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जान मोहम्मद

20 अप्रैल 2022

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मेरे दोस्त जान मुहम्मद ने, जब मैं बीमार था मेरी बड़ी ख़िदमत की। मैं तीन महीने हस्पताल में रहा। इस दौरान में वो बाक़ायदा शाम को आता रहा बाअज़ औक़ात जब मेरे नौकर अलील होते तो वो रात को भी वहीं ठहरता ताकि मेरी ख़बरगीरी में कोई कोताही न हो।

जान मुहम्मद बहुत मुख़लिस दोस्त है मैं क़रीब क़रीब बीस रोज़ तक बेहोश रहा था इस दौरान में वो आता लेकिन मुझे इस का इल्म नहीं था जब मुझे होश आया तो मालूम हुआ कि वो बहुत परेशान था रोता भी था इस लिए कि मेरी हालत बहुत नाज़ुक थी।

जब मैं इस काबिल हो गया कि बातचीत कर सकूं तो उस ने मुझ से पूछा “आप को थकावट तो महसूस नहीं होती।” मेरे आज़ा बिलकुल मफ़लूज हो चुके थे मालूम नहीं कितनी देर हो गई थी मुझे बिस्तर पर पड़े हुए। मैंने उस से कहा “जान मुहम्मद मेरा अंग अंग दुखता है”

इस ने फ़ौरन मेरी बीवी से कहा “कल ज़ैतून का तेल मंगवा दीजिए। मैं सुबह आ के मालिश कर दिया करूंगा”

ज़ैतून का तेल आ गया और जान मुहम्मद भी। उस ने मेरे सारे बदन पर मालिश की क़रीब क़रीब आध घंटा उस का इस मशक़्क़त में सर्फ़ हुआ मुझे बड़ी राहत महसूस हुई।

इस के बाद उस का मामूल हो गया कि हर रोज़ दफ़्तर जाने से पहले हस्पताल में आता और मेरे बदन पर मालिश करता मुझे राहत ज़रूर होती थी लेकिन वो इस ज़ोर से अपने हाथ चलाता कि मेरी हड्डियां तक दुखने लगतीं। चुनांचे मैं उस से अक्सर बड़े दुर्शित लहजे में कहता: “जान मुहम्मद! तुम तो मीर जान ले लोगे”

ये सुन कर वो मुस्कुरा देता: “मंटो साहब! आप तो बड़े सख़्त जान हैं इस मुट्ठी चापी से घबरा गए?”

मैं ख़ामोश हो जाता इस लिए उस की मुट्ठी चापी में कोई जारिहाना चीज़ नहीं थी बल्कि सर-ता-पा ख़ुलूस था।

तीन महीने हस्पताल में काटने के बाद घर आ गया जान मुहम्मद बदस्तूर हर रोज़ आता रहा। मेरी उस की दोस्ती इत्तिफ़ाक़न हो गई थी। एक रोज़ मैं घर में बैठा था कि एक नाटे क़द के छोटी छोटी मोंछों वाले जवाँसाल मर्द ने दरवाज़े पर दस्तक दी। मैं जब उस को अंदर कमरे में दाख़िल किया तो उस ने मुझे बताया कि वो मेरा मद्दाह है। “मंटो साहब मैंने आप को सिर्फ़ इस लिए तकलीफ़ दी है कि मैं आप को एक नज़र देखना चाहता था मैंने क़रीब क़रीब आप की सब तसानीफ़ पढ़ी हैं”

मैंने उस का मुनासिब-ओ-मौज़ूं अल्फ़ाज़ में रस्मी तौर पर शुक्रिया अदा किया तो उस को बड़ी हैरत हुई “मंटो साहब आप तो रसूम-ओ-क़यूद के क़ाइल ही नहीं फिर ये तकल्लुफ़ क्यों?”

मैंने कहा “नौवारिदों से बाअज़ औक़ात ये तकल्लुफ़ बरतना ही पड़ता है”

जान मुहम्मद की महीन मोंछों पर मुस्कुराहट नुमूदार हुई “मुझ से आप ये तकल्लुफ़ न बरतिए”

चुनांचे ये तकल्लुफ़ फ़ौरन दूर हो गया।

इस के बाद जान मुहम्मद ने हर रोज़ मेरे घर आना शुरू कर दिया। शाम को वो जब दफ़्तर से फ़ारिग़ होता तो सीधा मेरे यहां चला आता।

मेरी आदत है कि मैं किसी दोस्त का हसब नसब दरयाफ़्त नहीं करता इस लिए कि मैं उस की कोई ज़रूरत नहीं समझता मैं तो किसी से मिलूं तो उस से उस का नाम भी नहीं पूछता।

ये तमहीद काफ़ी लंबी हो गई हालाँकि मैं इख़्तिसार पसंद हूँ जान मुहम्मद देर तक मेरे यहां आता रहा उस की मालूमात ख़ासी अच्छी थीं। अदब से भी उसे ख़ासा शग़फ़ है मगर मैंने ये बात खासतौर पर नोट की कि वो ज़िंदगी से किसी क़दर बेज़ार है।

मुझे ज़िंदगी से प्यार है लेकिन उस को इस से कोई रग़बत नहीं थी हम दोनों जब बातें करते तो वो कहता: “मंटो साहब! आप मेरे लिबास को देखते हैं ये शलवार और क़मीस जो मलेशिया की है आप यक़ीनन नफ़रत की निगाहों से देखते होंगे मगर मुझे अच्छे लिबास की कोई ख़्वाहिश नहीं मुझे किसी ख़ूबसूरत चीज़ की ख़्वाहिश नहीं”

मैंने उस से पूछा: “क्यों?”

“बस मेरे अदर ये हिस्स ही नहीं रही मैं नंगे फ़र्श पर सोता हूँ निहायत वाहियात होटलों में खाना खाता हूँ ये देखिए मेरे नाख़ुन इतने बढ़े हुए हैं इन में कितना मेल भरा हुआ है मेरे पांव मुलाहिज़ा फ़रमाईए ऐसा नहीं लगता कि कीचड़ में लुथड़े हुए हैं मगर मुझे इन ग़लाज़तों की कुछ पर्वा नहीं।”

मैंने उस की ग़लाज़तों के मुतअल्लिक़ उस से कुछ न कहा वर्ना हक़ीक़त ये है कि हर वक़्त मैला कुचैला रहता था। उस को सफ़ाई के मुतअल्लिक़ कभी ख़याल ही नहीं आता था।

एक दिन हस्ब-ए-मामूल जब वो शाम को मेरे पास आया तो मैंने महसूस किया कि उस की तबीयत मुज़्महिल है। मैंने उस से पूछा “कियों जान मुहम्मद! क्या बात है आज थके थके से मालूम होते हो”

उस ने अपनी जेब से बगले की डिबिया निकाली और एक सिगरेट सुलगा कर जवाब दिया “थकावट हो ही जाती है कोई ख़ास बात नहीं” इस के बाद हम देर तक ग़ालिब की शायरी पर गुफ़्तुगू करते रहे। उस को ये फ़ारसी का शेअर बहुत पसंद आया।

माबनोवयम बदीं मर्तबा राज़ी ग़ालिब

शेअर ख़ुद ख़्वाहिश आं कुर्द कि गर्दो फ़िन मा

हम ग़ालिब की शायरी पर तब्सिरा कर रहे थे कि इतने में हमारे एक हमसाए की लड़की मेरी बीवी से मिलने चली आई। चूँकि वो पर्दा नहीं करती थी इस लिए वो हमारे दरमयान बैठ गई। जान मुहम्मद ने आँखें झुका लीं और ख़ामोश होगया।

उस लड़की का नाम शमीम था। देर तक वो बैठी मेरी बीवी और मुझ से बातें करती रही, लेकिन इस दौरान में जान मुहम्मद इसी तरह आँखें झुकाए ख़ामोश रहा। कुछ इस तरह कि उसे कोई पहचान न ले।

उस के बाद दूसरे दिन रात के दस बजे मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई नौकर ऊपर सो रहा था मैं दरवाज़ा खोला तो देखा कि जान मुहम्मद है। निहायत ख़स्ता हालत में। मैं बहुत परेशान हुआ और उस से पूछा: “क्यों जान मुहम्मद ख़ैरियत तो है”

इस के होंटों पर अजीब सी मुस्कुराहट पैदा हुई, जिस से मैं बिलकुल ना-आशना था, “ख़ैरियत है मुझे नींद नहीं आरही थी इस लिए मैं आप के पास चला आया”

मुझे सख़्त नींद आ रही थी मगर जान मुहम्मद ऐसे मुख़लिस दोस्त के लिए मैं उसे क़ुर्बान करने के लिए तैय्यार था मगर जब उस ने ऊटपटांग बातें शुरू कीं तो मुझे वहशत होने लगी उस का दिमाग़ ग़ैर मुतवाज़िन था कभी वो आसमान की बात करता कभी ज़मीन की। मेरी समझ में नहीं आता था कि अचानक उसे हो किया गया।

एक दिन पहले जब वो मुझ से मिला तो अच्छा भला था। एक दम इस में इतनी तबदीली कैसे पैदा होगई?

सारी रात उस ने मुझे जगाए रखा। आख़िर सुबह मैंने उस को ग़ुसल करने के लिए कहा। अपने कपड़े उसे पहनने के लिए दिए कि इस के मैले चकट थे। फिर उस को लारियों के अड्डे पर ले गया कि वो स्यालकोट अपने वालिदैन के पास चला जाये।

ग़लती मैंने ये की कि उस को लारी में न बिठाया। किराया वग़ैरा मैंने उसे दे दिया था। मैं मुतमइन था कि वो अपने घर चला जायेगा, मगर उसी दिन रात के तीन बजे दरवाज़े पर बड़े ज़ोर से दस्तक हुई। मैं बाहर सहन में सौ रहा था। हड़बड़ा कर उठा, सोचा कि शायद कोई तार आया हो। दरवाज़ा खोला तो सामने जान मुहम्मद मेरे औसान ख़ता होगए।

मैंने इस से पूछा कि वो स्यालकोट क्यों नहीं गया। उस ने इस सवाल का कोई माक़ूल जवाब न दिया। इस का दिमाग़ पहले से ज़्यादा ग़ैर-मुतवाज़िन था। फ़र्श पर लेट कर अपनी कनपटियों पर ज़ोर ज़ोर से घूंसे मारने लगा।

मेरी समझ में नहीं आता था, क्या करूं। वो यक़ीनन जुनून की हद तक पहुंच चुका था। मैंने सोचा, प्यार मुहब्बत से काम लेना चाहिए, चुनांचे बहुत देर तक मैं उस का सर सहलाता रहा। उस के बाद उस से पूछा, “जान मुहम्मद तुम्हें क्या तकलीफ़ है?”

उस ने कोई जवाब न दिया और फ़र्श पर मेरी बच्चियों के जो मार्बल पड़े हुए थे उन से खेलने लगा। उस के बाद उस ने हर मार्बल को सजदा किया और रोने लगा।

मैंने फिर इस से बड़ी मुहब्बत से पूछा, “जान मुहम्मद! ये तुम्हें क्या होगया है”

उस की आँखें सुर्ख़ अंगारा थीं जैसे कई दिनों से शराब के नशे में धुत है। उस ने मुझे इन आँखों से देखा और पूछा, “तुम इतने बड़े नफ़्सियात निगार बनते हो क्या ये नहीं जान सकते कि मुझे क्या होगया है?”

“मैं अपनी कम माईगी तस्लीम करता हूँ अब तुम ख़ुद बता दो”

जान मुहम्मद मुस्कुराया “मुझे शमीम हो गया है”

“क्या मतलब?”

“अब भी मतलब पूछते हैं आप”

मैंने उस से कहा “भई शमीम कोई बीमारी तो नहीं”

जान मुहम्मद हंसा “बहुत बड़ी बीमारी है मंटो साहब ये कई लोगों को हो चुकी है। उन में से मैं भी एक हूँ

पहले डलहौज़ी में होती थी अब यहां लाहौर चली आई है”

मैं समझ गया जान मुहम्मद कई बरस डलहौज़ी में रह चुका था और शमीम भी लेकिन मैंने उस से कहा। “मैं अभी तक नहीं समझा तुम अब सौ जाओ चलो आओ अंदर सोफे पर लेट जाओ। ख़बरदार जो तुम ने शोर मचाया”

वो अन्दर चला आया और सोफे पर लेट गया मैं सुबह जल्दी उठने का आदी हूँ। साढे़ चार बजे के क़रीब उठा तो देखा कि जान मुहम्मद ग़ायब है। सात बजे पता चला कि शमीम भी अपने फ़्लैट में नहीं है कहीं ग़ायब हो गई।

(१३ मई ५४-ई.) 

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रचनाएँ
सआदत हसन मंटो की प्रसिद्ध कहानियाँ
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पिछले दिनों मेरी रूह और मेरा जिस्म दोनों अ’लील थे। रूह इसलिए कि मैंने दफ़अ’तन अपने माहौल की ख़ौफ़नाक वीरानी को महसूस किया था और जिस्म इसलिए कि मेरे तमाम पुट्ठे सर्दी लग जाने के बाइ’स चोबी तख़्ते के मानि

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मुँह से कभी जुदा न होने वाला सिगार ऐश ट्रे में पड़ा हल्का हल्का धुआँ दे रहा था। पास ही मिस्टर मोईनुद्दीन आराम-ए-कुर्सी पर बैठे एक हाथ अपने चौड़े माथे पर रखे कुछ सोच रहे थे, हालाँ कि वो इस के आदी नहीं थ

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गाने लिखने वाला अ’ज़ीम गोबिंदपुरी जब ए.बी.सी प्रोडक्शंज़ में मुलाज़िम हुआ तो उसने फ़ौरन अपने दोस्त म्यूज़िक डायरेक्टर भटसावे के मुतअ’ल्लिक़ सोचा जो मरहटा था और अ’ज़ीम के साथ कई फिल्मों में काम कर चुका था। अ’

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नौ महीने पूरे हो चुके थे। मेरे पेट में अब पहली सी गड़बड़ नहीं थी। पर मिसिज़ डी कोस्टा के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। वो बहुत परेशान थी। चुनांचे मैं आने वाले हादिसे की तमाम अन-जानी तकलीफें भूल गई थी और मिस

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अमृतसर में अली मोहम्मद की मनियारी की दुकान थी छोटी सी मगर उस में हर चीज़ मौजूद थी उस ने कुछ इस क़रीने से सामान रखा था कि ठुंसा ठुंसा दिखाई नहीं देता था। अमृतसर में दूसरे दुकानदार ब्लैक करते थे मगर अली

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शाम को मैं घर बैठा अपनी बच्चियों से खेल रहा था कि दोस्त ताहिर साहब बड़ी अफरा-तफरी में आए। कमरे में दाख़िल होते ही आप ने मैंटल पीस पर से मेरा फोंटेन पेन उठा कर मेरे हाथ में थमाया और कहा कि “हस्पताल में

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मजीद की माहाना आमदनी ढाई हज़ार रुपय थी। मोटर थी। एक आलीशान कोठी थी। बीवी थी। इस के इलावा दस पंद्रह औरतों से मेल जोल था। मगर जब कभी वो विस्की के तीन चार पैग पीता तो उसे अपना माज़ी याद आजाता। वो सोचता कि

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अजब बात है कि जब भी किसी लड़की या औरत ने मुझे ख़त लिखा भाई से मुख़ातब किया और बे-रबत तहरीर में इस बात का ज़रूर ज़िक्र किया कि वो शदीद तौर पर अलील है। मेरी तसानीफ़ की बहुत तारीफ़ें कीं। ज़मीन-ओ-आसमान के कुलाब

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बाबू गोपी नाथ से मेरी मुलाक़ात सन चालीस में हूई। उन दिनों मैं बंबई का एक हफ़तावारपर्चा एडिट किया करता था। दफ़्तर में अबदुर्रहीम सीनडो एक नाटे क़द के आदमी के साथ दाख़िल हुआ। मैं उस वक़्त लीड लिख रहा था। सी

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20 अप्रैल 2022
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एक निहायत ही थर्ड क्लास होटल में देसी विस्की की बोतल ख़त्म करने के बाद तय हुआ कि बाहर घूमा जाये और एक ऐसी औरत तलाश की जाये जो होटल और विस्की के पैदा करदा तकद्दुर को दूर कर सके। कोई ऐसी औरत ढूँडी जाय

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टी हाऊस में हरामियों की बातें शुरू हुईं तो ये सिलसिला बहुत देर तक जारी रहा। हर एक ने कम अज़ कम एक हरामी के मुतअल्लिक़ अपने तअस्सुरात बयान किए जिस से उस को अपनी ज़िंदगी में वास्ता पड़ चुका था। कोई जालंधर

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माई जनते स्लीपर ठपठपाती घिसटती कुछ इस अंदाज़ में अपने मैले चकट में दाख़िल हुई ही थी कि सब घर वालों को मालूम हो गया कि वो आ पहुंची है। वो रहती उसी घर में थी जो ख़्वाजा करीम बख़्श मरहूम का था अपने पीछे क

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शाम को सैर के लिए निकला और टहलता टहलता उस सड़क पर हो लिया जो कश्मीर की तरफ़ जाती है। सड़क के चारों तरफ़ चीड़ और देवदार के दरख़्त, ऊंची ऊंची पहाड़ियों के दामन पर काले फीते की तरह फैले हुए थे। कभी कभी हवा के

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लाहौर से बाबू हरगोपाल आए तो हामिद घर का रहा न घाट का। उन्होंने आते ही हामिद से कहा, “लो, भई फ़ौरन एक टैक्सी का बंदोबस्त करो।” हामिद ने कहा, “आप ज़रा तो आराम कर लीजिए। इतना लंबा सफ़र तय करके यहां आए

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मालूम नहीं बाबू गोपी नाथ की शख़्सियत दर-हक़ीक़त ऐसी ही थी जैसी आप ने अफ़साने में पेश की है, या महज़ आपके दिमाग़ की पैदावार है, पर मैं इतना जानता हूँ कि ऐसे अजीब-ओ-ग़रीब आदमी आम मिलते हैं। मैंने जब आपका अफ़

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20 अप्रैल 2022
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ये उन दिनों का वाक़िया है। जब मशरिक़ी और मग़रिबी पंजाब में क़तल-ओ-ग़ारतगरी और लूट मार का बाज़ार गर्म था। कई दिन से मूसलाधार बारिश होरही थी। वो आग जो इंजनों से न बुझ सकी थी। इस बारिश ने चंद घंटों ही में ठ

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मोमबत्ती के आँसू

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ग़लीज़ ताक़ पर जो शिकस्ता दीवार में बना था, मोमबत्ती सारी रात रोती रही थी। मोम पिघल पिघल कर कमरे के गीले फ़र्श पर ओस के ठिठुरे हुए धुँदले क़तरों के मानिंद बिखर रहा था। नन्ही लाजो मोतियों का हार लेने

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रिश्वत

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अहमद दीन खाते पीते आदमी का लड़का था। अपने हम उम्र लड़कों में सबसे ज़्यादा ख़ुशपोश माना जाता था, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि वो बिल्कुल ख़स्ता हाल हो गया। उसने बी.ए किया और अच्छी पोज़ीशन हासिल की। वो

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नारा

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उसे यूं महसूस हुआ कि उस संगीन इमारत की सातों मंज़िलें उसके काँधों पर धर दी गई हैं। वो सातवें मंज़िल से एक एक सीढ़ी कर के नीचे उतरा और तमाम मंज़िलों का बोझ उसके चौड़े मगर दुबले कांधे पर सवार होता गय

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कुछ अर्से से अक़ल्लियतें अपने हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए बेदार हो रही थीं। उन को ख़्वाब-ए-गिरां से जगाने वाली अक्सरियतें थीं जो एक मुद्दत से अपने ज़ाती फ़ायदे के लिए उन पर दबाओ डालती रही थीं। इस बेदार

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जाओ हनीफ़ जाओ

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चौधरी ग़ुलाम अब्बास की ताज़ा तरीन तक़रीर-ओ-तबादल-ए-ख़यालात हो रहा था। टी हाउस की फ़ज़ा वहां की चाय की तरह गर्म थी। सब इस बात पर मुत्तफ़िक़ थे कि हम कश्मीर ले कर रहें गे, और ये कि डोगरा राज का फ़िल-फ़ौर ख़ात

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जान मोहम्मद

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मेरे दोस्त जान मुहम्मद ने, जब मैं बीमार था मेरी बड़ी ख़िदमत की। मैं तीन महीने हस्पताल में रहा। इस दौरान में वो बाक़ायदा शाम को आता रहा बाअज़ औक़ात जब मेरे नौकर अलील होते तो वो रात को भी वहीं ठहरता ताकि

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जेंटिलमेनों का बुरश

20 अप्रैल 2022
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ये ग़ालिबन आज से बीस बरस पीछे की बात है। मेरी उम्र यही कोई बाईस बरस के क़रीब होगी, या शायद इस से दो बरस कम। क्योंकि तारीख़ों और सनों के मुआमले में मेरा हाफ़िज़ा बिलकुल सिफ़र है। मेरी दोस्ती का हल्क़ा उन

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देख कबीरा रोया

20 अप्रैल 2022
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नगर नगर ढिंडोरा पीटा गया कि जो आदमी भीक मांगेगा उसको गिरफ़्तार कर लिया जाये। गिरफ्तारियां शुरू हुईं। लोग ख़ुशियां मनाने लगे कि एक बहुत पुरानी ला’नत दूर हो गई। कबीर ने ये देखा तो उसकी आँखों में आँ

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टू टू

20 अप्रैल 2022
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मैं सोच रहा था, दुनिया की सबसे पहली औरत जब माँ बनी तो कायनात का रद्द-ए-अ’मल क्या था? दुनिया के सबसे पहले मर्द ने क्या आसमानों की तरफ़ तमतमाती आँखों से देख कर दुनिया की सब से पहली ज़बान में बड़े फ़ख़्

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डरपोक

20 अप्रैल 2022
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मैदान बिल्कुल साफ़ था, मगर जावेद का ख़याल था कि म्युनिसिपल कमेटी की लालटेन जो दीवार में गड़ी है, उसको घूर रही है। बार बार वो उस चौड़े सहन को जिस पर नानक शाही ईंटों का ऊंचा-नीचा फ़र्श बना हुआ था, तय कर क

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दीवाली के दीये

20 अप्रैल 2022
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छत की मुंडेर पर दीवाली के दीये हाँपते हुए बच्चों के दिल की तरह धड़क रहे थे। मुन्नी दौड़ती हुई आई। अपनी नन्ही सी घगरी को दोनों हाथों से ऊपर उठाए छत के नीचे गली में मोरी के पास खड़ी हो गई। उसकी रोती

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तस्वीर

20 अप्रैल 2022
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“बच्चे कहाँ हैं?” “मर गए हैं।” “सब के सब?” “हाँ, सबके सब... आपको आज उनके मुतअ’ल्लिक़ पूछने का क्या ख़याल आ गया।” “मैं उनका बाप हूँ।” “आप ऐसा बाप ख़ुदा करे कभी पैदा ही न हो।” “

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नया साल

20 अप्रैल 2022
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कैलेंडर का आख़िरी पत्ता जिस पर मोटे हुरूफ़ में 31 दिसंबर छपा हुआ था, एक लम्हा के अंदर उसकी पतली उंगलियों की गिरफ़्त में था। अब कैलेंडर एक टूंड मुंड दरख़्त सा नज़र आने लगा। जिसकी टहनियों पर से सारे पत्ते

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ढारस

20 अप्रैल 2022
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आज से ठीक आठ बरस पहले की बात है। हिंदू सभा कॉलिज के सामने जो ख़ूबसूरत शादी घर है, उसमें हमारे दोस्त बिशेशर नाथ की बरात ठहरी हुई थी। तक़रीबन तीन साढ़े तीन सौ के क़रीब मेहमान थे जो अमृतसर और लाहौर

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तीन में ना तेरह में

20 अप्रैल 2022
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“मैं तीन में हूँ न तेरह में, न सुतली की गिरह में।” “अब तुमने उर्दू के मुहावरे भी सीख लिये।” “आप मेरा मज़ाक़ क्यों उड़ाते हैं। उर्दू मेरी मादरी ज़बान है।” “पिदरी क्या थी? तुम्हारे वालिद बुज़ु

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डायरेक्टर कृपलानी

20 अप्रैल 2022
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डायरेक्टर कृपलानी अपनी बलंद किरदारी और ख़ुश अतवारी की वजह से बंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री में बड़े एहतराम की नज़र से देखा जाता था। बा’ज़ लोग तो हैरत का इज़हार करते थे कि ऐसा नेक और पाकबाज़ आदमी फ़िल्म डायरे

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