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अध्याय 17: जीवनमन्थन से निकला विष

24 अगस्त 2023

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घूमते-घूमते श्रीकान्त की तरह एक दिन उसने पाया कि आम के बाग में धुंआ निकल रहा है, तुरन्त वहां पहुंचा। देखा अच्छा-खासा सन्यासी का आश्रम है। प्रकाण्ड धूनी जल रही हे। लोटे में चाय का पानी चढ़ा हुआ है। एक बाबाजी आधी आंखें खोले हुए सामने ही विराजमान हैं। आस-पास गांजा पीने के साधन हैं। दूध के लिए एक बकरी और गाय है। ऊंट और टट्टू भी हैं। और इसी के साथ भांग छानने का सरंजाम भी है। शरत् ने तुरन्त आगे बढ़कर बाबाजी के चरण छुए और विनम्र स्वर में कहा, “मैं गृहत्यागी, मुक्ति- पथान्वेषी, हतभाग्य शिशु हूं। दया करके अपने चरणों की सेवा करने की आज्ञा दीजिए।”

बाबाजी हंसे, फिर सिर हिलाकर बोले, “बेटा, घर लौट जा, यह पथ बड़ा ही दुर्गम है। " शरत् ने करुण स्वर में कहा, “बाबाजी, बहुत-से पापी आप जैसे सन्तों के चरण पकड़कर उतर गए हैं। क्या मैं आपके चरणों में पड़कर मुक्ति भी नहीं पा सकता?”

बाबाजी प्रसन्न हुए। बोले, “तू सच कहता है। अच्छा बेटा, भगवान की यही इच्छा है तो यहीं रह ।”

और शरत् को उस दल में शरण मिल गई। गांजा आदि तैयार करने मे तो वह निपुण था ही, बाबाजी को प्रसन्न करने में देर नहीं लगी। बहुत जल्दी उसे दीक्षित कर लिया गया और बाकायदा गेरुवे वस्त्र तथा रुद्राक्ष की माला ग्रहण करके वह उनका शिष्य बन गया।

कई दिन तक इसी प्रकार शिष्यत्व निभाता हुआ वह उनके साथ घूमता रहा। लेकिन एक स्थान पर अधिक दिन ठहरना उसके लिए असम्भव था। एक दिन वह उनसे बिछुड़ गया। तभी उसका एक श्रद्धालु परिवार के साथ परिचय हुआ। उन दिनों उस प्रदेश में शीतला खूब फैली हुई थी। वह परिवार भी उसके आक्रमण से नहीं बच सका। शरत्, जेसा कि उसका स्वभाव था, जी-जान से उनकी सेवा में लग गया। धीरे-धीरे रोग का प्रकोप कम हुआ और वे सब स्वस्थ हो गए। उसके प्रति उनकी कृतज्ञता की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने उसे अपने साथ चलने का निमन्त्रण दिया।

वे आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे थे कि सहसा शरत् को ज्वर हो आया और तब वह परिवार उसे ऐसे छोड़कर चला गया जैसे कभी कोई परिचय ही नहीं हुआ हो। जब उसकी आंख खुली तो वहां कोई भी नहीं था। उस अवस्था मे वह स्वयं स्टेशन की ओर चल पड़ा। मार्ग में एक बूढ़े बिहारी ने दया करके उसे अपनी गाड़ी में बिठा लिया और स्टेशन पर जाकर छोड़ दिया।

कब तक वह वहां पड़ा रहा, कैसे वह ठीक हुआ, यह काई नहीं जानता। उसे इतना ही याद था कि एक गरीब बंगाली लड़का उसके लिए अपना फटा हुआ बिछौना लाकर छि गया था। उसे गरम-गरम दूध पिलाया था और फिर कहा था, “डरने की कोई बात नहीं है, अच्छे हो जाओगे। घर का पता बताओ तो मैं तार दे सकता हूं।”

लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया। अच्छा होने तक वहीं पडा रहा। उस लड़के ने तथा स्टेशन के दूसरे लोगों ने उसकी बराबर देख-भाल की। जब चलने फिरने लायक हो गया तो वह मुजफ्फरपुर चला गया। वहां एक धर्मशाला में ठहरा। अभी भी वह संन्यासी के वेश में था। इस वेश में भीख मिलने में सुविधा रहती है।

एक दिन बंगालियों के क्लब में जाकर उसने शुद्ध हिन्दी में एक व्यक्ति से कहा, “मुझे एक पोस्ट कार्ड चाहिए, और कलम भी। चिट्ठी लिखना चाहता हूं।”

सामान मिल जाने पर वहीं एक कोने में बैठ गया और पत्र लिखने लगा। आस-पास बच्चे धूम रहे थे। संन्यासी को पत्र लिखते देखकर वे कौतूहल से झांकने लगे। देखा कि वह अत्यन्त सुन्दर बंगाली अक्षरों में पत्र लिख रहा है।

एक कान से दूसरे कान होती हुई यह बात सदस्यों तक पहुंच गई। वे भी उस संन्यासी के प्रति कौतूहल से भर उठे। प्रमथनाथ भट्ट नाम के एक युवक ने पास आकर बंगला में पूछा, “आप कौन हैं और कहां से आए हैं?"

शरत् ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “मैं बिहारी हूं, घूम-घूमकर जीवनयापन करता हूं।” उस मुस्कराहट ने रहस्य खोल दिया। प्रमथ ने कहा, "रहने दीजिए, आप बिहारी नहीं, बंगाली हैं। अब यह सत्तू खानेवालों की भाषा छोड़कर अपनी मातृभाषा में बात कीजिए।

उसके बाद साधु का वह बाना न जाने कहां चला गया, लेकिन अभी भी जो अपरिचित थे उन्हें वह ‘बिहारी हूं' कहकर परिचय देता था और धर्मशाला में ही रहता था। उस दिन छत पर बैठा तन्मय होकर गा रहा था कि उसी समय एक युवक निशानाथ बन्दोपाध्याय वहां से गुजरा। संगीत की मधुर ध्वनि सुनकर वह ठिठक गया। उसके परिवार की संगीत में बड़ी रुचि थी। प्रतिदिन कोई न कोई गवैया आकर मजलिस जमाता था। वह तुरन्त शरत् के पास पहुंचा, कहा, “आप बहुत सुन्दर गाते हैं, कहां के रहने वाले हैं?”

शरत् ने उत्तर दिया, “मैं भागलपुर से आया हूं। मेरा नाम शरच्चन्द्र है।”

निशानाथ बोला, “भागलपुर ! वहां के श्री भूदेव मुकर्जी की पोती अनुरूपा देवी मेरी भाभी हैं।”

शरत् ने कहा, “मैं उन्हें पहचानता हूं, विभूति की बहन निरुपमा की वह सखी हैं। सौन्द्रमोहन मेरा मित्र है।”

अब तो निशानाथ बड़े आग्रह के साथ शरत् को घर ले आया। बड़े भाई शिखरनाथ से कहा, “ये भागलपुर के शरच्चन्द्र हैं, कण्ठ बड़ा मधुर है इनका ।”

शिखरनाथ हंस पड़े, बोले, “और ये कहानी भी तो लिखते है । तुम्हारी भाभी ने मुझे इनके बारे में बताया था।”

शरत् वहीं रहने लगा। नित्य संगीत की मजलिस जमती थी। एक सुगायक के रूप में शीघ्र ही उसकी ख्याति फैल गई। वर्षों बाद उसके कण्ठ को याद करके शिखरनाथ कह उठते, “अहा, शरत् इस गाने को जैसे गाता था, अब भी कानों में गूंज रहा है।”

दो महीने किधर से आकर न आने किधर चले गये, कोई जान भी नहीं सका। वह अनाथों की तरह मुजफ्फरपुर आया था, लेकिन शीघ्र ही मित्रों से घिर गया। बंगालियों के अतिरिक्त एक नवयुवक बिहारी महादेव साहू से भी उसका घनिष्ठ परिचय हो गया। वह धनी ज़मींदार था और बंगाली लिखना पढ़ना और उनके समान ही पोशाक पहनना उसने सीख लिया था। शरत् के प्रति उसके आकर्षण के कई कारण थे। मधुर कण्ठ और क्या कहने की अद्भुत क्षमता। एक दिन उसने कहा, “मैंने राणाघाट में पुलिस के हाथ से एक अविवाहित लड़की की रक्षा की थी । "

साहू के एक साथी ने मुस्कराकर पूछा, “सच?”

“बिलकुल सच।”

लेकिन जब उस साथी ने राणाघाट जाकर शरत् की कहानी के बारे में छानबीन की तो पता लगा कि सब कुछ कपोलकल्पित है। लेकिन कुछ भी हो, वे कहानियां सुनकर श्रोता गद्गद् हो उठते। वे उन्हें कौतूहल से ही नहीं भरती थीं, हंसाती भी खूब थी। जिस सह भाव से वह हंसा सकता था, उसी सहज भाव से असहाय रोगियों की परिचर्या और मृत व्यक्तियों का संस्कार जैसे कठिन कामों के बीच भी वह एकान्त भाव से डूब सकता था।

कुछ ही दिनों में साहू और वह दोनों ऐसे घुल-मिल गए कि शराब पीना और वेश्यागमन आदि सभी कामों में एक-दूसरे य साथ देने लगे। शिकार भी साथ-साथ खेलने जाते थे। साहू किस्सा अलिफफैला के आबूहसन की तरह मुसाहिबों से घिरा रहता था। वह बिलियर्ड भी खूब खेलता था, पर शरत् इस कला से अनभिज्ञ ही रहा। हां, सुविधा होने पर पीने का शौक अवश्य कुछ बढ़ गया। लेकिन बदहवास होते उसे किसी ने नहीं देखा। इसके विपरीत बांसुरी का स्वर तब और भी मादक हो उठता । श्रोता मुग्ध होकर उसे सुनते रहते।

साहू भी सुनता था और शिकार, शराब तथा वेश्या के पीछे पानी की तरह पैसा बहाता था। उसके सम्बन्धी बड़े परेशान हुए। उन्होंने कहना शुरू किया, “भागलपुर से एक बंगाली युवक शरत् ने आकर साहू को पथभ्रष्ट कर दिया है।”

दूसरा दल कैसे पीछे रहता। उसने कहा, “साहू ने शरत् को बिगाड़ा है।”

परस्पर दोषारोपण के इस घात-प्रतिघात से दोनों मित्र बेखबर हों, यह बात तो नहीं थी, लेकिन इसकी चिन्ता उन्होंने कभी नहीं की। दोनों मन ही मन हंसते, क्योंकि दोनों जानते थे कि वे मिलने से पहले ही सब कुछ सीख चुके थे। शरत् को अब पैसे की सुविधा हो गई और साहू को मिल गया एक मनचाहा मीत। वह शरत् को अपना आदर्श मानने लगा। शरत् ईश्वर में विश्वास नहीं करता था। साहू भी कहने लगा, “शरत् दादा कहते हैं कि ईश्वर नहीं हैं। इसलिए सचमुच ही ईश्वर नहीं है। मैं भी मानता हूं कि ईश्वर नहीं है।”

वह अभी तक शिखरनाथ के घर रह रहा था, लेकिन साहू के साथ जब मजलिस जमने लगी तो रात को लौटने में भी देर होने लगी। घर की स्वामिनी उसे पुत्र के समान प्यार करती थी। वह देर तक बैठी उसकी राह देखती रहती। लेकिन इधर उसने ऐसा अनुभव किया कि कभी-कभी शरत् होश में नहीं होता। उसके मुंह से बदबू भी आती है। उसने शिखरनाथ से शिकायत की, “शरत् का इतनी रात को इस तरह घर में आना मुझे अच्छा नहीं लगता।”

शिखरनाथ ने उसी दिन शरत् से कहा, “तुम्हारा देर से आना और शराब पीना इस घर के लोगों को अच्छा नहीं लगता। तुम्हें सावधान रहना चाहिए।"

वह परिवार संगीत का प्रेमी था, परन्तु था धर्मप्राण । शरत् ने अपनी गलती अनुभव की। वह फिर वहां नहीं लौटा। एक मेस में जाकर रहने लगा, पर जेब में पैसे कहां थे? आखिर वह महादेव साहू के पास चला गया। उसका खाना-पीना, उठना-बैठना, जागना- सोना, अब साहू के साथ होने लगा।

प्रेम की पीर अभी भी शरत् को परेशान कर रही थी। उसकी प्रेमिका नीरदा उससे विमुख होकर भागलपुर से चली आई थी। उसने सुना था कि आबकारी के किसी दरोगा के साथ वह यहां आकर रहने लगी है। इसीलिए वह मुजफ्फरपुर आया था। और एक दिन उसने उसे ढूंढ़ ही लिया, लेकिन नीरदा ने उसकी ओर दृष्टि उठाकर देखा तक भी नहीं ।

प्रेम अन्धा होता है। शरत् अब भी यह विश्वास करता था कि नीरदा उससे प्रेम करती है। वह उसका पीछा करता रहा। परेशान होकर एक दिन नीरदा ने दरोगा से शिकायत कर दी। दरोगा ने उसी दिन शरत् को पकड़ा और खूब पीटा। इतना कि बहुत देर तक वह बेहोश पड़ा रहा। मालूम नहीं उसके बाद भी उसका भ्रम टूटा या नहीं, या सारी कहानी ही एक विराट भ्रम है। लेकिन यह सच है कि मुजफ्फरपुर में रहते हुए उसे नारियों के साहचर्य की कमी नहीं हुई। पूंटी नामक एक सुन्दर वेश्या को बुलाकर साहू प्रतिदिन नृत्य-गान की मजलिस जमाता था और दोनों मित्र उसमें मुक्त होकर भाग लेते थे।

इसी समय शरत् का परिचय राजबाला नाम की एक अत्यन्त सुन्दरी से हुआ। उसके जीवन की कहानी अत्यन्त रोमांचक है। उसके पिता विधुभूषण बाबू एक वकील थे। घर से भागी हुई एक बंगाल वधू को उन्होंने शरण दी थी। कुछ दिन बाद उसका प्रेमी उसे छोड़कर चला गया। तब वह असहाय वधू उनके ही पास रहने लगी । अन्तत: उन्होंने उससे विवाह कर लिया। उससे दो पुत्र और चार पुत्रियां उन्हें प्राप्त हुई। पुत्रियां एक से एक बढ़कर सुन्दर थीं। राजबाला विशेष रूप से सुन्दर थी। जैसे-जैसे वह युवती होती गई वैसे-वैसे उसके सौंदर्य की कहानी शहर में फैलती गई। गौर वर्ण, कसे हुए अंग, तीखे नक्श और मादक स्वभाव, उसे पुरुषों की संगति बड़ी प्रिय थी। विवाहित होने पर भी वह शहर के सभी मनचले युवकों की हृदयवल्लभा बन गई। तब शरत् और साहू से उसका परिचय कैसे नहीं होता। साहू के पास सभी सुविधाएं थीं, इसलिए शरत् को वहां जाने में कोई असुविध नहीं हुई। वह मुक्त होकर राजबाला के रूप-जाल में फंस गया

मुजफरपुर का यह जीवन हर दृष्टि से बोहेमियन था। शिकार, शराब और वेश्या – इनकी सुविधा होने पर और हो भी क्या सकता था ! वह न सुन्दर था और न स्वस्थ। पैसा भी उसके पास नहीं था, लेकिन वे गुण तो थे, जो किसी को सबका प्रिय बना देते थे। स्त्रियां विशेष रूप से उसके वाग्जाल में फंसकर उसकी ओर आकर्षित होती थीं।

लेकिन इस चरित्रहीनता के बीच में से निस्संग होकर उठ जाने की शक्ति उसमें अब भी थी। अन्तर में बैठा वैरागी शरत् उसे खींच ले जाता था दूर निर्जन में। वह नदी के तट पर जाकर घण्टों अकेला बैठा रहता और लिखता रहता । न जाने कितनी रचनाएं उसने लिखीं। एक पूरा उपन्यास 'ब्रह्मदैत्य' उसी में था।

असमाप्त ‘चरित्रहीन’ की पाण्डुलिपि भी उसके पास थी। उसी को लेकर प्रमथनाथ से उसकी मित्रता गहरी हुई। ये वर्द्धमान ज़िले के रहने वाले थे। यहां वे अपने काका के पास रहकर पढ़े थे। इस समय मिलने के लिए आये हुए थे। यह मित्रता कालान्तर में कई रूपों में आदर्श प्रमाणित हुई।

मित्रों के अतिरिक्त यहां वह और भी विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों से मिलता था। वेश्याएं, साधु, जमींदार, कारकुन, वकील, संगीत-प्रेमी और नीचे तबके के लोग। वह उनका खूब अध्ययन करता, उनकी बातें सुनता, और उन्हीं के आधार पर एकान्त में जाकर लिखता रहता। कभी-कभी वह व्यक्तियों के रेखाचित्र लिखकर सुनाता भी। उन रेखाचित्रों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण रहता था। साधारण व्यक्ति के लिए जो जीवन अप्रतिष्ठा और कलंक का कारण हो सकता है वही साहित्यिक के लिए बड़ी शक्ति बन जाता है। विश्वकवि ने लिखा है :-

जीवन-मन्थन से निकला विष

वह जो तुमने पान किया। 

और अमृत हो बाहर आया, 

उसे जगत को दान दिया।

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रचनाएँ
आवारा मसीहा
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मूल हिंदी में प्रकाशन के समय से 'आवारा मसीहा' तथा उसके लेखक विष्णु प्रभाकर न केवल अनेक पुरस्कारों तथा सम्मानों से विभूषित किए जा चुके हैं, अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद प्रकाशित हो चुका है और हो रहा है। 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' तथा ' पाब्लो नेरुदा सम्मान' के अतिरिक्त बंग साहित्य सम्मेलन तथा कलकत्ता की शरत समिति द्वारा प्रदत्त 'शरत मेडल', उ. प्र. हिंदी संस्थान, महाराष्ट्र तथा हरियाणा की साहित्य अकादमियों और अन्य संस्थाओं द्वारा उन्हें हार्दिक सम्मान प्राप्त हुए हैं। अंग्रेजी, बांग्ला, मलयालम, पंजाबी, सिन्धी , और उर्दू में इसके अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं तथा तेलुगु, गुजराती आदि भाषाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। शरतचंद्र भारत के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे जिनका साहित्य भाषा की सभी सीमाएं लांघकर सच्चे मायनों में अखिल भारतीय हो गया। उन्हें बंगाल में जितनी ख्याति और लोकप्रियता मिली, उतनी ही हिंदी में तथा गुजराती, मलयालम तथा अन्य भाषाओं में भी मिली। उनकी रचनाएं तथा रचनाओं के पात्र देश-भर की जनता के मानो जीवन के अंग बन गए। इन रचनाओं तथा पात्रों की विशिष्टता के कारण लेखक के अपने जीवन में भी पाठक की अपार रुचि उत्पन्न हुई परंतु अब तक कोई भी ऐसी सर्वांगसंपूर्ण कृति नहीं आई थी जो इस विषय पर सही और अधिकृत प्रकाश डाल सके। इस पुस्तक में शरत के जीवन से संबंधित अंतरंग और दुर्लभ चित्रों के सोलह पृष्ठ भी हैं जिनसे इसकी उपयोगिता और भी बढ़ गई है। बांग्ला में यद्यपि शरत के जीवन पर, उसके विभिन्न पक्षों पर बीसियों छोटी-बड़ी कृतियां प्रकाशित हुईं, परंतु ऐसी समग्र रचना कोई भी प्रकाशित नहीं हुई थी। यह गौरव पहली बार हिंदी में लिखी इस कृति को प्राप्त हुआ है।
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भूमिका

21 अगस्त 2023
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संस्करण सन् 1999 की ‘आवारा मसीहा’ का प्रथम संस्करण मार्च 1974 में प्रकाशित हुआ था । पच्चीस वर्ष बीत गए हैं इस बात को । इन वर्षों में इसके अनेक संस्करण हो चुके हैं। जब पहला संस्करण हुआ तो मैं मन ही म

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भूमिका : पहले संस्करण की

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कभी सोचा भी न था एक दिन मुझे अपराजेय कथाशिल्पी शरत्चन्द्र की जीवनी लिखनी पड़ेगी। यह मेरा विषय नहीं था। लेकिन अचानक एक ऐसे क्षेत्र से यह प्रस्ताव मेरे पास आया कि स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। हिन्दी

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तीसरे संस्करण की भूमिका

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लगभग साढ़े तीन वर्ष में 'आवारा मसीहा' के दो संस्करण समाप्त हो गए - यह तथ्य शरद बाबू के प्रति हिन्दी भाषाभाषी जनता की आस्था का ही परिचायक है, विशेष रूप से इसलिए कि आज के महंगाई के युग में पैंतालीस या,

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" प्रथम पर्व : दिशाहारा " अध्याय 1 : विदा का दर्द

21 अगस्त 2023
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किसी कारण स्कूल की आधी छुट्टी हो गई थी। घर लौटकर गांगुलियो के नवासे शरत् ने अपने मामा सुरेन्द्र से कहा, "चलो पुराने बाग में घूम आएं। " उस समय खूब गर्मी पड़ रही थी, फूल-फल का कहीं पता नहीं था। लेकिन घ

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अध्याय 2: भागलपुर में कठोर अनुशासन

21 अगस्त 2023
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भागलपुर आने पर शरत् को दुर्गाचरण एम० ई० स्कूल की छात्रवृत्ति क्लास में भर्ती कर दिया गया। नाना स्कूल के मंत्री थे, इसलिए बालक की शिक्षा-दीक्षा कहां तक हुई है, इसकी किसी ने खोज-खबर नहीं ली। अब तक उसने

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अध्याय 3: राजू उर्फ इन्दरनाथ से परिचय

21 अगस्त 2023
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नाना के इस परिवार में शरत् के लिए अधिक दिन रहना सम्भव नहीं हो सका। उसके पिता न केवल स्वप्नदर्शी थे, बल्कि उनमें कई और दोष थे। वे हुक्का पीते थे, और बड़े होकर बच्चों के साथ बराबरी का व्यवहार करते थे।

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अध्याय 4: वंश का गौरव

22 अगस्त 2023
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मोतीलाल चट्टोपाध्याय चौबीस परगना जिले में कांचड़ापाड़ा के पास मामूदपुर के रहनेवाले थे। उनके पिता बैकुंठनाथ चट्टोपाध्याय सम्भ्रान्त राढ़ी ब्राह्मण परिवार के एक स्वाधीनचेता और निर्भीक व्यक्ति थे। और वह

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अध्याय 5: होनहार बिरवान .......

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शरत् जब पांच वर्ष का हुआ तो उसे बाकायदा प्यारी (बन्दोपाध्याय) पण्डित की पाठशाला में भर्ती कर दिया गया, लेकिन वह शब्दश: शरारती था। प्रतिदिन कोई न कोई काण्ड करके ही लौटता। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया उस

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अध्याय 6: रोबिनहुड

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तीन वर्ष नाना के घर में भागलपुर रहने के बाद अब उसे फिर देवानन्दपुर लौटना पड़ा। बार-बार स्थान-परिवर्तन के कारण पढ़ने-लिखने में बड़ा व्याघात होता था। आवारगी भी बढ़ती थी, लेकिन अनुभव भी कम नहीं होते थे।

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अध्याय 7: अच्छे विद्यार्थी से कथा - विद्या - विशारद तक

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शरत् जब भागलपुर लौटा तो उसके पुराने संगी-साथी प्रवेशिका परीक्षा पास कर चुके थे। 2 और उसके लिए स्कूल में प्रवेश पाना भी कठिन था। देवानन्दपुर के स्कूल से ट्रांसफर सर्टिफिकेट लाने के लिए उसके पास पैसे न

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अध्याय 8: एक प्रेमप्लावित आत्मा

22 अगस्त 2023
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इन दुस्साहसिक कार्यों और साहित्य-सृजन के बीच प्रवेशिका परीक्षा का परिणाम - कभी का निकल चुका था और सब बाधाओं के बावजूद वह द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया था। अब उसे कालेज में प्रवेश करना था। परन्तु

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अध्याय 9: वह युग

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जिस समय शरत्चन्द का जन्म हुआ क वह चहुंमुखी जागृति और प्रगति का का था। सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम की असफलता और सरकार के तीव्र दमन के कारण कुछ दिन शिथिलता अवश्य दिखाई दी थी, परन्तु वह तूफान से पूर्व

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अध्याय 10: नाना परिवार का विद्रोह

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शरत जब दूसरी बार भागलपुर लौटा तो यह दलबन्दी चरम सीमा पर थी। कट्टरपन्थी लोगों के विरोध में जो दल सामने आया उसके नेता थे राजा शिवचन्द्र बन्दोपाध्याय बहादुर । दरिद्र घर में जन्म लेकर भी उन्होंने तीक्ष्ण

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अध्याय 11: ' शरत को घर में मत आने दो'

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उस वर्ष वह परीक्षा में भी नहीं बैठ सका था। जो विद्यार्थी टेस्ट परीक्षा में उत्तीर्ण होते थे उन्हीं को अनुमति दी जाती थी। इसी परीक्षा के अवसर पर एक अप्रीतिकर घटना घट गई। जैसाकि उसके साथ सदा होता था, इ

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अध्याय 12: राजू उर्फ इन्द्रनाथ की याद

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इसी समय सहसा एक दिन - पता लगा कि राजू कहीं चला गया है। फिर वह कभी नहीं लौटा। बहुत वर्ष बाद श्रीकान्त के रचियता ने लिखा, “जानता नहीं कि वह आज जीवित है या नहीं। क्योंकि वर्षों पहले एक दिन वह बड़े सुबह

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अध्याय 13: सृजिन का युग

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इधर शरत् इन प्रवृत्तियों को लेकर व्यस्त था, उधर पिता की यायावर वृत्ति सीमा का उल्लंघन करती जा रही थी। घर में तीन और बच्चे थे। उनके पेट के लिए अन्न और शरीर के लिए वस्त्र की जरूरत थी, परन्तु इस सबके लि

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अध्याय 14: 'आलो' और ' छाया'

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इसी समय निरुपमा की अंतरंग सखी, सुप्रसिद्ध भूदेव मुखर्जी की पोती, अनुपमा के रिश्ते का भाई सौरीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय भागलपुर पढ़ने के लिए आया। वह विभूति का सहपाठी था। दोनों में खूब स्नेह था। अक्सर आना-ज

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अध्याय 15 : प्रेम के अपार भूक

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एक समय होता है जब मनुष्य की आशाएं, आकांक्षाएं और अभीप्साएं मूर्त रूप लेना शुरू करती हैं। यदि बाधाएं मार्ग रोकती हैं तो अभिव्यक्ति के लिए वह कोई और मार्ग ढूंढ लेता है। ऐसी ही स्थिति में शरत् का जीवन च

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अध्याय 16: निरूद्देश्य यात्रा

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गृहस्थी से शरत् का कभी लगाव नहीं रहा। जब नौकरी करता था तब भी नहीं, अब छोड़ दी तो अब भी नहीं। संसार के इस कुत्सित रूप से मुंह मोड़कर वह काल्पनिक संसार में जीना चाहता था। इस दुर्दान्त निर्धनता में भी उ

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अध्याय 17: जीवनमन्थन से निकला विष

24 अगस्त 2023
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घूमते-घूमते श्रीकान्त की तरह एक दिन उसने पाया कि आम के बाग में धुंआ निकल रहा है, तुरन्त वहां पहुंचा। देखा अच्छा-खासा सन्यासी का आश्रम है। प्रकाण्ड धूनी जल रही हे। लोटे में चाय का पानी चढ़ा हुआ है। एक

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अध्याय 18: बंधुहीन, लक्ष्यहीन प्रवास की ओर

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इस जीवन का अन्त न जाने कहा जाकर होता कि अचानक भागलपुर से एक तार आया। लिखा था—तुम्हारे पिता की मुत्यु हो गई है। जल्दी आओ। जिस समय उसने भागलपुर छोड़ा था घर की हालत अच्छी नहीं थी। उसके आने के बाद स्थित

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" द्वितीय पर्व : दिशा की खोज" अध्याय 1: एक और स्वप्रभंग

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श्रीकान्त की तरह जिस समय एक लोहे का छोटा-सा ट्रंक और एक पतला-सा बिस्तर लेकर शरत् जहाज़ पर पहुंचा तो पाया कि चारों ओर मनुष्य ही मनुष्य बिखरे पड़े हैं। बड़ी-बड़ी गठरियां लिए स्त्री बच्चों के हाथ पकड़े व

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अध्याय 2: सभ्य समाज से जोड़ने वाला गुण

24 अगस्त 2023
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वहां से हटकर वह कई व्यक्तियों के पास रहा। कई स्थानों पर घूमा। कई प्रकार के अनुभव प्राप्त किये। जैसे एक बार फिर वह दिशाहारा हो उठा हो । आज रंगून में दिखाई देता तो कल पेगू या उत्तरी बर्मा भाग जाता। पौं

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अध्याय 3: खोज और खोज

24 अगस्त 2023
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वह अपने को निरीश्वरवादी कहकर प्रचारित करता था, लेकिन सारे व्यसनों और दुर्गुणों के बावजूद उसका मन वैरागी का मन था। वह बहुत पढ़ता था । समाज विज्ञान, यौन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, दर्शन, कुछ भी तो नहीं छू

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अध्याय 4: वह अल्पकालिक दाम्पत्य जीवन

24 अगस्त 2023
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एक दिन क्या हुआ, सदा की तरह वह रात को देर से लौटा और दरवाज़ा खोलने के लिए धक्का दिया तो पाया कि भीतर से बन्द है । उसे आश्चर्य हुआ, अन्दर कौन हो सकता है । कोई चोर तो नहीं आ गया। उसने फिर ज़ोर से धक्का

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अध्याय 5: चित्रांगन

24 अगस्त 2023
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शरत् ने बहुमुखी प्रतिभा के धनी रवीन्द्रनाथ के समान न केवल साहित्य में बल्कि संगीत और चित्रकला में भी रुचि ली थी । यद्यपि इन क्षेत्रों में उसकी कोई उपलब्धि नहीं है, पर इस बात के प्रमाण अवश्य उपलब्ध है

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अध्याय 6: इतनी सुंदर रचना किसने की ?

24 अगस्त 2023
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रंगून जाने से पहले शरत् अपनी सब रचनाएं अपने मित्रों के पास छोड़ गया था। उनमें उसकी एक लम्बी कहानी 'बड़ी दीदी' थी। वह सुरेन्द्रनाथ के पास थी। जाते समय वह कह गया था, “छपने की आवश्यकता नहीं। लेकिन छापना

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अध्याय 7: प्रेरणा के स्रोत

24 अगस्त 2023
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एक ओर अंतरंग मित्रों के साथ यह साहित्य - चर्चा चलती थी तो दूसरी और सर्वहारा वर्ग के जीवन में गहरे पैठकर वह व्यक्तिगत अभिज्ञता प्राप्त कर रहा था। इन्ही में से उसने अपने अनेक पात्रों को खोजा था। जब वह

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अध्याय 8: मोक्षदा से हिरण्मयी

24 अगस्त 2023
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शांति की मृत्यु के बाद शरत् ने फिर विवाह करने का विचार नहीं किया। आयु काफी हो चुकी थी । यौवन आपदाओं-विपदाओं के चक्रव्यूह में फंसकर प्रायः नष्ट हो गया था। दिन-भर दफ्तर में काम करता था, घर लौटकर चित्र

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अध्याय 9: गृहदाद

24 अगस्त 2023
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'चरित्रहीन' प्रायः समाप्ति पर था। 'नारी का इतिहास प्रबन्ध भी पूरा हो चुका था। पहली बार उसके मन में एक विचार उठा- क्यों न इन्हें प्रकाशित किया जाए। भागलपुर के मित्रों की पुस्तकें भी तो छप रही हैं। उनस

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अध्याय 10: हाँ , अब फिर लिखूंगा

24 अगस्त 2023
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गृहदाह के बाद वह कलकत्ता आया । साथ में पत्नी थी और था उसका प्यारा कुत्ता। अब वह कुत्ता लिए कलकत्ता की सड़कों पर प्रकट रूप में घूमता था । छोटी दाढ़ी, सिर पर अस्त-व्यस्त बाल, मोटी धोती, पैरों में चट्टी

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अध्याय 11: रामेर सुमित शरतेर सुमित

24 अगस्त 2023
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रंगून लौटकर शरत् ने एक कहानी लिखनी शुरू की। लेकिन योगेन्द्रनाथ सरकार को छोड़कर और कोई इस रहस्य को नहीं जान सका । जितनी लिख लेता प्रतिदिन दफ्तर जाकर वह उसे उन्हें सुनाता और वह सब काम छोड़कर उसे सुनते।

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अध्याय 12: सृजन का आवेग

24 अगस्त 2023
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‘रामेर सुमति' के बाद उसने 'पथ निर्देश' लिखना शुरू किया। पहले की तरह प्रतिदिन जितना लिखता जाता उतना ही दफ्तर में जाकर योगेन्द्रनाथ को पढ़ने के लिए दे देता। यह काम प्राय: दा ठाकुर की चाय की दुकान पर हो

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अध्याय 13: चरितहीन क्रिएटिंग अलामिर्ग सेंसेशन

25 अगस्त 2023
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छोटी रचनाओं के साथ-साथ 'चरित्रहीन' का सृजन बराबर चल रहा था और उसके प्रकाशन को 'लेकर काफी हलचल मच गई थी। 'यमुना के संपादक फणीन्द्रनाथ चिन्तित थे कि 'चरित्रहीन' कहीं 'भारतवर्ष' में प्रकाशित न होने लगे।

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अध्याय 14: ' भारतवर्ष' में ' दिराज बहू '

25 अगस्त 2023
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द्विजेन्द्रलाल राय शरत् के बड़े प्रशंसक थे। और वह भी अपनी हर रचना के बारे में उनकी राय को अन्तिम मानता था, लेकिन उन दिनों वे काव्य में व्यभिचार के विरुद्ध आन्दोलन कर रहे थे। इसलिए 'चरित्रहीन' को स्वी

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अध्याय 15 : विजयी राजकुमार

25 अगस्त 2023
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अगले वर्ष जब वह छः महीने की छुट्टी लेकर कलकत्ता आया तो वह आना ऐसा ही था जैसे किसी विजयी राजकुमार का लौटना उसके प्रशंसक और निन्दक दोनों की कोई सीमा नहीं थी। लेकिन इस बार भी वह किसी मित्र के पास नहीं ठ

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अध्याय 16: नये- नये परिचय

25 अगस्त 2023
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' यमुना' कार्यालय में जो साहित्यिक बैठकें हुआ करती थीं, उन्हीं में उसका उस युग के अनेक साहित्यिकों से परिचय हुआ उनमें एक थे हेमेन्द्रकुमार राय वे यमुना के सम्पादक फणीन्द्रनाथ पाल की सहायता करते थे। ए

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अध्याय 17: ' देहाती समाज ' और आवारा श्रीकांत

25 अगस्त 2023
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अचानक तार आ जाने के कारण शरत् को छुट्टी समाप्त होने से पहले ही और अकेले ही रंगून लौट जाना पड़ा। ऐसा लगता है कि आते ही उसने अपनी प्रसिद्ध रचना पल्ली समाज' पर काम करना शरू कर दिया था, लेकिन गृहिणी के न

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अध्याय 18: दिशा की खोज समाप्त

25 अगस्त 2023
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वह अब भी रंगून में नौकरी कर रहा था, लेकिन उसका मन वहां नहीं था । दफ्तर के बंधे-बंधाए नियमो के साथ स्वाधीन मनोवृत्ति का कोई मेल नही बैठता था। कलकत्ता से हरिदास चट्टोपाध्याय उसे बराबर नौकरी छोड़ देने क

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" तृतीय पर्व: दिशान्त " अध्याय 1: ' वह' से ' वे '

25 अगस्त 2023
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जिस समय शरत् ने कलकत्ता छोडकर रंगून की राह ली थी, उस समय वह तिरस्कृत, उपेक्षित और असहाय था। लेकिन अब जब वह तेरह वर्ष बाद कलकत्ता लौटा तो ख्यातनामा कथाशिल्पी के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। वह अब 'वह'

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अध्याय 2: सृजन का स्वर्ण युग

25 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र के जीवन का स्वर्णयुग जैसे अब आ गया था। देखते-देखते उनकी रचनाएं बंगाल पर छा गई। एक के बाद एक श्रीकान्त" ! (प्रथम पर्व), 'देवदास' 2', 'निष्कृति" 3, चरित्रहीन' और 'काशीनाथ' पुस्तक रूप में प्रक

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अध्याय 3: आवारा श्रीकांत का ऐश्वर्य

25 अगस्त 2023
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'चरित्रहीन' के प्रकाशन के अगले वर्ष उनकी तीन और श्रेष्ठ रचनाएं पाठकों के हाथों में थीं-स्वामी(गल्पसंग्रह - एकादश वैरागी सहित) - दत्ता 2 और श्रीकान्त ( द्वितीय पर्वों 31 उनकी रचनाओं ने जनता को ही इस प

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अध्याय 4: देश के मुक्ति का व्रत

25 अगस्त 2023
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जिस समय शरत्चन्द्र लोकप्रियता की चरम सीमा पर थे, उसी समय उनके जीवन में एक और क्रांति का उदय हुआ । समूचा देश एक नयी करवट ले रहा था । राजनीतिक क्षितिज पर तेजी के साथ नयी परिस्थितियां पैदा हो रही थीं। ब

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अध्याय 5: स्वाधीनता का रक्तकमल

26 अगस्त 2023
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चर्खे में उनका विश्वास हो या न हो, प्रारम्भ में असहयोग में उनका पूर्ण विश्वास था । देशबन्धू के निवासस्थान पर एक दिन उन्होंने गांधीजी से कहा था, "महात्माजी, आपने असहयोग रूपी एक अभेद्य अस्त्र का आविष्क

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अध्याय 6: निष्कम्प दीपशिखा

26 अगस्त 2023
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उस दिन जलधर दादा मिलने आए थे। देखा शरत्चन्द्र मनोयोगपूर्वक कुछ लिख रहे हैं। मुख पर प्रसन्नता है, आखें दीप्त हैं, कलम तीव्र गति से चल रही है। पास ही रखी हुई गुड़गुड़ी की ओर उनका ध्यान नहीं है। चिलम की

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अध्याय 7: समाने समाने होय प्रणयेर विनिमय

26 अगस्त 2023
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शरत्चन्द्र इस समय आकण्ठ राजनीति में डूबे हुए थे। साहित्य और परिवार की ओर उनका ध्यान नहीं था। उनकी पत्नी और उनके सभी मित्र इस बात से बहुत दुखी थे। क्या हुआ उस शरतचन्द्र का जो साहित्य का साधक था, जो अड

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अध्याय 8: राजनीतिज्ञ अभिज्ञता का साहित्य

26 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र कभी नियमित होकर नहीं लिख सके। उनसे लिखाया जाता था। पत्र- पत्रिकाओं के सम्पादक घर पर आकर बार-बार धरना देते थे। बार-बार आग्रह करने के लिए आते थे। भारतवर्ष' के सम्पादक रायबहादुर जलधर सेन आते,

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अध्याय 9: लिखने का दर्द

26 अगस्त 2023
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अपनी रचनाओं के कारण शरत् बाबू विद्यार्थियों में विशेष रूप से लोकप्रिय थे। लेकिन विश्वविद्यालय और कालेजों से उनका संबंध अभी भी घनिष्ठ नहीं हुआ था। उस दिन अचानक प्रेजिडेन्सी कालेज की बंगला साहित्य सभा

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अध्याय 10: समिष्ट के बीच

26 अगस्त 2023
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किसी पत्रिका का सम्पादन करने की चाह किसी न किसी रूप में उनके अन्तर में बराबर बनी रही। बचपन में भी यह खेल वे खेल चुके थे, परन्तु इस क्षेत्र में यमुना से अधिक सफलता उन्हें कभी नहीं मिली। अपने मित्र निर

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अध्याय 11: आवारा जीवन की ललक

26 अगस्त 2023
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राजनीतिक क्षेत्र में इस समय अपेक्षाकृत शान्ति थी । सविनय अवज्ञा आन्दोलन जैसा उत्साह अब शेष नहीं रहा था। लेकिन गांव का संगठन करने और चन्दा इकट्ठा करने में अभी भी वे रुचि ले रहे थे। देशबन्धु का यश ओर प

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अध्याय 12: ' हमने ही तोह उन्हें समाप्त कर दिया '

26 अगस्त 2023
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देशबन्धु की मृत्यु के बाद शरत् बाबू का मन राजनीति में उतना नहीं रह गया था। काम वे बराबर करते रहे, पर मन उनका बार-बार साहित्य के क्षेत्र में लौटने को आतुर हो उठता था। यद्यपि वहां भी लिखने की गति पहले

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अध्याय 13: पथेर दाबी

26 अगस्त 2023
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जिस समय वे 'पथेर दाबी ' लिख रहे थे, उसी समय उनका मकान बनकर तैयार हो गया था । वे वहीं जाकर रहने लगे थे। वहां जाने से पहले लगभग एक वर्ष तक वे शिवपुर टाम डिपो के पास कालीकुमार मुकर्जी लेने में भी रहे थे

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अध्याय 14: रूप नारायण का विस्तार

26 अगस्त 2023
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गांव में आकर उनका जीवन बिलकुल ही बदल गया। इस बदले हुए जीवन की चर्चा उन्होंने अपने बहुत-से पत्रों में की है, “रूपनारायण के तट पर घर बनाया है, आरामकुर्सी पर पड़ा रहता हूं।" एक और पत्र में उन्होंने लिख

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अध्याय 15: देहाती शरत

26 अगस्त 2023
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गांव में रहने पर भी शहर छूट नहीं गया था। अक्सर आना-जाना होता रहता था। स्वास्थ्य बहुत अच्छा न होने के कारण कभी-कभी तो बहुत दिनों तक वहीं रहना पड़ता था । इसीलिए बड़ी बहू बार-बार शहर में मकान बना लेने क

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अध्याय 16: दायोनिसस शिवानी से वैष्णवी कमललता तक

26 अगस्त 2023
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किशोरावस्था में शरत् बात् ने अनेक नाटकों में अभिनय करके प्रशंसा पाई थी। उस समय जनता को नाटक देखने का बहुत शौक था, लेकिन भले घरों के लड़के मंच पर आयें, यह कोई स्वीकार करना नहीं चाहता था। शरत बाबू थे ज

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अध्याय 17: तुम में नाटक लिखने की शक्ति है

26 अगस्त 2023
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शरत साहित्य की रीढ़, नारी के प्रति उनका दृष्टिकोण है। बार-बार अपने इसी दृष्टिकोण को उन्होंने स्पष्ट किया है। प्रसिद्धि के साथ-साथ उन्हें अनेक सभाओं में जाना पडता था और वहां प्रायः यही प्रश्न उनके साम

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अध्याय 18: नारी चरित्र के परम रहस्यज्ञाता

26 अगस्त 2023
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केवल नारी और विद्यार्थी ही नहीं दूसरे बुद्धिजीवी भी समय-समय पर उनको अपने बीच पाने को आतुर रहते थे। बड़े उत्साह से वे उनका स्वागत सम्मान करते, उन्हें नाना सम्मेलनों का सभापतित्व करने को आग्रहपूर्वक आ

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अध्याय 19: मैं मनुष्य को बहुत बड़ा करके मानता हूँ

26 अगस्त 2023
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चन्दन नगर की गोष्ठी में उन्होंने कहा था, “राजनीति में भाग लिया था, किन्तु अब उससे छुट्टी ले ली है। उस भीड़भाड़ में कुछ न हो सका। बहुत-सा समय भी नष्ट हुआ । इतना समय नष्ट न करने से भी तो चल सकता था । ज

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अध्याय 20: देश के तरुणों से में कहता हूँ

26 अगस्त 2023
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साधारणतया साहित्यकार में कोई न कोई ऐसी विशेषता होती है, जो उसे जनसाधारण से अलग करती है। उसे सनक भी कहा जा सकता है। पशु-पक्षियों के प्रति शरबाबू का प्रेम इसी सनक तक पहुंच गया था। कई वर्ष पूर्व काशी में

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अध्याय 21:  ऋषिकल्प

26 अगस्त 2023
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जब कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर सत्तर वर्ष के हुए तो देश भर में उनकी जन्म जयन्ती मनाई गई। उस दिन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट, कलकत्ता में जो उद्बोधन सभा हुई उसके सभापति थे महामहोपाध्याय श्री हरिप्रसाद शास्त

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अध्याय 22: गुरु और शिष्य

27 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र 60 वर्ष के भी नहीं हुए थे, लेकिन स्वास्थ्य उनका बहुत खराब हो चुका था। हर पत्र में वे इसी बात की शिकायत करते दिखाई देते हैं, “म सरें दर्द रहता है। खून का दबाव ठीक नहीं है। लिखना पढ़ना बहुत क

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अध्याय 23: कैशोर्य का वह असफल प्रेम

27 अगस्त 2023
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शरत् बाबू की रचनाओं के आधार पर लिखे गये दो नाटक इसी युग में प्रकाशित हुए । 'विराजबहू' उपन्यास का नाट्य रूपान्तर इसी नाम से प्रकाशित हुआ। लेकिन दत्ता' का नाट्य रूपान्तर प्रकाशित हुआ 'विजया' के नाम से

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अध्याय 24: श्री अरविन्द का आशीर्वाद

27 अगस्त 2023
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गांव में रहते हुए शरत् बाबू को काफी वर्ष बीत गये थे। उस जीवन का अपना आनन्द था। लेकिन असुविधाएं भी कम नहीं थीं। बार-बार फौजदारी और दीवानी मुकदमों में उलझना पड़ता था। गांव वालों की समस्याएं सुलझाते-सुल

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अध्याय 25: तुब बिहंग ओरे बिहंग भोंर

27 अगस्त 2023
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राजनीति के क्षेत्र में भी अब उनका कोई सक्रिय योग नहीं रह गया था, लेकिन साम्प्रदायिक प्रश्न को लेकर उन्हें कई बार स्पष्ट रूप से अपने विचार प्रकट करने का अवसर मिला। उन्होंने बार-बार नेताओं की आलोचना की

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अध्याय 26: अल्हाह.,अल्हाह.

27 अगस्त 2023
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सर दर्द बहुत परेशान कर रहा था । परीक्षा करने पर डाक्टरों ने बताया कि ‘न्यूरालाजिक' दर्द है । इसके लिए 'अल्ट्रावायलेट रश्मियां दी गई, लेकिन सब व्यर्थ । सोचा, सम्भवत: चश्मे के कारण यह पीड़ा है, परन्तु

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अध्याय 27: मरीज की हवा दो बदल

27 अगस्त 2023
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हिरण्मयी देवी लोगों की दृष्टि में शरत्चन्द्र की पत्नी थीं या मात्र जीवनसंगिनी, इस प्रश्न का उत्तर होने पर भी किसी ने उसे स्वीकार करना नहीं चाहा। लेकिन इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि उनके प्रति शरत् बा

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अध्याय 28: साजन के घर जाना होगा

27 अगस्त 2023
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कलकत्ता पहुंचकर भी भुलाने के इन कामों में व्यतिक्रम नहीं हुआ। बचपन जैसे फिर जाग आया था। याद आ रही थी तितलियों की, बाग-बगीचों की और फूलों की । नेवले, कोयल और भेलू की। भेलू का प्रसंग चलने पर उन्होंने म

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अध्याय 29: बेशुमार यादें

27 अगस्त 2023
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इसी बीच में एक दिन शिल्पी मुकुल दे डाक्टर माके को ले आये। उन्होंने परीक्षा करके कहा, "घर में चिकित्सा नहीं ही सकती । अवस्था निराशाजनक है। किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। इन्हें तुरन्त नर्सिंग होम ले

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