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भाग 2

24 अगस्त 2022

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 दूर जाकर पता लगाने की सामथ्य नहीं । घर मे भगवान्‌ की मुर्ति है, उसे छीड़कर कहीं जाना नहीं हो सकता । कान्तिचन्द्र ने कहा--नाव पर आप मुझसे अगर मिल्ल सके' ते में एक कुल्लीन अच्छा छडका बतला सकता हैँ । 

इधर कान्तिचन्द्र के भेजे दूतों ने नवीनचन्द्र बनर्जी की कन्या सुधा के बारे में गॉव मे जिससे पूछा उसी ने कन्या फे स्वभाव की बड़ो बडाई की । दूसरे दिन नवीनचन्द्र जब्र नाव पर आये तथ कान्तिचन्द्र ने उनको प्रणाम करके बिठलाया और बातो ही बातों में यह जताया कि वे उनकी कन्या से व्याह करना चाहते हैं | ब्राह्मण इस अचिन्तित असम्भव सौभाग्य की बात सुनकर बहुत विस्मित हुए । उन्हे जान पड़ा, कान्तिचन्द्र का कुछ भ्रम हो गया है । 

उन्होंने फिर कहा--तुम मेरी कन्या के साथ ब्याह करोगे ? कान्तिचन्द्र--अगर आपकी सम्मति हो ते में तैयार हैँ ।' नवीनचन्द्र ने फिर पूछा--सुधा के साथ ? े उत्तर मिल्ला-हों । | नवीनचन्द्र ने स्थिर भाव से प्रश्न किया--तुमने उसकी श्रभी देखा-सुना भी नहीं है--- कान्तिचन्द्र ने जेसे उसे स्भुच ही नहीं देखा, ऐसा ढड़ करके कहा--इसके लिए आप कुछ चिन्ता न करे | नवीन ने गद्गद द्वेकर कहा--मेरी सुधा बहुत ही सुशीज्' .. लडकी है, घर-गृहस्थी के काम करने मे श्रद्धितीय है। 

तुम, जैसे  बिना देखे ही उसे व्याहने के लिए तैयार हो। वैसे ही में भी आशीर्वाद  देता हूँ कि मेरी सुधा सदा तुम्हारे मन के माफिक रहकर तुमकी सुखी करे | माघ के महीने में ब्याह होना पक्का हो गया | गॉव के रईस मजूमद्धार बाबू के पुराने घर मे व्याह का स्थान निर्दिष्ट हुआ। यथासमय पाल्की पर चढकर रोशनी ओर बाजे-गाजे के साथ वर आकर उपस्थित हुआ ।

 विवाह के समय एक वार, मॉग में सेंदुर लगाने के अवसर पर, वर ने कन्या की ओर देखा। सिर क्रकाये क्ज्जा- शीला सुधा की कान्तिचन्द्र अच्छी तरह नहीं देख सके | आनन्द के मारे आँखों सें चकाचांघ सी लग गई । कुल्नरीति के अनुसार वर को घर के भीतर मुंह जुठालने के लिए जाना पड़ा । वहाँ एक स्लो ने ज़बदस्ती वर के द्वारा कन्या का घूघट खुलवाया। घूघट खेलते ही कान्तिचन्द्र मानों चौंक पड़े । यह ते वह लडकी नहीं है। एकाएक मानों उनके सिर पर वज गिर पड़ा। 

दमभर से मानों वहाँ की सब रोशनी बुक गई और उस श्रन्धकार की बहिया ने मानों नव-वधू के मुख का भी अन्धकारसय बना दिया । कान्तिचन्द्र ने अपने सन में दुबारा ब्याह न करने की प्रतिज्ञा ऋकर'ली थी। भाग्य ने उस प्रतिज्ञा को इस वरह की दिल्लगी “करके चुटकी बजाते-बजाते नष्ट कर दिया ।

 कितने ही अच्छे- अच्छे ब्याह आये, और उनकी कान्तिचन्द्र ने नामच्जुर कर दिया। ऊँचे घराने के सम्बन्ध का' खयाल, घन का प्रल्लोभन और रूप का मोच्द कान्तिचन्द्र का नहीं डिगा सका, किन्तु , अन्त की एक अपरिचित गॉब मे एक श्रज्ञात दरिद्र के घर ऐसी विडम्बना सहनी पड़ो । लोगो की मुंह किस तरह दिखावेगे  पहले ससुर के ऊपर क्रोध हुआ।

 ठग ने एक लड़की दिखाकर दूसरी लडकी मुझे ब्याह दी । किन्तु फिर उन्होसे से।चा कि नवीनचन्द्र ने ते! लडकी दिखाई नही | वह ते। ब्याह के पहले लडकी दिखाने के लिए राज़ो थे, किन्तु कान्तिचन्द्र ने खुद ही नाही कर दी | अपनी बुद्धि के दोष को किसी के आगे प्रकट न करना ही कान्तिचन्द्र ने अच्छा समझा । वे दवा की तरह उस वात को पी गये, किन्तु उनके मुख का भात्र बिगड गया । सुसरात्त की औरते| का मसखरापन उन्हे बुरा मालूम पडने लगा । 

अपने ओर सर्वंसाधारण के ऊपर उन्हें बडा क्रोध हो आया | इसी समय कान्तिचन्द्र के पास वेठी हुईं नव वधू एकाएक अव्यक्त भय का शब्द करक चोंक पडो | सहसा उसके पास से एक खरगोश का बच्चा दोौड़ता हुआ निकल्ल गया। उसी दस उस दिन की वही लड़की खरगोश के बच्चे के पीछे देड़ती हुई आई | खरगोश के वच्चे का पकड़कर उसके गाल पर गाल रखकर उसे वह दुलराने लगी । 'विह पगलली आ गई» यह कहकर सब पोरते' इशारे से, व॑ंद्दों से चन्ने जाने के लिए,उससे

कहने लगी । किन्तु उधर कुछ ध्यान न देकर वर ओर कन्या के सामने बैठकर बच्चों की तरह कौतूहल के साथ, क्‍या हे। रहा है, यह वह देखने लगी । एक स्त्री उसे ज़बरदेस्ती पकड़- कर वहा से हटाने की चेष्टा करने लगी। कान्तिचन्द्र नी कहा- क्यों, उसे बेठी रहने दे।। इसके बाद उस लड़की से कान्ति- चन्द्र ने पूछा--तुम्हारा नाम क्‍या है ? वह लड़की कुछ उत्तर न देकर वर की ओर ताकने लगी | जितनी श्रौरते' वद्दों बेठी थीं, सब हँसने लगी  । 

कान्तिचन्द्र ने फिर पूछा--तुम्हारी बत्तखे' अच्छी हैं ? कुछ उत्तर न देकर, बिना किसी सड्लोच के, उसी तरह वह लडकी कान्तिचन्द्र के मुंह की ओर ताकती रही । कान्तिचन्द्र नं साहस करके फिर पूछा--तुम्हारा वह कवूतर अच्छा हो गया । फिर भी कुछ उत्तर न मिल्ला । सब औरते'इस तरह दँसने जगीं जेसे वर का बड़ा भारी घाखा हुआ | अन्त की पूछने पर कान्तिचन्द्र को मालूम हुभ्रा कि वह छडकी गूंगी और बहरी है । 

गांव के सब पशु-पत्तो ही उसके साथी हैं। उस दिन सुधा की घुकार सुनकर जे! वह घर के भीतर गई थी से उसका केवल्ल अनुमानसात्र था । यह सुनकर कान्तिचन्द्र अपने मन से चौंक पड़े | जिसको न पाकर वे पृथ्वों को सुख से शून्य समभने क्गे थे, भाग्य- वश उसी के हाथ से छुटकारा पाकर उन्‍होंने अपने का धन्य समझ्ता। कान्तिचन्द्र ने अपने सन में कहा--अगर, में इसी

लड़की के बाप के पास पहुँचता और वह मेरी प्राथना के अनु- सार कन्या का किसी तरह मेरे गले मढ़कर छुटकारा पाने की चेष्टा करता ते। ! जव तक अपने हाथ से निकल गई उस लड़की का मोह उनके मन में इलचल डाले हुए था तब तक वे अपनी स्यो के सम्बन्ध में बिल्कुल अ्रन्ध हा रहे थे। पास ही और कोई सानन्ता  का कारण है या नहीं, यह देखने की प्रवृत्ति भी उन्हे नही थी । 

किन्तु ज्योही  उन्हाने उस लड़की के गूगे ओर बहरे होने की बात सुनी त्योही उनकी दृष्टि के सामने मानों जगत्‌ के ऊपर से एक काला पदों हट गया। कान्ति- चन्द्र ने मन ही मन ईश्वर का वन्यवाद देकर एक बार सुयोग पाकर अपनी  स्त्री की ओर देखा। उस्र समय उन्हे अपनी नवविवाहिता स्त्री  लक्ष्मी से बढ़कर सुन्दरी जान पड़ा। इतनी देर के बाद उन्होने समझता कि नवीनचन्द्र का आशीर्वाद व्यर्थ  न होगा ।   

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रचनाएँ
गल्प गुच्छ
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कथाकार चंदन पांडेय का उपन्यास वैधानिक गल्प गुच्छ साल भर से काफ़ी चर्चा में है। समकालीन परिस्थितियों को यह उपन्यास गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। पूरी कथा पाठक में इतनी बेचैनी पैदा कर देती है कि वह आतंकित कर देने वाली उन परिस्थितियों और किरदारों के बारे में सोचे जो हमारे आस पास निर्मित हो चुकी हैं और उनका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। कई बार कोई क़िताब, कोई रचना आप पढ़ना तो चाहते हैं, मगर अन्य कारणों से वह टलता रहता है। आपके चाहने के बावजूद वह छूटती रहती है। आप पछताते रहते हैं, मगर वह हाथ नहीं आती। कथाकार चंदन पांडेय का उपन्यास वैधानिक गल्प ऐसी ही पुस्तक है। पिछले सात-आठ महीनों से यह उपन्यास मेरा पीछा कर रहा था और मैं इसके पीछे लगा हुआ था, मगर पढ़ा जा सका अब। पढ़ने के बाद लगा कि अगर न पढ़ता तो कुछ छूट जाता। साल भर से यह उपन्यास काफ़ी चर्चा में है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा नवलेखन का पुरस्कार मिलने की वज़ह से भी यह चर्चित रहा, इसकी विषयवस्तु, भाषा और उसकी शैली। समकालीन परिस्थितियों को यह उपन्यास गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है।
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मुर्दे की मौत भाग 1

24 अगस्त 2022
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रानीहाट के जमींदार शारदाशंकर  बाबू के घर की विधवा वहू के मायके से कोई नही  था । एक-एक करके सभी मर गये। सुसराल  मे भी ठीक अपना कहलाने लायक कोई ल था। न पति था और-न पुत्र ही  था। उसके जेठ शारदाशह  का एक

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भाग 2

24 अगस्त 2022
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कादम्बिनी के कपड़े मे कीचड भरा हुआ था। अद- भुत भाव के आवेश श्रोर रात के जागने से वह पागल सी हे। रही थी । उसका चेहरा देखकर लोग सचमुच ही डर सकते थे।  शायद गॉव के लडके उसे देखकर पागतव समझकर दूर से ढेले

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भाग 3

24 अगस्त 2022
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इसी कारण कभी-कभी दोपहर की सूनी कंठरी में पड़ें- पड़ वह चिल्ला उठती थी  और  शाम को दीपक के प्रकाश में अपनी परछाही  देखकर उसकी रोगटे खड़े हो आते थे ।  उसके इस भय का देखकर घर के लोगों के मन मे भी एक प्र

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भाग 4

24 अगस्त 2022
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असल बात उसकी सममझ्त मे नहों आई | वह जवाब भी नहो दे सकी ओर दुबारा कुछ प्रश्न भी नहों कर सकी । मुँह फुला- कर गम्भीर भाव से वहाँ से चली गई |  रात के दस बजे होगे जब  श्री पति रानीहाट से लौट आये । उस समय

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भाग 5

24 अगस्त 2022
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कमरे भर में अन्धकार'छा गया। कादम्बिनी एकंदम कमरे की भीतर आकर खडो हा गई ।  उस समय ढाई पहर के लगभग राव बीती होगी । बाहर'जोर से पानी पढ़ रहा था । कादम्बिनी मे कहा--बहन, में तुम्हारी सखी कादम्बिनी ही हूँ

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सुधा भाग 1

24 अगस्त 2022
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कान्तिचन्द्र की अवस्था थोडी है, तथापि ज्री के मरने के उपरान्त द्वितीय स्त्री का अनुसन्धान न करके पशु-पक्तियों के शिकार से ही उन्होंने  अपना मन लगाया | उनका शरीर लम्बा, पतला, हृढ़ ओर हल्का था। दृष्टि त

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भाग 2

24 अगस्त 2022
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 दूर जाकर पता लगाने की सामथ्य नहीं । घर मे भगवान्‌ की मुर्ति है, उसे छीड़कर कहीं जाना नहीं हो सकता । कान्तिचन्द्र ने कहा--नाव पर आप मुझसे अगर मिल्ल सके' ते में एक कुल्लीन अच्छा छडका बतला सकता हैँ । 

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समस्या-पूर्ण भाग 1

24 अगस्त 2022
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 देवपुर के ज़मीदार रामगोपाल अपने बड़े लङके को ज़मीदारी और घर-ग्रहस्थी सौपकर काशीवास' करने चले गये | देश के सब अनाथ दरिद्र लोग उनके लिए हाहाकार करके रोने लगे । सब यही कहने लगे कि ऐसी उदारता और  धमेनिष्

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भाग 2

24 अगस्त 2022
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भेया, आल्ला  तुम्हारा भला करे' । बेटा, रमजानी का तुम बिगा- डूना नहीं। में उसे तुमका सॉंपती हूँ। उसे तुम अपना छोटा भाई समझकर उसके खाने-पीने का ज़रिया वह ज़मीन दे दे।। तुम्हारे वेशुमार दे।लत है। जितनी त

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भाग 3

24 अगस्त 2022
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कष्णगोपाल् ने विस्मित होकर पूछा--इसी लिए आप काशी से इतनी दुर आये हैं ? रमज़ानी पर आपका इतना अनुग्रह क्यो है ? रामगोपाल ने कदा--यह सुनकर तुम क्‍या करोगे ? कष्णगोपाल् ने नहीं माना और कहा--अयोग्यता का व

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प्रायचित भाग 1

25 अगस्त 2022
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स्वर्ग  और  मनुष्यलोक के बीच में एक अनिर्देश्य अरा जक स्थान है, जहाँ राजा त्रिशंकु लटक रहे हैं और जह आकाशकुसुमे के ढेर पैदा  होते हैं। उस वायुदुर्गवेष्टिव महा देश का नाम है “होता तो है| सकता? । जो लोग

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भाग 2

25 अगस्त 2022
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किन्तु यह बात भी, उसके सन मे आई कि उसके खामी सुसरात् में रहने के कारण आदर की अपने हाथो गँवा रहे हैं | उस् दिन से नित्य वह खामी से कहने लगी कि तुम अपने घर मुझे ले चले, अब में यहाँ नहीं रहेंगी । अनाथब

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भाग 3

25 अगस्त 2022
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किन्तु स्त्री  किसी तरह इस बात पर राजी  नही  हुई | उसन अपनी राय यह जाहिर की कि बड़े भाई की रोटी और  आवाज  की गाली पर छेप्टे भाई का पारिवारिक अधिकार है, किन्तु सुसरात्त में जाकर रहना बड़ी ही बेज्जती की

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भाग 4

25 अगस्त 2022
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विन्ध्यवासिनी  ने कहा--आप वि्लायत जाने मे .रोक-टाक न करे इसलिए नही मांगे | राजकुमार बाबू  बहुत ही नाराज़ हुए। माता रोने लगी ओर बेटी भी रोने लगी । कलकत्ते मे चारों आर विचित्र स्वर से उत्सव के बाजे बज र

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भाग 5

25 अगस्त 2022
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अनाथबन्धु उत्साह  के साथ इस बात पर राज़ी हो गये । उन्होंने मन मे सोचा, जे बार-्लाइब्रेरियों मे पड़े रहनेवाले स्वदेशी बेरिस्टर उनसे डाह करते हैं और उनकी असामान्य प्रतिभा के प्रति यथरेष्ट सम्मान नहीं  द

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सुभा भाग 1

25 अगस्त 2022
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 लड़की का नाम जब सुभाषिणी रक्खा गया था तब कीन जानता था कि वह गूगी हेगी ? उसकी दो  बडी बहनें का नाम सुकेशिनी ओर सुहासिनी रखा गया था | इसी से उसी अनुप्रास पर पिता ने छोटी लडकी का नाम सुभाषिणी रखा  | इस

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भाग 2

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 धूप  से प्रकाशित महृत्‌ आकाश के नीचे केवल गूँगी प्रकृति और गूंगी लड़की सुभा दोनों आमने-सामने चुप- चाप बैठे-बेठे एक दूसरे को निहारा करती थीं । प्रकृति फैली हुई धूप में, ओर सुभा छोटे-छोटे पेड़ों की छाह

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भाग 3

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मान लो, सुभा अगर जल्लकुमारी होती; धीरे-धीरे जल से ऊपर उठकर एक नागमशि घाट पर रण जाती , प्रताप तुच्छ मछली पकडने के काये का छोड़कर उस मणि का लेकर जल मे गोता क्गाता और पाताक्न मे जाकर देखता, चॉदी के महल म

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विचारक भाग 1

25 अगस्त 2022
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अनेक अवस्थाएँ बदलने के उपरांत अन्त का गतयौबना चुन्नो ते जिस पुरुष का आश्रय श्रदण किया था वह भी जब उसे फटे कपड़े की तरह छाड़ गया तब मुट्ठी भर अन्न के लिए दूसरे आश्रय के। खे।जने की चेष्टा करने से उसे अत

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भाग 2

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समुद्र के भीतर से, वृत्तपंक्ति से श्यामल तट-भूमि जैसे रम-णीय स्वप्न के समान, चित्र के समान जान पड़ती है वैसे किनारे पर पहुँचने से नहीं । वेघव्य के घेरे की आड़ से चमेली संसार से जितना दूर हो गई थी उसी

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भाग 3

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निद्राहदीन चमेली  की रात कहाँ जाकर समाप्त होगी | उस्र निरानन्द प्रात:काल मे जब चमेली के घर सूथ्ये देव का प्रकाश प्रवेश करेगा तब वहाँ सहसा केसी लज्ना प्रकाशित हो पड़ेगी-- कैसी लाउछना, कैसा हाहाकार जग उ

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मध्यवर्तिनी भाग 1

25 अगस्त 2022
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सुन्दर निहायत मामूली ढंग का था। उसमें काव्यरस, की गन्ध तक न थी। उसके मन में कभी यह बात नहीं आई कि जीवन में उक्त रस की कुछ आवश्यकता होती है। जैसे  परिचित पुराने जूते के भीतर पेर बिलकुल् निश्चिन्तः भाव

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भाग 2

25 अगस्त 2022
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के ऊपर आनन्दमयी प्रकृति की हर एक उगली जेसे फिरने लगो और हृदय के भीतर जे। एक प्रकार का सद्भीत सुन पड़ने लगा उसके ठीक भाव को वह अच्छी तरह समझ नहीं सकती थी । ऐसे समय जब उसका खामी पास बेठकर पूछता था कि क

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भाग 3

25 अगस्त 2022
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 एक हीरे का ठुकड़ा मिल्लने पर उसे  तरह-तरह से घुमा-फिराकर देखने का जी चाहता है | किन्तु यह एक नौजवान सुन्दरी स्री का मन था--सुन्दरलाल के लिए बुढ़ापे मे एक बहुत ही अपूर्व और स्पृहणीय पदार्थ था ! इसका क

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भाग 4

26 अगस्त 2022
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और आनन्द-गद्द सुन्दर वार-वार प्यारी, प्यारी! कहकर उसे सचेत करने की चेष्टा कर रद्दा था | सुन्दर ने इसी बीच में बड्धिम बाबू का “चन्द्रशेखर  उप- न्यास पढ़ डाला था और वह देो-एक प्राधुनिक कवियों के खड्भार-

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भाग 5

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रक्त में मानों फनकार मारता रहा। पार्वती  ने अपने मन मे कहा-- और किस बात को लेकर तेरी और मेरी तुलना होगी । किन्तु एक समय मेरी  भी यह अवस्था थी,  मैं भी इसी तरह सिर से पैर तक जवानी के रोम मे भरी हुई थी

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भाग 6

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जानकी के असतोष और असुख की सीमा नहीं रही | चह किसी तरह यह समझना  नहीं चाइती कि उसके स्वामी मे उसे सन्तुष्ट रखने की क्षमता नही है । क्षमता नहों थी ते व्याह् क्यों किया था | ऊपर के खण्ड मे कीवल दो  कमरे

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अत्याचार

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जमीदार के नायव जानकीनाथ के घर में प्यारी नास की एक महराजिन रसोई बनाने के लिए नौकर कुई। उसकी अवस्था कम थी और चरित्र अच्छा था। दूर की रहनेवाली वह ब्राह्मणों विपत्ति के फेर से पड़कर जानकीनाथ की घर आकर नो

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चुधित पाषाण भाग 1

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मैं  और  मेरे एक आत्मीय एक दिन रेल पर बेठे हुए कल्कत्ते जा रहे थे। इसी बीच से रेलगाड़ी पर एक आदमी से मुलाकात  हो गई। उसका पहनावा मुसल्लमानों का सा था | उसकी बाते सुनकर आश्चये का ठिकाना नहीं रहता था। प

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किन्तु उसी घड़ी मुझे स्मरण हो आया कि में सचमुच अमुक का ज्ये्ठ पुत्र अमुक हूँ । यह भी मैंने अपने मन में सोच लिया कि इस बात की तो  हमारे महाकबि और  कवि वर ही कद्द सकते हैं कि जगत् के भ्रीतर अथवा बाहर कह

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भाग 3

26 अगस्त 2022
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इस खण्डस्वप्न के अवत्त के भीतर---इसी हिना की. महक सितार के शब्द ओर सुगन्धित जल-कणो से मिल्ले हुए पवन के भोकी के वीच---एक नायिका को दम-दम भर पर बिजली की चसक के समान देख पावा था। उसका जाफू्रानी रद्ग का

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भाग 4

26 अगस्त 2022
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खजूर: के पेड़े की छाया से, किस गृहहीन अरब देश की स्मेंणी-के-मर्भ से उत्पन्न हुई थों ! तुमकी कान लुटेरा, वस्त्र  से पुष्पक की तरह, माता की गोद से अलग करके बिजली  को तरह भागने वाले घोड़े पर चढ़ाकर मरुसू

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भाग 5

26 अगस्त 2022
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उसी वर्षों मे, पगल्ले के पास दौड़ा गया ओर उससे पूंछा--मेहर अली, क्या झूठ ठ है वह मेरी बात का कुछ उत्तर न देकर मुझे आगे से हटा- कर--अजगर के मुह के पास साह के आवेश से घूम रहे पत्तों की तरह--चिल्लाता हुआ

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