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कचोटती तन्हाइयां -भाग 19

2 अगस्त 2023

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जब से सूर्य प्रताप ने अपनी वसीयत कर अपनी हजारों एकड़ की भूमि में से शिव प्रताप को महज ढा़ई सौ एकड़ भूमि दी थी और दिव्या ने भी इस पक्षपात पर कुछ न कहा था तब से शिव प्रताप के मन से माँ दिव्या भी दूर हो गई थीं ,उसे अब न भीतर से माँ के लिए कुछ लगता न पिता के लिए मगर उसने अपनी नववधू मानसी से इस संबंध में अभी कुछ न बताया था  और उससे यही कहा था कि तुम थोडे़ समय भोजन बना लो ,बाद की बाद में देखी जाएगी मगर सुरतिया के द्वारा सुझाया उपाय दिव्या व मानसी दोनों को जँच गया था और रात्रि को सूर्य प्रताप के भोजन करने आने से पूर्व मानसी पाकशाला में उपस्थित हो गई और उसने सूर्य प्रताप को अपने हाथों से भोजन परोसा ।

सूर्य प्रताप भानु ने संतुष्ट मन से भोजन गृहण किया और हवेली के बाहर चले गए ।मानसी भोजन के पश्चात दिव्या के चरण चापण करती थी अतः वे भोजन करके कुछ देर बाहर चले जाते उसके बाद अपने कक्ष में जाते तब तक मानसी जा चुकी होती थी ।

अब दिव्या भी सुकून में थी और मानसी भी, दिन आराम से कटते जा रहे थे मगर ये सब कुटिल बुद्धि दिव्य को कहाँ पचने वाला था भला !!
उसे तो भली -भाँति पता था कि भोजन सुरतिया काकी ही बनाती हैं ,, भाभी तो बस पिताजी के आने से पूर्व पाकशाला में आकर पिताजी को भोजन परोस देती हैं ।

दिव्य ने अगले दिवस अवसर देखकर पिता सूर्य प्रताप भानु के कान भरे -"पिताजी ,आपको न लगता कि जो स्वाद सुरतिया काकी के बनाए भोजन में था वही स्वाद अभी भी भोजन में है ,,उससे कुछ इतर नहीं !!"

"तुम कहना क्या चाहते हो दिव्य ?"सूर्य प्रताप ने अचरज से पूछा ।

"यही कि भोजन अब भी सुरतिया काकी ही बनाती हैं ,भाभी तो बस आपके आने से पूर्व पाकशाला में आकर आपको भोजन परोस देती हैं बस !"

"तुम इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो !!"सूर्य प्रताप भानु ने पूछा ।

"क्योंकि मैंने अपनी आँखों से देखा है पिताजी ,,, आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो आप अकस्मात हवेली के भीतर जाकर अपनी आँखों से स्वयं देख लें ,आपको भोजन बनाती सुरतिया काकी ही मिलेगीं, भाभी नहीं।"दिव्य ने कहा ।

सूर्य प्रताप ने कहा कुछ नहीं और दनदनाते हुए हवेली के भीतर पहुँचे जहाँ सुरतिया एक तरफ दाल चढा़ए,दूसरी तरफ तरकारी भून रही थी ।
सूर्य प्रताप के क्रोध का पारावार न रहा ,,, वो चीखे -"दिव्याआआआआ ।"

सूर्य प्रताप को यूँ चीखते सुनकर दिव्या अपने कक्ष से बाहर आई और मानसी अपने कक्ष के बाहर आकर बोली -"क्या बात है पिताजी! जो बात है आप मुझसे कहें ,,, माँ को इस तरह चीख कर मत पुकारें ।" 
सूर्य प्रताप ने मानसी की तरफ देखते हुए दिव्या से कहा -"ऐसा है मुझे इस हवेली में मुफ्त की रोटियाँ तोड़ने वाले न चाहिए ,, ।"
दिव्या ने मानसी की तरफ देखा तब तक शिव प्रताप भानु भी कक्ष से बाहर आ गया और मानसी से बोला -"मानसी तुम भोजन बनाया करो ,मैंने उस दिन भी तुमसे कहा था ना !!"

मानसी बोली -" अब से मैं पाकशाला भी सँभालूँगी ,इसलिए नहीं कि मेरे पति ने मुझसे कहा बल्कि इसलिए कि मैं न चाहती कि मेरी वजह से मेरी माँ को डाँट सुननी पडे़ व उनका मन दुखे ,,मैं अपनी वजह से घर में कोई तनाव न चाहती हूँ ,, मैं तो इसलिए भोजन न बना रही थी क्योंकि मेरी आदत नहीं पाकशाला में नित्य का भोजन बनाने की मगर अब मैं दोनों समय का भोजन बनाऊँगी " इतना कहकर मानसी ने अपनी साडी़ का पल्लू अपनी कमर में खोंसा और पाकशाला में जाकर सुरतिया से बोली -"काकी ,आप मुझे बता दें कि कौन सामान कहाँ रखा है बस ,फिर आप जाएं बाकी का भोजन मैं बनाऊँगी।"

सुरतिया ने सारे सामान उसे बता दिए और पाकशाला से बाहर आ गई।
दिव्य प्रताप भानु के कलेजे को ठंड़क पडी़ और वो अपने विद्यालय,  जो कि पैंतालिस किलोमीटर दूर तहसील स्तर पर था ,चला गया ।

अब मानसी दोनों समय के भोजन के साथ साथ पूरी हवेली के कार्य सँभालती और दिव्या व सूर्य प्रताप की सेवा भी करती थी ।
शिव प्रताप को ये सब बहुत अखर रहा था मगर वो सही समय आने पर ही  मानसी के समक्ष मन की बात प्रकट  करना चाहता था ।

"इस सब के बीच में आपने नंदिनी के बारे में तो बताया ही नहीं !! नंदिनी और मनिका ,उनका हाल-चाल कोई लेता भी था या उन दोनों को सब भुला ही बैठे थे !!" मादा गौरैया ने नर गौरैया से पूछा ।

"श्रीधन व सुरतिया को बेटी मनिका के पत्र आते थे जिससे उन्हें अपनी मनिका के साथ नंदिनी के भी हाल-चाल मिल जाते थे ,मनिका के पत्रों द्वारा ही श्रीधन व सुरतिया को पता चला था कि नंदिनी अपनी छोटी सी दुनिया में खुश है, नंदिनी शिव प्रताप को भी पत्र लिखती थी और शिव प्रताप भी नंदिनी को पत्र लिखकर हाल ले लेता था ।"नर गौरैया ने मादा गौरैया को बताते हुए आगे की कथा सुनानी प्रारंभ की --

यूँ ही समय बीतता जा रहा था ,, कुछ समय पश्चात  दिव्य के लिए एक रिश्ता आया , लड़की छह भाइयों की अकेली बहन थी , आर्थिक स्थिति निम्न थी पर सूर्य प्रताप को दिव्य प्रताप के लिए वो लड़की जिसका नाम कनक था पसंद आ गई थी ।कनक दिखने में आकर्षक व गौर वर्ण की स्वामिनी थी।
सूर्य प्रताप ने कनक की फोटो हवेली में भिजवाई और दिव्या व मानसी को भी कनक पसंद आ गई ।
धूमधाम से दिव्य प्रताप और कनक का विवाह संपन्न हो गया और कनक दिव्य की पत्नी बनकर हवेली में आ गई।
दो दो बहुए पाकर हवेली की रौनक और बढ़ गई थी ।

अब कनक के चूल्हा पूजन की बारी आई तो सह्रदय दिल की मानसी ने सोचा कि एक बार चूल्हा पूजन हो गया तो फिर अगले दिन से कनक को भी पाकशाला में पसीना बहाना पडे़गा ,, उसने दिव्या के सामने ये बात रखी ।दिव्या का दिव्य तो वैसे ही लाड़ला था ,तो उसकी पत्नी को दिव्या पीछे कैसे रख सकती थी भला !!
उसने मानसी से कहा -" हाँ तुम सही कह रही हो ,, ...............शेष अगले भाग में ।

Sandhya

Sandhya

अच्छी कहानी

24 अगस्त 2023

46
रचनाएँ
कचोटती तनहाइयाँ
4.6
मैं आप सबके लिए एक नई कहानी लेकर आई हूँ ,जिसका शीर्षक है 'कचोटती तनहाइयाँ '। मेरी ये कहानी पूर्णतः काल्पनिक है ।मेरी ये कहानी है कहानी के नायक सूर्य प्रताप भानु व उसकी सहधर्मिणी दिव्या प्रताप भानु की । सूर्य प्रताप भानु जो अपने पूर्वजों द्वारा प्राप्त हजारों एकड़ भूमि का स्वामी है और दो बेटों शिव प्रताप भानु व दिव्य प्रताप भानु का पिता है । मेरी ये कहानी 'कचोटती तनहाइयाँ ' वृद्धावस्था में अपनी कचोटती तनहाइयों से जूझ रहे सूर्य प्रताप भानु व दिव्या प्रताप भानु की है,अपनी कचोटती तनहाइयों के लिए ये दोनों स्वयं जिम्मेदार हैं ।हर बार इंसान की औलाद ही दोषी न होती है ,कभी कभी माँ और बाप भी ऐसा कुछ कर जाते हैं जिसका परिणाम उन्हें अपनी वृद्धावस्था में भुगतना पड़ता है जैसे सूर्य प्रताप भानु व दिव्या प्रताप भानु भुगत रहे हैं । आखिर हुआ क्या !! ये जानने के लिए पढे़ं मेरी कहानी -'कचोटती तनहाइयाँ ' 😊🙏🙏
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गोधूलि बेला होने वाली है ।गोधूलि बेला में चरवाहे अपने गोवंशों को घर ले जाते हैं, भगवान भास्कर अपना उदास,क्लांत, मुख लिए पश्चिम में जाते हैं और विहग अपने नीड़ की तरफ लौटते हैं ,ऐसे ही गोधूलि बेला में ग

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कथा सुनते मादा गौरैया सोने लगी थी और नर गौरैया भी ऊँघने लगा था ।"ऊँहहूँ , बडी़ आफत है !दिनभर मजदूरी करके आओ,रात में सोने को मिलता है तो ये बुढ़ऊ भक्क भक्क लगाकर सारी नींद बिगाड़ देते हैं !!"सत्य शरण न

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उस दिवस जो, विहग ने सूर्य प्रताप भानु और दिव्या प्रताप भानु के कक्ष से निकलकर हवेली के प्रांगण में बने अपने कोठर में बैठकर अपना सिर अपनी गर्दन पर टिका लिया था , तो उस दिवस से उसने सूर्य प्रताप भानु के

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दिव्य प्रताप भानु ,नंदिनी के साथ इसलिए न खेलता कि कहीं वो उससे उसके खिलौने न माँग ले और दूसरी बात अपनी बहन नंदिनी के जन्म पर जो उसके पिता ने कहा व व्यवहार किया था ,उसके कोमल मन पर उसकी छाप बन गई थी ,उ

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नंदिनी हवेली के मुख्य दरवाजे की ओट से अपना मासूम मन लिए हुए बाहर बैठे पिता व दोनों दादा को देख रही थी।सूर्य प्रताप भानु ने तो नंदिनी का विद्यालय में दाखिला तक न करवाया था ,नंदिनी दिव्य प्रताप भानु को

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सूर्य प्रताप भानु के तीनों बच्चे बडे़ हो रहे थे ।अपनी उम्र पूरी करके दिव्या का प्रिय विहग स्वर्ग सिधार गया था ,जिसकी वजह से दिव्या बहुत शोकाकुल रहने लगी थी। शिव प्रताप भानु पिता के कार्यों में हाथ बँट

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"मेरी पीठ पीछे क्या होता रहता है !! स्पष्ट बताओ,पहेलियाँ न बुझाओ !!"सूर्य प्रताप भानु ने कहा।शिव प्रताप भानु हैरानी से छोटे भाई दिव्य को देखने लगा कि ये क्या कहने आया है यहाँ !!दिव्य प्रताप भानु ने कु

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नर गौरैया ने आगे की कथा मादा गौरैया को पुनः सुनानी आरंभ कर दी --जहाँ एक तरफ शिव प्रताप के मन में अपने पिता सूर्य प्रताप के प्रति पर्याप्त खटास आ गई थी वहीं दिव्य प्रताप ने मन ही मन निश्चय किया था कि प

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श्रीधन सूर्य प्रताप भानु के समीप खडे़ होकर बोला -"मालिक अपनी हवेली के दक्षिण तरफ जो मुख्य मार्ग गया है उस पर जाकर आगे चलकर जो थोडा़ वन क्षेत्र पड़ता है ,उसके आगे ही एक नदी पड़ती है ,,वो नदी पार करने क

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सुरतिया पाकशाला का कार्य समेट रही थी और समेटते समेटते ही उसने मनिका व नंदिनी की बात सुनी थी तो उसका मन भी खिन्न हो गया था ,होता भी क्यों नहीं !! माना हवेली के भीतरी कार्यों में लगे रहने की वजह से उसे

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"जानती हूँ मैडम जी ,, उसी संबंध में बात करने आई हूँ।"सुरतिया ने दिव्या के पैरों के पास भूमि पर पडी़ दरी पर बैठते हुए कहा ।"हाँ बोल क्या बात करनी है तुझे ?"दिव्या ने पूछा ।"वो मैडम जी ,कल रात से

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दिव्या का बुझा और उदास मन याद करने लगा कि कब 'इन्होनें' मुझसे प्यार से बात की !! विवाह के बाद से अभी तक इन्होने उसपर अपनी व्यस्तता ही तो थोपी , अपना रौब ही तो झाडा़ और कुछ नहीं ,,, प्यार के दो बोल तो

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31 जुलाई 2023
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नंदिनी के विवाह के दो दिन रह गए थे और दिव्या मन ही मन ये सोचकर कुढ़ रही थी कि इनको लोकलाज की भी परवाह नहीं है ,, ये नहीं सोचते कि सामने भले कोई न बोले मगर पीठ पीछे तो लोग हँसकर कहेंगे ही कि देखो

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1 अगस्त 2023
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दिव्य प्रताप भानु प्रसन्न होता हुआ ,मन ही मन अपनी पीठ थपथपाता हुआ हवेली के बाहर जा रहा था कि मैं जैसा सोच रहा था सबकुछ वैसे ही हो रहा है अब मुझे अपना दाँव खेलना है ।गोपी हवेली के सामने वाले शिव मंदिर

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1 अगस्त 2023
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पूरे विधि विधान से कुशलता पूर्वक नंदिनी का विवाह संपन्न हो गया था और विवाह संपन्न होते होते भोर हो गई थी ।भोर में कलेवा होने लगा ।सूर्य प्रताप भानु ने हवेली के बाहर बने बरामदे में कलेवा में ही नंदिनी

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नंदिनी मनिका को लेकर विदा होकर नवीश के साथ चली गई ,तत्पश्चात श्रीधन हवेली की और उसके सामने शिव मंदिर की सारी सजावट कृषकों की मदद से हटवाने लगा ।शिव प्रताप भानु रात का बचा भोजन व मिठाइयाँ भीतर रखवाकर प

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2 अगस्त 2023
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अब वो समय आ गया था जब शिव प्रताप भानु और दिव्य प्रताप भानु दोनों के विवाह के लिए रिश्ते आना प्रारंभ हो गए थे।सूर्य प्रताप लड़की वालों से वार्ता करते और उनके द्वारा लाई उनकी बेटी की फोटो हवेली के

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2 अगस्त 2023
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" ओहो , एक तो सूर्य प्रताप का नंदिनी के प्रति ऐसा व्यवहार कि भाई शिव के द्वारा उसके संदूक में जेवर रख देने से आग बबूला हो जाना , अपनी हजारों एकड़ की जमीन में से शिव प्रताप को महज ढा़ई सौ एकड़ दे

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2 अगस्त 2023
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जब से सूर्य प्रताप ने अपनी वसीयत कर अपनी हजारों एकड़ की भूमि में से शिव प्रताप को महज ढा़ई सौ एकड़ भूमि दी थी और दिव्या ने भी इस पक्षपात पर कुछ न कहा था तब से शिव प्रताप के मन से माँ दिव्या भी दूर हो

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 20

3 अगस्त 2023
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दिव्या व मानसी बात कर ही रही थीं कि दिव्या के कक्ष में दिव्य ने प्रवेश किया ।"अरे दिव्य ,मेरा लाड़ला बेटा ,आओ ,आओ ।"दिव्या ने उठकर आगे बढ़ते हुए दिव्य प्रताप भानु से स्नेह का गागर उडे़लते हुए कहा ।दिव

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 21

3 अगस्त 2023
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श्रीधन दिव्य से कुछ भी कहने की हिम्मत न कर सका और दिव्य की तरफ देखकर -"नहीं ,कुछ नहीं बेटा"कहकर वापस हवेली के पीछे बने अपने घर लौट गया ।श्रीधन के घर जाने के दो रास्ते थे ,एक हवेली के गलियारे से होते ह

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 22

7 अगस्त 2023
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।श्रीधन हवेली में दबे पाँव आ तो गया मगर चूंकि वो प्रथम बार हवेली के भीतर आया था तो उसे दिव्य प्रताप भानु का कक्ष कौन सा है ये न पता था अतः वो हर कक्ष के पास से दबे पाँव गुजरता हुआ हर कक्ष के अंदर झांक

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 23

7 अगस्त 2023
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" उफ़ ! ये दिव्य तो बहुत ही बुरा इंसान है, अपने ही भाई को फंसा रहा है जबकि उसकी कोई ग़लती ही नहीं इस सब में !!" मादा गौरैया ने नर गौरैया से कहा ।" हां ,ये इंसान और इनकी प्रकृति ऐसी ही होती है ,ये अपने

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 24

7 अगस्त 2023
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सुरतिया श्रीधन को लेकर अस्पताल के बाहर पड़े परिसर के एक वृक्ष के नीचे बैठ गई और रोते हुए बोली - "ये आपने क्या कर दिया ! अब हम कहां रहेंगे ,क्या खाएंगे ! " " मैं भी जा रहा हूं दिव्य दादा , यहां कब

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 25

7 अगस्त 2023
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कनक बिना कुछ कहे ही चली गई, बडे़ और उदार ह्रदय वाली मानसी ने भी घर में शांति बनी रहे इस हेतु आगे कुछ न कहा और सारे कार्य स्वयं ही करती रही ।मानसी की चुप्पी से कनक और ज्यादा मनमानी करने लगी और मा

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 26

7 अगस्त 2023
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"क्या ! पिताजी ने हमारे साथ इतना पक्षपात किया और मां ने कुछ न कहा क्या !आप भी तो उनके बेटे हो और बडे बेटे हो कोई आपको कहीं से उठा कर तो न लाया गया !!"मानसी ने राज प्रताप भानु को सुलाते हुए कहा ।" एक त

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8 अगस्त 2023
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"ये कैसा बंटवारा है पिताजी !! पूरी हवेली दिव्य प्रताप भानु की और जितना परिसर पड़ा वो सब मेरा !! मैं पहले अपने लिए घर बनवाऊं तब जा कर रह पाऊं !! "शिव प्रताप भानु ने हैरानी में भरकर पिता सूर्य प्रताप भा

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 28

8 अगस्त 2023
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हवेली के पीछे श्रीधन के लिए जो घर सूर्य प्रताप भानु ने दिया था वो बस दो कक्षों का एक छोटा सा घर था जिसमें एक कक्ष इतना छोटा था कि उसमें पाकशाला ही हो सकती थी , दूसरा कक्ष ही था जिसमें दो पलंग पड़ने के

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 29

8 अगस्त 2023
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जैसे जैसे बच्चे बडे़ हो रहे थे उन्हें चीजें समझ आ रही थीं । शिवन्या, शिवल्या और शिवाली को समझ आने लगा था कि बाबा उन्हें पसंद न‌ करते हैं तो वो अब हवेली न‌ जाकर अपने यहां शिव‌ मंदिर के सामने ही अपने गु

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दिव्य प्रताप भानु के बच्चों की पढाई हो चुकी थी इसलिए वे अपनी मां कनक के साथ हवेली ही रुक गए थे मगर दिव्य प्रताप भानु की सरकारी नौकरी थी अत: वो वापस चला गया था ,कनक ने दिव्य प्रताप भानु से कह दिय

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शिव प्रताप भानु को एक पिता का जो स्नेह सूर्य प्रताप भानु से न मिला था वो उसे श्रीधन से मिलता महसूस होता था ,यही कारण था कि वो श्रीधन से हर छोटी-बड़ी बात कहकर अपना मन हल्का कर लेता था ।आज भी वो अपने खे

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मानसी शिव प्रताप भानु के पास बैठती हुई बोली ,-" राज और राग दोनों हवेली के बंटवारे की बात करने पिताजी के पास जाएंगे , मुझे तो यही लग रहा है कि पहले तो पिताजी ही उसके बाद दिव्य प्रताप और उनके दिवाकर व द

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मानसी बोली -" उनके बाप का नहीं मगर उनके बाबा का तो घर है ,वो बाबा ,जिनका स्वास्थ्य इतना खराब हो गया था कि वे मरणासन्न हो गए थे तब तो तुम और देवर जी अपने -अपने मुंह छुपाए वहां पड़े हुए थे तब इनके बाप न

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पिता ससुर सूर्य प्रताप भानु के इस निर्णय को सुनकर कनक का मुंह उतर गया और दिवाकर प्रताप भानु और दिनकर प्रताप भानु के चेहरों पर भी बारह बज गए ।सूर्य प्रताप भानु ने आगे राज प्रताप भानु और राग प्रता

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सबके पेट दुख रहे थे दिव्य प्रताप भानु और उसके बेटों को हवेली में रहते देखकर ,खाना न‌ हजम हो रहा था ,हवेली बंटवा ली तभी सबके कलेजे को ठंड़क पड़ी ।"दिव्या यूं भुनभुनाते हुए ये भी न सोच रही थी कि उ

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"पिताजी , आपकी पोती का श्रावस्ती जिले में विवाह देख आया हूं , आपको विवाह की बातचीत तय करने चलना है ।" शिव प्रताप भानु ने कहा ।दिव्यांश प्रताप भानु को पता चला कि शिव प्रताप ताऊ जी आए हैं तो

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राज प्रताप की बात सुनकर शिव‌ प्रताप भानु समझ गया कि इसने मेरी और मानसी की विगत रात्रि की बात सुन ली है तभी इसने अपनी दादी के समक्ष प्रश्न उठाया है वहीं राज प्रताप भानु के मुंह से 'बाबा की तो पूरी तिजो

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11 अगस्त 2023
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बाबा सूर्य प्रताप भानु का उत्तर सुनकर राज प्रताप भानु और राग प्रताप भानु उठकर जाने लगे ।घर के अंदर से अपने ट्रांसपोर्ट के लिए जाते दिनकर प्रताप भानु ने बाबा और राज दादा व राग दादा की बात सुनी और वो व्

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दिव्यांश प्रताप भानु , शिवन्या के विवाह में सम्मिलित हुआ था , ये राज प्रताप भानु को तो न बुरा लगा क्योंकि वो सुलझे दिमाग का और सह्रदय था मगर राग प्रताप भानु का उसको देखकर मुंह बना ही रहा ।अगले दिन जब

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सूर्य प्रताप भानु ने अपने दरवाजे पर राज प्रताप भानु और राग प्रताप भानु को आया देखकर उनसे कहा -" कहो शिव प्रताप के दूतों , आज शिव प्रताप की तरफ से क्या संदेश लेकर आए हो !!" " चरण स्पर्श बाबा , हम

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13 अगस्त 2023
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शिवल्या भी अपने भाइयों , पिता व मां को परेशान‌ देखकर दुखित थी और दोपहर का भोजन‌‌ कर अपने कक्ष में लेटी हुई करवटें बदलती जा रही थी , जब चैन‌ न पडा़ तो सोचा कि चलकर कुछ क्षण शिव‌ मंदिर में ही बैठूं ! और

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 42

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दिव्यांश प्रताप भानु का विवाह कुशलतापूर्वक निपट गया था और शिवन्या और शिवल्या अपने अपने पतियों के साथ अपने ससुराल वापस जाने के लिए सामान बांध‌ रही थीं ।सामान बांधने के बाद शिवन्या और शिवल्या दोनों मां

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 43

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राज प्रताप भानु खेतों पर काम करते हुए पिता से बोला -" पिताजी ,आप चिंता न करें, शिवाली ने कह दिया है मगर वो एक दिन‌ भी भूख सह न पाएगी और भोजन कर लेगी , वो एक दिन भोजन न करे वो मैं सह सकता हूं मगर उसको

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 44

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शिवाली के लिए इसके आगे एक शब्द भी कहा तो मैं तुम्हारी जुबान खींच लूंगा ,मुझे शिवाली के लिए ऐसे शब्द सुनना कदापि स्वीकार नहीं है , तुम्हें पूरी सौ एकड़ भूमि चाहिए ना , ठीक है तुम्हें पूरी सौ एकड़ भूमि

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 45

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शिव प्रताप भानु का कोई समाचार न‌ मिलने के कारण श्रीधन का मन छटपटाता रहा ........... राज प्रताप भानु बहन शिवाली के विवाह की तिथि समीप आने के कारण विवाह की बची हुई तैयारियों में लगा था और उसी मध्य

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कचोटती तन्हाइयां -भाग 46अंतिम भाग

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दिव्या और सूर्य प्रताप भानु घर के मुख्य दरवाजे से पहले बने बरामदे के ऊपर बने कमरे में ले गए , और दिव्य प्रताप भानु और कनक , दिनकर प्रताप भानु और उसकी पत्नी सहित चले गए ।दिव्य प्रताप भानु ने चतुराई के

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