार नहीं पाता ।

अन्दर ही अन्दर,

समय-समय पर जाने कितनी बार

रंगमंच का परदा उठता है, गिरता है

कितने ही दृश्य बदलते हैं,

पर इस रंगमंच के नाटक का

अंतिम पटाक्षेप कब होगा- पता नहीं...


-चारुचन्द्र द्विवेदी

बाजर बेलीगंज रायबरेली।

उषा यादव

उषा यादव

उत्कृष्ट रचना !

19 सितम्बर 2015

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नीर से उदित...

2 सितम्बर 2015
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नीर से उदित,नीर में विलीन असंख्य उर्मियों को देखा है तुमने। समय की सिकता पर शब्दों के अशेष सलनाओं को टांका-सिया है तुमने। ऋतुओं के रथ पर सुनहरी-रुपहली रेशमी रश्मियाँ उतारी हैं तुमने। मीमांसा-अभिवेगों के सुरभित शुक्तिज शशि-मणिकों को कविता माना है हमने।

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नीड़

2 सितम्बर 2015
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कभी इसके नाम, कभी उसके नाम...

7 सितम्बर 2015
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हर दिन उगता है सूरज,कभी इसके नाम, कभी उसके नाम; हर दिन गाते हैं पंछी, कभी इसके नाम, कभी उसके नाम. नदियां करती हैं कल-कल... भौंरे गाते हैं गुन-गुन, हवा बहे, कहे सुन-सुन-सुन, तू प्यार की मीठी-मीठी धुन, ये सोनी सुबह, सिन्दूरी शाम, कभी इसके नाम, कभी उसके नाम. बहुत हुआ,उठ, अब तू चल, बीत रहा है, एक-एक पल,

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माँ सरस्वती वन्दना

9 सितम्बर 2015
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वीणा-वादिनी विद्या-वर दो,वीणा-वादिनी विद्या-वर दो, तिमिर ह्रदय का दूर करो माँ; जीवन-पथ तुम जगमग कर दो, वीणा-वादिनी विद्या-वर दो.......... तेरे उपवन की हम कलियाँ फूल बनाकर हमको खिला दो, हम हैं नन्हें-नन्हें दीपक ज्ञान ज्योति माँ इनमें जगा दो, तिमिर ह्रदय का दूर करो माँ, जीवन-पथ तुम जगमग कर दो वीणा-वा

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कुछ अपडेट नहीं किया है!

9 सितम्बर 2015
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क्या बात है...आपने कई रोज़ से कुछ अपडेट नहीं किया है! क्या कहूँ,गुज़रते वक़्त ने भी तो, कब से..................... मुझे डेट नहीं किया है. लम्हे लेकर जाते थे मुझको, शाम-सवेरे, हंसी-ख़ुशी की दावत पर. झट से हाँ कर देते थे, मेरी खट्टी-मीठीचाहत पर ।गए थे लम्हे इतना कहकर, रुको ज़रा बस आते हैं, यही अदा है इनकी

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लिख गए गीत...

15 सितम्बर 2015
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दो-अस्तित्व मिले,बन गए मीत; मृदुहास्य खिले, लिख गए गीत... न मुख, वदन, न वसन सौरभ था वो अम्बक का, स्पर्श किया था स्पंदन उठती-गिरती लहरों का । शल्लिका छलकी जाती थी प्रेम-प्रतीति की श्लाघा की, हम-संग लांघते थे सलिला, जीवन की हर बाधा की । नि:शब्द निरखती सारी बातें निष्प्राण पड़े हैं सारे स्वप्न अंतर्गति

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गति

15 सितम्बर 2015
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सूरज,चाँद-सितारे सकल राशियाँ नक्षत्र-नीहारिकाएं; सब चले जा रहे अपनी गति से, और यूं ही चलते अपनी मति से । कुछ अच्छा करने की इच्छा है, तो यह समय बड़ा ही अच्छा है । सुन्दर-सुरम्य-स्वर्णिम अवसर, आते-जाते रहते नित बदल वेश शुभ मुहूर्त तो हर क्षण अशेष; फिर क्यों न करें हम श्रीगणेश !

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अब गीत सुनाता हूँ

19 सितम्बर 2015
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उम्र की इस ढलान परभीतर भावों का उद्वेलन है पर बाहर निश्चेष्टता, वर्तमान में बन्द हो गए हम । अतीत भूला-भूला सा है भविष्य का पता नहीं सब कुछ धुंधला सा शब्दहीन, स्पन्दनहीनमृतप्राय है । अब गीत सुनाता हूँ लिखता नहीं, न जाने कितने विगत के चित्र आँखों के सामने उभरते हैं मिटते हैं पर उन्हें-कैनवस पर उतार नह

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गेंद

22 सितम्बर 2015
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बच्चे ने हरी-भरी सुन्दर-सजीली गेंद से खेलते-खेलते धीरे-धीरे कुतर दिया उसे। उधेड़ कर परत-दर-परत देखना चाहता था उसे तह तक। या फिर कौतूहल में उतारता गया रंगों की पपड़ियाँ इसकी। अब असंतुलित हो गई है, रंग उधड़ गया है इसका। कुरूप हो गई है अब; जीवन से भरी उछलती थी अब तक..... अब ठहर सी गई है। बच्चा निहारता है

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लिखो कोई नई कहानी...

9 अक्टूबर 2015
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मिलोगे ना...?

10 अक्टूबर 2015
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मुखौटे

14 अक्टूबर 2015
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बिटिया पढ़ती है पढ़ने दो

14 अक्टूबर 2015
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हिन्दी देश-दुलारी है

14 अक्टूबर 2015
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सड़क किनारे

16 अक्टूबर 2015
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आओ चलें....

28 अक्टूबर 2015
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जीवन...

19 नवम्बर 2015
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उजाले

28 दिसम्बर 2015
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नववर्ष मंगलमय हो !

31 दिसम्बर 2015
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उम्मीदों वाली धूप...

31 दिसम्बर 2015
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पूछ रहे हो क्या अभाव है

2 अप्रैल 2016
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पूछ रहे हो क्या अभाव हैतन है केवल प्राण कहाँ है ?डूबा-डूबा सा अन्तर हैयह बिखरी-सी भाव लहर है ,अस्फुट मेरे स्वर हैं लेकिनमेरे जीवन के गान कहाँ हैं ?मेरी अभिलाषाएँ अनगिनपूरी होंगी ? यही है कठिनजो ख़ुद ही पूरी हो जाएँऐसे ये अरमान कहाँ हैं ?लाख परायों से परिचित हैमेल-मोहब्बत का अभिनय है,जिनके बिन जग सून

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चल मेरे साथ ही चल

2 अप्रैल 2016
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चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़लइन समाजों के बनाये हुये बंधन से निकल, हम वहाँ जाये जहाँ प्यार पे पहरे न लगेंदिल की दौलत पे जहाँ कोई लुटेरे न लगेंकब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल, प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैंबिजलियाँ अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैंतू भी बिजली की तरह ग़म के अँधेरो

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सावन की पुरवईया गायब

11 अप्रैल 2016
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सावन की पुरवईया गायब ..पोखर, ताल, तलईया गायब...! कट गये सारे पेड़ गाँव के.. कोयल और गौरईया गायब.....! कच्चे घर तो पक्के बन गये.. हर घर से अंगनैया गायब.....! सोहर, कजरी ,फगुवा भूले.. बिरहा नाच नचईया गायब....! नोट निकलते ए टी म से....पैसा, आना, पईया  गायब......! दरवाजे पर कार खड़ी हैं.. बैल,, भैंस,,

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भारत की सोंधी-मिट्टी

21 अप्रैल 2016
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भारत की सोंधी-मिट्टी, हम सब का श्रृंगार है,हम सब देशवासियों का यह सुन्दर संसार है I नहीं चाहिए हीरे-मोती, और ना ही चांदी-सोना,नहीं विदेशी शैया पर हमें अपनी नींदें खोना,देश हमारा सिंधु स्वर्ण का, यही सम्पदा अपार है I देश की खातिर जीना हैदेश की खातिर मरना है क्या खोया क्या पाया छोडो,हमें वतन से प्यार

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