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देख कबीरा रोया

20 अप्रैल 2022

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नगर नगर ढिंडोरा पीटा गया कि जो आदमी भीक मांगेगा उसको गिरफ़्तार कर लिया जाये। गिरफ्तारियां शुरू हुईं। लोग ख़ुशियां मनाने लगे कि एक बहुत पुरानी ला’नत दूर हो गई।

कबीर ने ये देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। लोगों ने पूछा, “ए जूलाहे तू क्यों रोता है?”

कबीर ने रो कर कहा, “कपड़ा दो चीज़ों से बनता है, ताने और पेटे से। गिरफ़्तारियों का ताना तो शुरू हो गया पर पेट भरने का पेटा कहाँ है?”

एक एम.ए, एल.एल.बी को दो सौ खडियाँ अलॉट हो गईं। कबीर ने ये देखा तो उसकी आँखों में आँसू आगए। एम.ए, एल.एल.बी ने पूछा, “ए जूलाहे के बच्चे तू क्यों रोता है? क्या इसलिए कि मैंने तेरा हक़ ग़स्ब कर लिया है?”

कबीर ने रोते हुए जवाब दिया, “तुम्हारा क़ानून तुम्हें ये नुक्ता समझाता है कि खडियाँ पड़ी रहने दो, धागे का जो कोटा मिले उसे बेच दो। मुफ़्त की खट खट से क्या फ़ायदा... लेकिन ये खट खट ही जूलाहे की जान है!”

छपी हुई किताब के फर्मे थे जिनके छोटे बड़े लिफाफे बनाए जा रहे थे। कबीर का उधर से गुज़र हुआ। उसने वो तीन लिफ़ाफ़े उठाए और उन पर छपी हुई तहरीर पढ़ कर उसकी आँखों में आँसू आगए लिफ़ाफ़े बनाने वाले ने हैरत से पूछा, “मियां कबीर, तुम क्यों रोने लगे?”

कबीर ने जवाब दिया, “इन काग़ज़ों पर भगत सूरदास की कविता छपी है। लिफ़ाफ़े बना कर उसकी बेइज़्ज़ती न करो।”

लिफ़ाफ़े बनाने वाले ने हैरत से कहा, “जिसका नाम सूरदास है। वो भगत कभी नहीं हो सकता।”

कबीर ने ज़ार-ओ-क़तार रोना शुरू कर दिया।

एक ऊंची इमारत पर लक्ष्मी का बहुत ख़ूबसूरत बुत नस्ब था। चंद लोगों ने जब उसे अपना दफ़्तर बनाया तो उस बुत को टाट के टुकड़ों से ढाँप दिया। कबीर ने ये देखा तो उसकी आँखों में आँसू उमड आए। दफ़्तर के आदमियों ने उसे ढारस दी और कहा, “हमारे मज़हब में ये बुत जायज़ नहीं।”

कबीर ने टाट के टुकड़ों की तरफ़ अपनी नमनाक आँखों से देखते हुए कहा, “ख़ूबसूरत चीज़ को बद-सूरत बना देना भी किसी मज़हब में जायज़ नहीं।”

दफ़्तर के आदमी हँसने लगे। कबीर दहाड़ें मार मारकर रोने लगा।

सफ़ आरा फ़ौजों के सामने जरनैल ने तक़रीर करते हुए कहा, “अनाज कम है, कोई पर्वा नहीं। फ़सलें तबाह हो गई हैं, कोई फ़िक्र नहीं... हमारे सिपाही दुश्मन से भूके ही लड़ेंगे।”

दो लाख फ़ौजियों ने ज़िंदाबाद के नारे लगाने शुरू करदिए।

कबीर चिल्ला चिल्ला के रोने लगा। जरनैल को बहुत ग़ुस्सा आया, चुनांचे वो पुकार उठा, “ऐ शख़्स, बता सकता है, तू क्यों रोता है?”

कबीर ने रोनी आवाज़ में कहा, “ऐ मेरे बहादुर जरनैल... भूक से कौन लड़ेगा।”

दो लाख आदमियों ने कबीर मुर्दा बाद के नारे लगाने शुरू कर दिए।

“भाईयो, दाढ़ी रखो, मूंछें कतरवाओ और शरई पाजामा पहनो... बहनो, एक चोटी करो, सुर्ख़ी सफेदा न लगाओ, बुर्क़ा पहनो!” बाज़ार में एक आदमी चिल्ला रहा था। कबीर ने ये देखा तो उसकी आँखें नमनाक हो गईं।

चिल्लाने वाले आदमी ने और ज़्यादा चिल्ला कर पूछा, “कबीर तू क्यों रोने लगा?”

कबीर ने अपने आँसू ज़ब्त करते हुए कहा, “तेरा भाई है न तेरी बहन, और ये जो तेरी दाढ़ी है। इसमें तू ने वस्मा क्यों लगा रखा है... क्या सफ़ेद अच्छी नहीं थी।”

चिल्लाने वाले ने गालियां देनी शुरू करदीं। कबीर की आँखों से टप टप आँसू गिरने लगे।

एक जगह बहस हो रही थी।

“अदब बराए अदब है।”

“महज़ बकवास है, अदब बराए ज़िंदगी है।”

“वो ज़माना लद गया... अदब, प्रोपगंडे का दूसरा नाम है।”

“तुम्हारी ऐसी की तैसी...”

“तुम्हारे इस्टालन की ऐसी की तैसी...”

“तुम्हारे रजअ’त पसंद और फ़ुलां फ़ुलां बीमारियों के मारे हुए फ़लाबेयर और बावलेयर की ऐसी की तैसी।”

कबीर रोने लगा, बहस करने वाले बहस छोड़ कर उसकी तरफ़ मुतवज्जा हुए। एक ने उससे पूछा, “तुम्हारे तहत-उल-शुऊर में ज़रूर कोई ऐसी चीज़ थी जिसे ठेस पहुंची।”

दूसरे ने कहा, “ये आँसू बुरज़वाई सदमे का नतीजा हैं।”

कबीर और ज़्यादा रोने लगा। बहस करने वालों ने तंग आकर बयक ज़बान सवाल किया, “मियां, ये बताओ कि तुम रोते क्यों हो?”

कबीर ने कहा, “मैं इसलिए रोया था कि आपकी समझ में आ जाए, अदब बराए अदब है या अदब बराए ज़िंदगी।”

बहस करने वाले हँसने लगे, एक ने कहा, “ये प्रोलतारी मस्ख़रा है।”

दूसरे ने कहा, “नहीं ये बुरज़वाई बहरूपिया है।”

कबीर की आँखों में फिर आँसू आगए।

हुक्म नाफ़िज़ हो गया कि शहर की तमाम कस्बी औरतें एक महीने के अंदर शादी कर लें और शरीफ़ाना ज़िंदगी बसर करें। कबीर एक चकले से गुज़रा तो कस्बियों के उड़े हुए चेहरे देख कर उसने रोना शुरू कर दिया। एक मौलवी ने उससे पूछा, “मौलाना, आप क्यों रो रहे हैं?”

कबीर ने रोते हुए जवाब दिया, “अख़लाक़ के मुअ’ल्लिम, इन कस्बियों के शौहरों के लिए क्या बंदोबस्त करेंगे?”

मौलवी कबीर की बात न समझा और हँसने लगा। कबीर की आँखें और ज़्यादा अश्कबार हो गईं।

दस बारह हज़ार के मजमे में एक आदमी तक़रीर कर रहा था, “भाईयो, बाज़-याफ़्ता औरतों का मसला हमारा सब से बड़ा मसला है। इसका हल हमें सबसे पहले सोचना है, अगर हम ग़ाफ़िल रहे तो ये औरतें क़हबाख़ानों में चली जाएंगी। फ़ाहिशा बन जाएंगी... सुन रहे हो, फ़ाहिशा बन जाएंगी... तुम्हारा फ़र्ज़ है कि तुम उनको इस ख़ौफ़नाक मुस्तक़बिल से बचाओ और अपने घरों में उनके लिए जगह पैदा करो... अपने अपने भाई, या अपने बेटे की शादी करने से पहले तुम्हें इन औरतों को हरगिज़ हरगिज़ फ़रामोश नहीं करना चाहिए।”

कबीर फूट फूट कर रोने लगा। तक़रीर करने वाला रुक गया। कबीर की तरफ़ इशारा करके उसने बलंद आवाज़ में हाज़िरीन से कहा, “देखो, उस शख़्स के दिल पर कितना असर हुआ है।”

कबीर ने गुलूगीर आवाज़ में कहा, “लफ़्ज़ों के बादशाह, तुम्हारी तक़रीर ने मेरे दिल पर कुछ असर नहीं किया... मैंने जब सोचा कि तुम किसी मालदार औरत से शादी करने की ख़ातिर अभी तक कुंवारे बैठे हो तो मेरी आँखों में आँसू आगए।”

एक दुकान पर ये बोर्ड लगा था, “जिन्ना बूट हाऊस,” कबीर ने उसे देखा तो ज़ार-ओ-क़तार रोने लगा।

लोगों ने देखा कि एक आदमी खड़ा है। बोर्ड पर आँखें जमी हैं और रोए जा रहा है। उन्होंने तालियां बजाना शुरू करदीं, “पागल है... पागल है!”

मुल्क का सबसे बड़ा क़ाइद चल बसा तो चारों तरफ़ मातम की सफ़ें बिछ गईं। अक्सर लोग बाज़ुओं पर स्याह बिल्ले बांध कर फिरने लगे। कबीर ने ये देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। स्याह बिल्ले वालों ने उससे पूछा, “क्या दुख पहुंचा जो तुम रोने लगे?”

कबीर ने जवाब दिया, “ये काले रंग की चिन्दियाँ अगर जमा कर ली जाएं तो सैंकड़ों की सतरपोशी कर सकती हैं।”

स्याह बिल्ले वालों ने कबीर को पीटना शुरू कर दिया, “तुम कम्युनिस्ट हो, फिफ्थ कालमिस्ट हो। पाकिस्तान के ग़द्दार हो।”

कबीर हंस पड़ा, “लेकिन दोस्तो, मेरे बाज़ू पर तो किसी रंग का बिल्ला नहीं।”
 

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रचनाएँ
सआदत हसन मंटो की प्रसिद्ध कहानियाँ
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नौ महीने पूरे हो चुके थे। मेरे पेट में अब पहली सी गड़बड़ नहीं थी। पर मिसिज़ डी कोस्टा के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। वो बहुत परेशान थी। चुनांचे मैं आने वाले हादिसे की तमाम अन-जानी तकलीफें भूल गई थी और मिस

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अपने सफ़ैद जूतों पर पालिश कररहा था कि मेरी बीवी ने कहा। “ज़ैदी साहब आए हैं!” मैंने जूते अपनी बीवी के हवाले किए और हाथ धो कर दूसरे कमरे में चला आया जहां ज़ैदी बैठा था मैंने उस की तरफ़ गौरसे देखा। “अर

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अमृतसर में अली मोहम्मद की मनियारी की दुकान थी छोटी सी मगर उस में हर चीज़ मौजूद थी उस ने कुछ इस क़रीने से सामान रखा था कि ठुंसा ठुंसा दिखाई नहीं देता था। अमृतसर में दूसरे दुकानदार ब्लैक करते थे मगर अली

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मंज़ूर

13 अप्रैल 2022
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जब उसे हस्पताल में दाख़िल किया गया तो उस की हलात बहुत ख़राब थी। पहली रात उसे ऑक्सीजन पर रखा गया। जो नर्स ड्यूटी पर थी, उस का ख़्याल था कि ये नया मरीज़ सुब्ह से पहले पहले मर जाएगा। उस की नब्ज़ की रफ़्तार

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महताब ख़ाँ

13 अप्रैल 2022
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शाम को मैं घर बैठा अपनी बच्चियों से खेल रहा था कि दोस्त ताहिर साहब बड़ी अफरा-तफरी में आए। कमरे में दाख़िल होते ही आप ने मैंटल पीस पर से मेरा फोंटेन पेन उठा कर मेरे हाथ में थमाया और कहा कि “हस्पताल में

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मजीद का माज़ी

13 अप्रैल 2022
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मजीद की माहाना आमदनी ढाई हज़ार रुपय थी। मोटर थी। एक आलीशान कोठी थी। बीवी थी। इस के इलावा दस पंद्रह औरतों से मेल जोल था। मगर जब कभी वो विस्की के तीन चार पैग पीता तो उसे अपना माज़ी याद आजाता। वो सोचता कि

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बीमार

13 अप्रैल 2022
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अजब बात है कि जब भी किसी लड़की या औरत ने मुझे ख़त लिखा भाई से मुख़ातब किया और बे-रबत तहरीर में इस बात का ज़रूर ज़िक्र किया कि वो शदीद तौर पर अलील है। मेरी तसानीफ़ की बहुत तारीफ़ें कीं। ज़मीन-ओ-आसमान के कुलाब

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बिस्मिल्लाह

13 अप्रैल 2022
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फ़िल्म बनाने के सिलसिले में ज़हीर से सईद की मुलाक़ात हुई। सईद बहुत मुतअस्सिर हुआ। बंबई में उस ने ज़हीर को सेंट्रल स्टूडीयोज़ में एक दो मर्तबा देखा था और शायद चंद बातें भी की थीं मगर मुफ़स्सल मुलाक़ात पहली

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बिजली पहलवान

13 अप्रैल 2022
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बिजली पहलवान के मुतअल्लिक़ बहुत से क़िस्से मशहूर हैं कहते हैं कि वो बर्क़-रफ़्तार था। बिजली की मानिंद अपने दुश्मनों पर गिरता था और उन्हें भस्म कर देता था लेकिन जब मैंने उसे मुग़ल बाज़ार में देखा तो वो मुझ

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बाबू गोपीनाथ

13 अप्रैल 2022
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बाबू गोपी नाथ से मेरी मुलाक़ात सन चालीस में हूई। उन दिनों मैं बंबई का एक हफ़तावारपर्चा एडिट किया करता था। दफ़्तर में अबदुर्रहीम सीनडो एक नाटे क़द के आदमी के साथ दाख़िल हुआ। मैं उस वक़्त लीड लिख रहा था। सी

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पहचान

20 अप्रैल 2022
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एक निहायत ही थर्ड क्लास होटल में देसी विस्की की बोतल ख़त्म करने के बाद तय हुआ कि बाहर घूमा जाये और एक ऐसी औरत तलाश की जाये जो होटल और विस्की के पैदा करदा तकद्दुर को दूर कर सके। कोई ऐसी औरत ढूँडी जाय

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फातो

20 अप्रैल 2022
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तेज़ बुख़ार की हालत में उसे अपनी छाती पर कोई ठंडी चीज़ रेंगती महसूस हुई। उस के ख़्यालात का सिलसिला टूट गया। जब वो मुकम्मल तौर पर बेदार हुआ तो उस का चेहरा बुख़ार की शिद्दत के बाइस तिमतिमा रहा था। उस ने आँ

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फौजा हराम दा

20 अप्रैल 2022
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टी हाऊस में हरामियों की बातें शुरू हुईं तो ये सिलसिला बहुत देर तक जारी रहा। हर एक ने कम अज़ कम एक हरामी के मुतअल्लिक़ अपने तअस्सुरात बयान किए जिस से उस को अपनी ज़िंदगी में वास्ता पड़ चुका था। कोई जालंधर

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माई जनते

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माई जनते स्लीपर ठपठपाती घिसटती कुछ इस अंदाज़ में अपने मैले चकट में दाख़िल हुई ही थी कि सब घर वालों को मालूम हो गया कि वो आ पहुंची है। वो रहती उसी घर में थी जो ख़्वाजा करीम बख़्श मरहूम का था अपने पीछे क

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मौसम की शरारत

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शाम को सैर के लिए निकला और टहलता टहलता उस सड़क पर हो लिया जो कश्मीर की तरफ़ जाती है। सड़क के चारों तरफ़ चीड़ और देवदार के दरख़्त, ऊंची ऊंची पहाड़ियों के दामन पर काले फीते की तरह फैले हुए थे। कभी कभी हवा के

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हामिद का बच्चा

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लाहौर से बाबू हरगोपाल आए तो हामिद घर का रहा न घाट का। उन्होंने आते ही हामिद से कहा, “लो, भई फ़ौरन एक टैक्सी का बंदोबस्त करो।” हामिद ने कहा, “आप ज़रा तो आराम कर लीजिए। इतना लंबा सफ़र तय करके यहां आए

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नुत्फ़ा

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मालूम नहीं बाबू गोपी नाथ की शख़्सियत दर-हक़ीक़त ऐसी ही थी जैसी आप ने अफ़साने में पेश की है, या महज़ आपके दिमाग़ की पैदावार है, पर मैं इतना जानता हूँ कि ऐसे अजीब-ओ-ग़रीब आदमी आम मिलते हैं। मैंने जब आपका अफ़

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डार्लिंग

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ये उन दिनों का वाक़िया है। जब मशरिक़ी और मग़रिबी पंजाब में क़तल-ओ-ग़ारतगरी और लूट मार का बाज़ार गर्म था। कई दिन से मूसलाधार बारिश होरही थी। वो आग जो इंजनों से न बुझ सकी थी। इस बारिश ने चंद घंटों ही में ठ

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मोमबत्ती के आँसू

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ग़लीज़ ताक़ पर जो शिकस्ता दीवार में बना था, मोमबत्ती सारी रात रोती रही थी। मोम पिघल पिघल कर कमरे के गीले फ़र्श पर ओस के ठिठुरे हुए धुँदले क़तरों के मानिंद बिखर रहा था। नन्ही लाजो मोतियों का हार लेने

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रिश्वत

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अहमद दीन खाते पीते आदमी का लड़का था। अपने हम उम्र लड़कों में सबसे ज़्यादा ख़ुशपोश माना जाता था, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि वो बिल्कुल ख़स्ता हाल हो गया। उसने बी.ए किया और अच्छी पोज़ीशन हासिल की। वो

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नारा

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उसे यूं महसूस हुआ कि उस संगीन इमारत की सातों मंज़िलें उसके काँधों पर धर दी गई हैं। वो सातवें मंज़िल से एक एक सीढ़ी कर के नीचे उतरा और तमाम मंज़िलों का बोझ उसके चौड़े मगर दुबले कांधे पर सवार होता गय

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झूटी कहानी

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कुछ अर्से से अक़ल्लियतें अपने हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए बेदार हो रही थीं। उन को ख़्वाब-ए-गिरां से जगाने वाली अक्सरियतें थीं जो एक मुद्दत से अपने ज़ाती फ़ायदे के लिए उन पर दबाओ डालती रही थीं। इस बेदार

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नफ़्सियाती मुताला

20 अप्रैल 2022
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मुझे चाय के लिए कह कर, वह उन के दोस्त फिर अपनी बातों में ग़र्क़ हो गए। गुफ़्तुगू का मौज़ू, तरक़्क़ी पसंद अदब और तरक़्क़ी पसंद अदीब था। शुरू शुरू में तो ये लोग उर्दू के अफ़सानवी अदब पर ताइराना नज़र

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जाओ हनीफ़ जाओ

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चौधरी ग़ुलाम अब्बास की ताज़ा तरीन तक़रीर-ओ-तबादल-ए-ख़यालात हो रहा था। टी हाउस की फ़ज़ा वहां की चाय की तरह गर्म थी। सब इस बात पर मुत्तफ़िक़ थे कि हम कश्मीर ले कर रहें गे, और ये कि डोगरा राज का फ़िल-फ़ौर ख़ात

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जान मोहम्मद

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मेरे दोस्त जान मुहम्मद ने, जब मैं बीमार था मेरी बड़ी ख़िदमत की। मैं तीन महीने हस्पताल में रहा। इस दौरान में वो बाक़ायदा शाम को आता रहा बाअज़ औक़ात जब मेरे नौकर अलील होते तो वो रात को भी वहीं ठहरता ताकि

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जेंटिलमेनों का बुरश

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ये ग़ालिबन आज से बीस बरस पीछे की बात है। मेरी उम्र यही कोई बाईस बरस के क़रीब होगी, या शायद इस से दो बरस कम। क्योंकि तारीख़ों और सनों के मुआमले में मेरा हाफ़िज़ा बिलकुल सिफ़र है। मेरी दोस्ती का हल्क़ा उन

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देख कबीरा रोया

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नगर नगर ढिंडोरा पीटा गया कि जो आदमी भीक मांगेगा उसको गिरफ़्तार कर लिया जाये। गिरफ्तारियां शुरू हुईं। लोग ख़ुशियां मनाने लगे कि एक बहुत पुरानी ला’नत दूर हो गई। कबीर ने ये देखा तो उसकी आँखों में आँ

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टू टू

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मैं सोच रहा था, दुनिया की सबसे पहली औरत जब माँ बनी तो कायनात का रद्द-ए-अ’मल क्या था? दुनिया के सबसे पहले मर्द ने क्या आसमानों की तरफ़ तमतमाती आँखों से देख कर दुनिया की सब से पहली ज़बान में बड़े फ़ख़्

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डरपोक

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मैदान बिल्कुल साफ़ था, मगर जावेद का ख़याल था कि म्युनिसिपल कमेटी की लालटेन जो दीवार में गड़ी है, उसको घूर रही है। बार बार वो उस चौड़े सहन को जिस पर नानक शाही ईंटों का ऊंचा-नीचा फ़र्श बना हुआ था, तय कर क

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दीवाली के दीये

20 अप्रैल 2022
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छत की मुंडेर पर दीवाली के दीये हाँपते हुए बच्चों के दिल की तरह धड़क रहे थे। मुन्नी दौड़ती हुई आई। अपनी नन्ही सी घगरी को दोनों हाथों से ऊपर उठाए छत के नीचे गली में मोरी के पास खड़ी हो गई। उसकी रोती

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तस्वीर

20 अप्रैल 2022
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“बच्चे कहाँ हैं?” “मर गए हैं।” “सब के सब?” “हाँ, सबके सब... आपको आज उनके मुतअ’ल्लिक़ पूछने का क्या ख़याल आ गया।” “मैं उनका बाप हूँ।” “आप ऐसा बाप ख़ुदा करे कभी पैदा ही न हो।” “

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नया साल

20 अप्रैल 2022
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कैलेंडर का आख़िरी पत्ता जिस पर मोटे हुरूफ़ में 31 दिसंबर छपा हुआ था, एक लम्हा के अंदर उसकी पतली उंगलियों की गिरफ़्त में था। अब कैलेंडर एक टूंड मुंड दरख़्त सा नज़र आने लगा। जिसकी टहनियों पर से सारे पत्ते

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ढारस

20 अप्रैल 2022
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आज से ठीक आठ बरस पहले की बात है। हिंदू सभा कॉलिज के सामने जो ख़ूबसूरत शादी घर है, उसमें हमारे दोस्त बिशेशर नाथ की बरात ठहरी हुई थी। तक़रीबन तीन साढ़े तीन सौ के क़रीब मेहमान थे जो अमृतसर और लाहौर

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तीन में ना तेरह में

20 अप्रैल 2022
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“मैं तीन में हूँ न तेरह में, न सुतली की गिरह में।” “अब तुमने उर्दू के मुहावरे भी सीख लिये।” “आप मेरा मज़ाक़ क्यों उड़ाते हैं। उर्दू मेरी मादरी ज़बान है।” “पिदरी क्या थी? तुम्हारे वालिद बुज़ु

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डायरेक्टर कृपलानी

20 अप्रैल 2022
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डायरेक्टर कृपलानी अपनी बलंद किरदारी और ख़ुश अतवारी की वजह से बंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री में बड़े एहतराम की नज़र से देखा जाता था। बा’ज़ लोग तो हैरत का इज़हार करते थे कि ऐसा नेक और पाकबाज़ आदमी फ़िल्म डायरे

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