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वैराग्य शतकम् - भाग - अट्ठाईस

24 जनवरी 2022

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*आसंसारं त्रिभुवनमिदं चिन्वतां तात तादृङ्*

*नैवास्माकं नयनपदवीं श्रोत्रवर्त्मागतो वा !*

*योऽयं धत्ते विषयकरिणीगाढगूढाभिमान*

*क्षीवस्यान्तः करणकरिण: संयमालानलीलाम् !! ४६ !!*


*अर्थात्:-* ओ भाई ! मैं सारे संसार में घूमा और तीनो भुवनों में मैंने खोज की; पर ऐसा मनुष्य मैंने न देखा न सुना, जो अपनी कामेच्छा पूर्ण करने के लिए हथिनी के पीछे दौड़ते हुए मदोन्मत्त हाथी के समान मन को वश में रख सकता हो | 


*उक्त श्लोक पर अपना भाव:---*


त्रैलोक्य पर दृष्टि डालने पर एक भी मनुष्य ऐसा न दिखा , जो विषय रुपी हथिनी के पीछे लगे हुए मनरूपी गज को रोक सकता हो | *इसका तात्पर्य यह है कि* विषयों में फंसे हुए मन को काबू में रखना अथवा उसे विषयों से हटाना असंभव है | *मन बड़ा बलवान है |* इसके पंख नहीं पर पक्षी की तरह उड़ने वाला है ; कभी यह आकाश में जाता है और कभी पाताल में जाता है | मन शरीर को जिधर घुमाता है, शरीर उधर ही घूमता है | मन ही मनुष्य को परमात्मा से अलग रखता और मन ही उसे उससे मिला देता है | *मन की चंचलता अच्छी नहीं बल्कि उसकी चंचलता ही साधना में बाधक है |*


*महात्मा कबीरदास जी कहते हैं -*


*मन-पक्षी तब लगि उड़े, विषय-वासना मांहि !*

*ज्ञान-बाज़ की झपट में, जब लगि आया नाहिं !!*

*मन के बहुतै रंग हैं, छिन-छिन मध्ये होय !*

*एक रंग में जो रहे, ऐसा बिरला कोय !!*

*जेती लहार समुद्र की, तेती मन की दौर !*

*सहजै हीरा उपजे, जो मन आवे ठौर !!*

*मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक !*

*जो मन पर असवार हैं, ते साधू कोई एक !!*



*अर्थात् :-* मन-पक्षी विषय-वासनाओं में उस वक्त तक उड़ता है जब तक वह ज्ञान बाज़ की झपट में नहीं आता |  मतलब यह है कि मन विषयों में उसी वक्त तक फंसा रहता है जब तक कि उसे ज्ञान नहीं होता | *ज्ञान होते ही मन विषयों के फंदे से निकल जाता है |*

मन के अनेक रंग हैं , जो छिन-छिन में बदलते रहते हैं | *जो एक ही रंग में रंगा रहता है, वह कोई विरला ही होता है |* समुद्र की जितनी लहर हैं , मन की उतनी ही दौड़ हैं | अगर मन एक ही ठिकाने ठहर जावे तो सहज में हीरा पैदा हो जावे | *मतलब यह है कि मन के एक जगह ठहरने या स्थिर हो जाने से सिद्धि मिल जा सकती है, जगदीश के दर्शन हो सकते हैं | चंचल मन से सिद्धि दूर भागती है , जगदीश-मिलान के लिए स्थिर चित्त की आवश्यकता है |*

मन के मते न चालिये क्योंकि मन के मते अनेक हैं | मन पर सवार रहने वाले , मन को अपने वश में रखनेवाले महात्मा कोई विरले ही होते हैं | *सारांश यह कि:- मन की चाल पर न चलना चाहिए , उसकी सलाह के अनुसार काम न करना चाहिए | मन को काबू में रखना चाहिए और उसे अपनी इच्छानुसार चलाना चाहिए | जो मन की राह पर नहीं चलते, मन के अधीन नहीं होते, मन को स्थिर रखते हैं, उसे चंचल नहीं होने देते, उसकी लगाम अपने हाथों में रखते और अपने माफिक चलते हैं - स्वयं उसकी मर्जी पर नहीं चलते, वे जगत को विजय कर सकते हैं |  वे नाना प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं और जगदीश से मिलकर अक्षय सुख के अधिकारी हो सकते हैं |* जिन्हें संसारी जालों से छूटना हो, जन्म-मरण के कष्ट न भोगने हों, नित्य और अविनाशी सुख भोगना हो, परमपद प्राप्त करना हो; *वे मन को अपने वश में करें, उसे इधर-उधर जाने से रोकें और उसे करतार के ध्यान में लगावें |*



हे मनुष्य ! अपने मन को मार , अभिमान को मार ; इसमें तेरी बड़ाई है | बड़े बड़े खूंखार जानवरों के मारने में कोई बड़ाई नहीं है | पर अभिमान-शून्य होना है बड़ा कठिन | जिस पात्र में लहसन या प्याज रखे जाते हैं, उसमें से उनकी गन्ध बड़ी कठिनाई से जाती है | *इसी तरह अभिमान भी बड़ी कठिनाई से जाता है |* इसके नाश का उपाय विवेक या ज्ञान है | *जब ज्ञान का उदय हो जाता है, तब जिस तरह पका हुआ आम आप-से-आप गिर पड़ता है ; उसी तरह अभिमान भी आप-से-आप दूर हो जाता है |* अभिमान के नाश होते ही चित्त शुद्ध हो जाता है | चित्त के शुद्ध होने से परमात्मा के दर्शन होने की राह साफ़ हो जाती है |


*मनुष्यों ! अभ्यास करो , अभ्यास से सब कठिनाइयां हल हो जाती है | जैसे भी हो , मन को वासनाहीन बनाओ |  वासनाहीन , निर्मल चित्त वाले व्यक्ति पर उपदेश जल्दी असर करता है और उसमें ईश्वरानुराग शीघ्र ही उत्पन्न हो जाता है |*



*किसी ने कहा है :--*


*ऐसो मैं संसार में, सुन्यो न देख्यो धीर |*

*विषय-हथिनी संग लग्यो, मनगज बांधे बीर !!*


*××××××××××××××××××××××××××××××××××*


*!! भर्तृहरि विरचित "वैराग्य शतकम्" अष्टविंशोभाग: !!*  
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रचनाएँ
वैराग्य शतकम्
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इस कलिकाल में अनेक लोग *वैराग्य* के विषय में जानना चाहते हैं | *वैराग्य* क्या है ? इसके विषय में जानने के लिए हमें अपने ग्रन्थों का स्वाध्याय करने की आवश्यकता है | इन्हीं ग्रन्थों में एक है *राजा भर्तृहरि* (भरथरी) द्वारा लिखा गया *वैराग्य शतकम्* | इसको यदि ध्यान पूर्वक पढ़ लिया जाय तो *वैराग्य* का वास्तविक अर्थ स्वयं पता चल सकता है | आज के युग में इस शतक में कही गयी बातें कुछ लोगों को बेमानी ही लगेंगी परंतु सत्य यही है | *राजाभर्तृहरि* द्वारा १०० श्लोकों में रचित *वैराग्य शतकम्* के भावार्थ के साथ ही अपना भाव भी मिश्रित करके आप सबके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ ! *सुधी पाठकों* से आशा है कि अच्छी बातें चुनकर जो अच्छी न लगें उन्हें हमारी मूर्खता समझकर हमें अपना बनाये रखेंगे |
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वैराग्य शतकम् - भाग - सोलह

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न नटा न विटा न गायना न परद्रोहनिबद्धबुद्धयः !* *नृपसद्मनि नाम के वयं स्तनभारानमिता न योषितः !! २७ !!* *अर्थात् :-* न तो हम नट या बाज़ीगर हैं, न हम नचैये-गवैये हैं, न हमको चुगलखोरी आती

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वैराग्य शतकम् - भाग - सत्रह

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*अर्थानामीशिषे त्वं वयमपि च गिरामीश्महे यावदित्थं* *शूरस्त्वं वादिदर्पज्वरशमनविधावक्षयं पाटवं नः !* *सेवन्ते त्वां धनान्धा मतिमलहतये मामपि श्रोतुकामा* *मय्यप्यास्था न ते चेत्त्वयि म

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वैराग्य शतकम् - भाग - अठारह

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*परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा* *प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदयक्लेशकलितम् !* *प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणि गुणे* *विमुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते !! ३४ !!*

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वैराग्य शतकम् - भाग - उन्नीस

22 जनवरी 2022
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*भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं* *मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया: भयम् !* *शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं* *सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैर

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वैराग्य शतकम् - भाग - बीस

22 जनवरी 2022
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*अमीषां प्राणानां तुलितबिसिनीपत्रपयसां* *कृते किं नास्माभिर्विगलितविवेकैर्व्यवसितम्;!* *यदाढ्यानामग्रे द्रविणमदनिःसंज्ञमनसां* *कृतं वीतव्रीडैर्निजगुणकथापातकमपि !! ३६ !!* *अर्थात्:-* कमल-

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वैराग्य शतकम् - भाग - इक्कीस

22 जनवरी 2022
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*भ्रातः कष्टमहो महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च* *तत्पाश्र्वे तस्य च साऽपि राजपरिषत्ताश्चन्द्रबिम्बाननाः !* *उद्रिक्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः* *सर्वं यस्य वशादगात्स्मृतिपदं कालाय त

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वैराग्य शतकम् - भाग - बाईस

23 जनवरी 2022
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*वयं येभ्यो जाताश्चिरपरिगता एव खलुते* *समं यैः संवृद्धाः स्मृतिविषयतां तेऽपि गमिताः !* *इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासन्नपतना-* *ग्दतास्तुल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतरुभिः !! ३८ !!* *अर्थात् :-

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वैराग्य शतकम् - भाग - तेईस

23 जनवरी 2022
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*यत्रानेके क्वचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यथैको* *यत्राप्येकस्तदनु बहवस्तत्र चान्ते न चैकः !* *इत्थं चेमौ रजनिदिवसौ दोलयन्द्वाविवाक्षौ* *कालः काल्या सह बहुकलः क्रीडति प्राणिशारैः !! ३९ !!* *अ

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वैराग्य शतकम् - भाग - चौबीस

23 जनवरी 2022
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*तपस्यन्तः सन्तः किमधिनिवसामः सुरनदीं* *गुणोदारान्दारानुत परिचयामः सविनयम् !* *पिबामः शास्त्रौघानुतविविधकाव्यामृतरसा* *न्न विद्मः किं कुर्मः कतिपयनिमेषायुषि जने !! ४० !!* *अर्थात् :-* हम

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वैराग्य शतकम् - भाग - पच्चीस

23 जनवरी 2022
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*गंगातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य*  *ब्रह्मध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य !* *किं तैर्भाव्यम् मम सुदिवसैर्यत्र ते निर्विशंकाः* *सम्प्राप्स्यन्ते जरठहरिणाः श्रृगकण्डूविनोदम् !!

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वैराग्य शतकम् - भाग - छब्बीस

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*स्फुरत्स्फारज्योत्स्नाधवलिततले क्वापि पुलिने* *सुखासीनाः शान्तध्वनिषु द्युसरितः !!* *भवाभोगोद्विग्नाः शिवशिवशिवेत्यार्तवचसः* *कदा स्यामानन्दोद्गमबहुलबाष्पाकुलदृशः !! ४२  !!*

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वैराग्य शतकम् - भाग - सत्ताईस

24 जनवरी 2022
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*शिरः शार्व स्वर्गात्पशुपतिशिरस्तः क्षितिधरं**महीध्रादुत्तुङ्गादवनिमवनेश्चापि जलधिम् !**अधो गङ्गा सेयं पदमुपगता स्तोकमथवा**विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः !! ४४ !!**अर्थात्:-* देखिये, गङ्गा जी स्

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वैराग्य शतकम् - भाग - अट्ठाईस

24 जनवरी 2022
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*आसंसारं त्रिभुवनमिदं चिन्वतां तात तादृङ्**नैवास्माकं नयनपदवीं श्रोत्रवर्त्मागतो वा !**योऽयं धत्ते विषयकरिणीगाढगूढाभिमान**क्षीवस्यान्तः करणकरिण: संयमालानलीलाम् !! ४६ !!**अर्थात्:-* ओ भाई ! मैं सारे सं

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वैराग्य शतकम् - भाग - उन्तीस

24 जनवरी 2022
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*ये वर्धन्ते धनपतिपुरः प्रार्थनादुःखभोज**ये चालपत्वं दधति विषयक्षेपपर्यस्तबुद्धेः !**तेषामन्तः स्फुरितहसितं वासराणां स्मारेयं**ध्यानच्छेदे शिखरिकुहरग्रावशय्या निषण्णः !! ४७ !!**अर्थात् :-* वे दिन जो ध

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वैराग्य शतकम् - भाग - ३० (तीस)

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विद्या नाधिगता कलंकरहिता वित्तं च नोपार्जितम ,* *शुश्रूषापि समाहितेन मनसा पित्रोर्न सम्पादिता !* *आलोलायतलोचना युवतयः स्वप्नेऽपि नालिंगिताः ,* *कालोऽयं परपिण्डलोलुपतया ककैरिव प्रेरितः !! ४८ !!*

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वैराग्य शतकम् - भाग - ३१ (इकतीस)

27 मई 2022
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*वितीर्णे सर्वस्वे तरुणकरुणापूर्णहृदयाः ,* *स्मरन्तः संसारे विगुणपरिणाम विधिगतिः !* *वयं पुण्यारण्ये परिणतशरच्चन्द्रकिरणै- ,* *स्त्रियामां नेष्यामो हरचरणचित्तैकशरणाः !! ४९ !!* *अर्थात्:-* सर्व

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वैराग्य शतकम् - भाग - ३२ (बत्तीस)

27 मई 2022
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*वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं च लक्ष्म्या*  *सम इह परितोषो निर्विशेषावशेषः !* *स तु भवति दरिद्री यस्य तृष्णा विशाला* *मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान्को दरिद्रः ? !! ५० !!* *अर्थात्:-* हम वृक्षों क

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वैराग्य शतकम् - भाग - ३३ (तैंतीस)

28 मई 2022
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*यदेतत्स्वछन्दं विहरणमकार्पण्यमशनं* *सहार्यैः संवासः श्रुतमुपशमैकव्रतफलम् !* *मनो मन्दस्पन्दं बहिरपि चिरस्यापि विमृशन्* *न जाने कस्यैष परिणतिरुदारस्य तपसः !! ५१ !!* *अर्थात्:-* स्वधीनतापूर्वक

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वैराग्य शतकम् - भाग - ३४ (चौंतीस)

28 मई 2022
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*दुराराध्यः स्वामी तुरगचलचित्ताः क्षितिभुजो* *वयं तु स्थूलेच्छा महति च पदे बद्धमनसः !* *जरा देहं मृत्युर्हरति सकलं जीवितमिदं* *सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषोऽन्यत्र तपसः !! ५३ !!* *अर्थात्:

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वैराग्य शतकम् - भाग - ३५ (पैंतीस)

28 मई 2022
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*भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चला*  *आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलीनाम्बुवद्भङ्गुरम् !* *लोला यौवनलालसा तनुभृतामित्याकलय्य द्रुतं* *योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धिं विधध्वं बुधाः !! ५४ !!*

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वैराग्य शतकम् - भाग - ३६ (छत्तीस)

28 मई 2022
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*पुण्ये ग्रामे वने वा महति सितपटच्छन्नपालिं कपाली-* *मादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतभुग्धूमधूम्रोपकण्ठं !* *द्वारंद्वारं प्रवृत्तो वरमुदरदरीपूरणाय क्षुधार्तो* *मानी प्राणी स धन्यो न पुनरनुदिनं तुल्यकुल्

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