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अध्याय 7: प्रेरणा के स्रोत

24 अगस्त 2023

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एक ओर अंतरंग मित्रों के साथ यह साहित्य - चर्चा चलती थी तो दूसरी और सर्वहारा वर्ग के जीवन में गहरे पैठकर वह व्यक्तिगत अभिज्ञता प्राप्त कर रहा था। इन्ही में से उसने अपने अनेक पात्रों को खोजा था। जब वह असहाय और निराश्रित अपने इन देशवासियों को देखता तो कातर हो उठता। उन्हें हीन काम करते देखकर उसका आत्माभिमान जाग उठता। यथाशक्ति वह उनकी सहायता करता । देश लौट जाने के लिए स्वयं टिकट खरीदकर जहाज़ पर बैठा आता । अनेक विपथगा नारियों की उसने इसी प्रकार सहायता की।

कैसे-कैसे चरित्र आए उसके जीवन में! उन दिनों खाने-पीने की कोई सुविधा नहीं थी । चाय के प्याले पी-पीकर वह दिन पर दिन बिता देता था। लेकिन एक दिन सहसा घर के पास रहने वाले एक ब्राह्मण पुजारी से उसकी भेंट हो गई। धीरे-धीरे वह परिचय इतना घनिष्ठ हो उठा कि पुजारी ने उससे कहा “दादा आपको खाने की बड़ी असुविधा है, तब क्यों नही आप हमारे घर खाते ?

"नहीं-नहीं”, उसने कहा, “मुझे कोई असुविधा नहीं है । ”

लेकिन पुजारी का आग्रह निरन्तर बढ़ता ही गया । आखिर उस परिवार के स्नेह- निमन्त्रण को वह अस्वीकार नही कर सका। इसका एक और भी कारण था। बामन ठाकुर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। शरत् यदि उसके घर खाता है तो इससे उसको भी लाभ होगा, यही सोचकर वह सहमत हो गया। लेकिन अचानक एक दिन उस घर में एक असभ्याव्य घटना घट गई। शरत् नहीं जानता था कि घर में जो नारी खाना बनाती है, वह बामन ठाकुर की पत्नी नहीं, रक्षिता है। उस नारी का नाम हरिमति था । शरत् बाबू का वह बहुत आदर करती थी। उस दिन न जाने किस बात को लेकर दोनों में झगड़ा शुरू हुआ कि बामन ठाकुर गले का जनेऊ कमर में बाधकर हठात् आसन से उठ खड़ा हुआ। बोला, “देखो तो दादा, मागी का काण्ड, इस छोटी जात का दिमाग...| " 

वह अपना वाक्य पूरा भी न कर पाया था कि हरिमति भभक उठी । शीघ्रता से उसने भात की हंडिया चूल्हे पर रखी। सिर पर कपड़ा लिया और दरवाजे की आड़ में खड़े होकर बोली, “सावधान, छोटी जात का कौन है? तू, तू है, मैं नहीं। खबरदार, जात को लेकर बात मत कर। तू सोचता है कि मैं बाजारू औरत हूं कि जो बोलेगा मान लिया जाएगा। मैं

हूं | तेरे जैसी छोटी जात के ब्राह्मण बहुत देखे हैं। मुंह संभालकर बात कर । न खाने को देता है, न पहनने को, उस पर डींग मारता है इतनी लम्बी .........|" 

फिर जो वाकयुद्ध आरम्भ हुआ उसका कोई अन्त नहीं था । शरत् समझ गया कि वे लोग बेहद गरीब हैं और वामन ठाकुर का बर्ताव हरिमति के साथ बहुत अच्छा नहीं हैं। परिश्रम कर-करके खिलाते - खिलाते, वह बीमार रहने लगी है। उम्र भी काफी हो गई है।

उसे बहुत दुख हुआ। उसने झगड़ा समाप्त कराने का प्रयत्न किया। लेकिन वह सफल नहीं हो सका। इसी प्रसंग को लेकर उसकी बामन ठाकुर से काफी तेज कहा-सुनी हो गई और उसके बाद उसने हरिमति को खर्च देना बन्द कर दिया। अब तो उसके कष्टों की सीमा न रही। रो-रोकर उसने शरत् बाबू को अपनी सारी कहानी कह सुनाई।

शरत् बोला, “मेरी सलाह है कि तुम कलकत्ता चली जाओ।”

हरिमति ने कहा, “दादा ठाकुर, आप यदि प्रबन्ध कर देंगे तो बड़ी कृतज्ञ होऊंगी। मागो के इस देश से मैं जितनी जल्दी हो सके चली जाना चाहती हूं।”

शरत् बाबू ने उसे कलकत्ता भेजना स्वीकार कर लिया। परन्तु हठात् एक दिन उसे ज्वर हो आया और चौबीस घण्टे के भीतर ही उसके प्राण मुक्त हो गए। डाक्टर ने आकर बताया, “प्लेग है।”

शरत् मुसीबत में फंस गया। प्लेग का नाम सुनकर कोई पास नहीं आया। किसी तरह शराब पिला-पिलूकर उसने चार-पांच व्यक्तियों को तैयार किया और तब कहीं जाकर हरिमति का अंतिम संस्कार हो सका।

मिस्त्री पल्ली में ऐसी कहानियों का कोई अन्त नहीं था और किसी न किसी मार्ग से होकर शरत् उनसे जा जुड़ता था। वह होम्योपैथी दवाइयां भी बांटता था। डाक्टर के रूप में भी उसकी प्रसिद्धि कम न थी। उस दिन पड़ोस के मिस्त्री की स्त्री को तेज़ ज्वर हो आया तो वह दौड़ा-दौड़ा शरत् बाबू के पास आया और रोता हुआ बोला, “दादा ठाकुर, बहू को बहुत तेज ज्वर हो आया है। आप चलकर ज़रा देख लीजिए।”

सदा की तरह होम्योपैथी का अपना बक्स उठाकर शरत् उसके साथ चल पड़ा। स्त्री सचमुच ज्वर के कारण संज्ञाहीन थी, लेकिन भाग्य की बात कि दवा देने पर उसकी संज्ञा लौट आई। और ज्वर भी धीरे-धीरे उतर गया। उसी क्षण से वह स्त्री उन्हें 'बाबा' कहकर पुकारने लगी।

धीरे-धीरे यह स्नेह-सम्बन्ध प्रगाढ़ से प्रगाढ़तर होता गया। लेकिन हठात् एक दिन शरत् बाबू ने सुना कि दोनों में कुछ झगड़ा हो गया है। और वह झगड़ा काफी तीव्र है। शरत् ने मिस्त्री से पूछा, “मैंने तुम्हारी स्त्री को कभी जोर से बोलते हुए नहीं सुना। आज क्या बात हुई?"

मिस्त्री अत्यन्त क्रुद्ध था। बोला, "आप तो सब कुछ जानते हैं बाबा ठाकुर । मैंने इस माग को श्मशान से लौटाया कि नहीं? न इसे खाने का कष्ट है, न पीने का पहनने को अच्छे कपड़े मिलते हैं, लेकिन फिर भी रात-दिन झिक-झिक करती रहती है। अगर ऐसा ही करना था तो मेरे साथ कण्ठी-बदल क्यों की?"

अपनी स्त्री को दोष लगाते हुए मिस्त्री को शरत् ने कभी नहीं देखा था। अब एकाएक इतनी बड़ी बदनामी उसके सिर पर लाद दी गई। तब भला वह कैसे चुप रह सकती थी? सिर पर कपड़ा डालकर वह आड़ में आकर खड़ी हो गई और तीव्र स्वर में बोली, ठाकुर के सामने तुमने मेरे बारे में बहुत कुछ कहा है। अपने को भद्र व्यक्ति बता रहे हो और मेरा सर्वनाश करके मेरे ही सिर पर दोष लगा रहे हो। वह तो मौसी थी, नहीं तो मुझे कल तुम मार ही बैठते । भला मैं तुम्हारी मार क्यों खाऊं? बार-बार मुझे कहते हो, 'निकल, निकल जा', मैं क्या कुछ सुनती समझती नहीं? वह तो कहनी ही होगी, और कहना भी क्या है! मेरा गहना-गांठा और कलकत्ते का खर्च पत्तर मुझे दो और अपनी मागी को लेकर जहां जाना है जाओ। बहुत सह चुकी । अब और मुझसे नहीं सहा जाता। मेरा सब कुछ तो ले लिया, अब बाहर निकालता है? तेरे जैसे छोटी जात वाले के ऊपर झाडू मारती हूं। कलकत्ता में भीख मांगकर खा लूंगी लेकिन अब और नहीं सहूंगी। आज ही इसी समय मुझे सब कुछ चाहिए। कहे देती हूं। अब मेरा सर्वनाश कर दिया लेकिन अभी भी चन्द्र-सूर्य प्रकाशित हैं। भगवान करे रात बीतते-बीतते तेरा सर्वनाश देखूं।'

यह कहकर बहू कपडा मुंह में देकर फूट-फूटकर रोने लगी। शरत् ने उस समय किसी तरह समझा-बुझाकर उन्हें शांत किया। मिस्त्री कारखाने चला गया, लेकिन फिर लौटकर नहीं आया। एक-एक करके कई दिन बीत गए और इसी बीच में शरत् ने सब कुछ पता लगा लिया। बहू का इस काण्ड में कोई अपराध नहीं था । मिस्त्री की विवाहिता पत्नी भाई के पास आकर ठहरी थी। उसी को लेकर न जाने वह कहां चला गया। शरत् बाबू ने तब उससे कहा, तुम कलकत्ता चली जाओ। '

बहू बोली, कलकत्ता जाकर अब मैं क्या करूंगी, दादा ठाकुर, मेरे लिए तो काशीवा ही ठीक है।

शरत् ने उसे काशी भेज दिया।

इन कहानियों का कोई अन्त नहीं था और यह भी नहीं था कि वह केवल सर्वहारा वर्ग ही रुचि लेता हो । कष्ट में पड़े अपने मित्रों को सहायता करने से भी वह कभी पीछे नहीं हटता था।

एक मित्र थे श्री सुरेन्द्रनाथ मान्ना। दोनों एक ही घर में रहते थे। गाने-बजाने का शौक था। विशेषकर संकीर्तन में उसकी रुचि थी । शरत् सुर-योजना करता और वह गाता था। उनका अपना एक संकीर्तन दल था। एक दिन अचानक सुरेन्द्र की नौकरी छूट गई। करे तो क्या करे। बहुत प्रयत्न करने पर उसे पता लगा कि नामटू गोल्ड माइन में नौकरी मिलने की सम्भावना है। शरत् ने कहा, तुम फौरन नामटू चले जाओ।'

कई दिन बीत गए। लेकिन सुरेन्द्र नहीं जा सका। शरत् ने पूछा, क्यों, तुम जा क्यों नहीं रहे हो?"

पहले तो वह कुछ झिझका । फिर उसने कहा, कैसे जाऊं दा ठाकुर? पास में एक भी तो पैसा नहीं है। होटल के खाने का पैसा देना है। मित्रों से उधार ले रखा है वह भी चुकाना है।

शरत् ने सहसा कुछ जवाब नहीं दिया। साधारण किरानी ही तो था । लेकिन दूसरे दिन सुरेन्द्र को उसने बुला भेजा। बोला, नामटू जाने का रास्ता जानते हो? पहले मांडले जाना होगा। फिर लासिओं के मार्ग पर नामिओ आएगा। वहां से गोल्ड माइन की ओर एक गाड़ी जाती है। वह मुसाफिरों को नहीं ले जाती। लेकिन तुम्हारे पास तुम्हारे मित्र का जो पत्र है वह उन्हें दिखाओगे तो वे तुम्हें ले जायेंगे। भाड़े में कुल पन्द्रह रुपये खर्च होते हैं। वह मैं तुम्हें देता हूं। तुरन्त चले जाओ।"

सुरेन्द्र को सहसा विश्वास नहीं आया। फिर बोला दादा ठाकुर ! मुझे कर्जा भी तो चुकाना है।

शरत् ने कहा, "उसके बारे में चिन्ता मत करो, मैं सब चुका दूंगा। और देखो, वहां सर्दी बहुत पड़ती है। कपड़ों की जरूरत हो तो मुझे लिख देना।

फिर पैसे देकर कहा, गाड़ी सवेरे ही जाती है। तुम निश्चिंत होकर चले जाओ। '

वह चला गया, लेकिन शायद वह नहीं जानता था कि किराये के पैसे देकर शरत् के पास उस दिन एक भी पैसा नहीं बचा। केवल एक प्याला चाय पीकर ही वह दफ़्तर गया था और रात को केवल एक कटोरा दूध पीकर ही उसने गुज़ारा किया था।

योगेन्द्र ने नारद मुनि का चित्र बनाते शरत् को देखा था। ऐसे और भी न जाने कितने व्यक्ति नाना प्रकार की सहायता मांगने उसके घर आते रहते थे। एक दिन इन्हीं व्यक्तियों के दुख-दैन्य की चर्चा चल रही थी कि सीढियों पर ठक ठक ठक शब्द सुनाई दिया। झांककर देखा तो वही चिर परिचित नारद मुनि । लाठी के सहारे कांपते-कांपते ऊपर चढ़ रहा है।

शरत् तुरन्त दौड़कर नीचे गया और बड़े प्यार से सहारा देकर ऊपर ले आया। उसका परिचय देते हुए उस दिन उसने योगेन्द्र से कहा 'यह व्यक्ति सचमुच ही भगवान की दया का पात्र है। प्यार के कारण कोई याद अपना सब कुछ लुटाकर राह का भिखारी हो सकता है तो इसकी कहानी सच ही है । पुरोहित को बुलाकर शंख बजाकर और मन्त्र पढ़कर इसने विवाह किया था या नहीं, यह तो यह जाने या इसका अन्तर्यामी जाने लेकिन वह कोई भी रही हो उसे इसने किसी मन्त्रपूत पत्नी से कम प्यार नहीं किया। वहीं उसकी पत्नी उस बार प्लेग में मर गई। उसी क्षण इसका दिमाग खराब हो गया। डाक्टर का खर्चा भी क्या कम हुआ! तीन-चार सौ से अधिक ही हुआ होगा। फिर भी यदि पत्नी बच जाती तो कोई बात नहीं थी। इसीलिए मैं कहता हूं कि यह सचमुच भगवान की दया का पात्र है। उन्होंने जैसे उसे मारा है वैसे ही रक्षा भी करेंगे। नहीं तो संसार कैसे चलेगा?"

इतना कहकर शरत् ने दीर्घ नि:श्वास ली। कई क्षण शून्य में ताकता रहा। शायद उसे अपनी पत्नी की याद हो आई थी। वह भी तो इसी प्लेग में चल बसी थी। फिर अन्दर जाकर चाय ले आया और स्नेहपूरित नयनों से देखते हुए बोला, 'देखो नारद मुनि, जब जो चाहिए मुझे आकर बताना। यदि ऐसा नहीं करोगे तो मैं कभी माफ नहीं करूंगा। यदि किसी दिन भी सुना कि तुम भूखे रहे तो साफ कहता हूं फिर मेरी चौखट पर मत चढ़ना।'

गद्गद् होकर नारद मुनि ने कहा, 'ऐसी बात कभी हो सकती है देवता! आप जैसे दयालु ठाकुर के रहते मैं भूखा रहूंगा?"

"हां, लोहा-लक्कड़, काल - कब्ज़े का सख्त काम करते हो, यह सीधा-सा काम नहीं कर सकोगे? कर सकोगे?

यह कहकर शरत् तम्बाकू पीने लगा। नारद मुनि उस व्यक्ति का असली नाम नहीं था । वह तो एक साधारण मिस्त्री था। कौन-सा नशा उसने नहीं किया था। पाप की परिभाषा में जो काम आ सकते हैं वे भी उसने या उसके दूसरे साथियों ने कम नहीं किए थे। शनिवार को शराब पीकर सोमवार तक धुत पड़े रहने की बात उनके लिए बहुत सहज थी। फिर का बहाना बनाकर वे छुट्टी ले लिया करते थे।

शराब पीकर अति करते उसने न जाने उन्हें कितनी बार देखा, तभी तो 'अधिकार' का स्रष्टा लिख सका था—खाली लकड़ी के फर्श पर बैठे हुए छ:- सात मर्द और आठ-दस औरतें मिलकर शराब पी रहे थे। एक टूटा- सा हारमोनियम और एक बांया तबला बीच में पड़ा था। तरह-तरह की छोटी-बडी रंग-बिरंगी रीती बोतलें चारों तरफ लुढ़क रही थीं। एक बूढ़ी-सी औरत ज्यादा नशा हो जाने के कारण एक तरफ इस तरह पड़ी हुई थी कि उसे नंगी भी कहा जा सकता था। साठ से लेकर पच्चीस वर्ष तक के स्त्री-पुरुष उसमें शामिल थे। आज रविवार था। छुट्टी का दिन ठहरा। प्याज - लहसुन की तरकारी की और साथ-साथ सस्ती जर्मन शराब की, अवर्णनीय दुगना अपूर्व की नाक में जाते ही उसका जी मिचलाने लगा। एक कम उम्र की औरत के हाथ में शराब का गिलास था। शायद वह अब तक पक्की पियक्कड़ नही हो पाई थी। क्योंकि थोड़े ही दिन पहले घर से निकली थी। उसने बायें हाथ से अपनी नाक दबाकर बड़ी मुश्किल से शराब का गिलास अपने मुंह में उड़ेल लिया और तख्तों की संध में से लगी बार-बार धूकने । एक मर्द ने जाकर झटपट उसके मुंह में तरकारी ठूस दी। एक भारतीय स्त्री को अपनी आखों के सामने शराब पीते देख अपूर्व क हक्का-बक्का-सा हो गया। "

लेकिन शरत् हक्का-बक्का नही हुआ। क्योंकि वह जानता था कि ये लोग उससे अलग कहां थे, और इसीलिए मानता था कि भलाई करना अगर संसार में कोई शब्द हो और उसकी अगर कहीं जरूरत हो तो यहीं पर है। जब लोग अति करके अपना जीवन नष्ट करते हैं तो उनसे घृणा नहीं की जा सकती। प्यार से उन्हें समझाया ही जा सक्ता है। एक दिन योगेन्द्र के सामने ऐसा ही एक व्यक्ति बीमार होने की बात कहकर छुट्टी की अर्जी लिखवाने आया। शरत् ने सदा की तरह अर्जी लिख दी और वह चला गया। तब योगेन्द्र ने शरत् से पूछा, 'बीमारी के कुछ लक्षण तो दिखाई नहीं देते।'

शरत् हंस पड़ा बोला, हो तो दिखाई दें। शनिवार की संध्या को सिर पर भूत सवार होता हे। फिर दो-तीन दिन उसी के अधीन रहते हैं। बहुत समझाता हूं धमकी देता हूं कि यदि इस शनिवार को भी भूत चढ़ा तो मैं स्वयं जाकर तुम्हारे साहब को बता दूंगा। तब तुम्हारी नौकरी खत्म हो जाएगी। उस समय ये लोग तरह-तरह की कसम खाते हैं। कहते हैं, 'अब नहीं पिएंगे। कभी पिएं तो मां-बाप के रक्त के समान।' लेकिन मां-बाप का रक्त भी उनकी रक्षा नहीं कर पाता। '

चकित होकर सरकार ने कहा, 'ऐसे लोगों के बीच में आप क्यों रहते हैं?

जैसे किसी ने तीव्र आक्रमण किया हो। शरत् ने आंखें उठाकर सरकार की ओर देखा । वे डबडबा आई थीं। कहा, “बेशक ये लोग अभागे हैं सरकार, लेकिन फिर भी मनुष्य तो हैं। इनका कुछ भला न करके मैं इन्हें दुरदुराऊं तो ये और भी बिगड़ जायेंगे।”

जैसे वह कहीं खो गया हो। कई क्षण इसी तरह आत्मविभोर बैठा रहा, फिर बोला, “मनुष्य से किसी भी अवस्था में घृणा नहीं करनी चाहिए। जो व्यक्ति खराब दिखाई देते हैं। उन्हें सुधारने की चेष्टा करनी चाहिए। यह बहुत बड़ा काम है। भगवान के इस राज्य में मनुष्य जितना शक्तिशाली है उतना दुर्बल भी है। किसी दिन सोमवार के सवेरे यहां आकर देखो तो पाओगे मैं सच कह रहा हूं। सिर का भूत जब उतर जाता है तब संसार का भान होता है। अर्ज़ी न देने पर साहब उन्हें बरखास्त कर देगा। तब क्या होगा? वेतन काटने या जुर्माना होने पर भी इतना नुकसान नहीं होता। यही सोचकर लज्जा से सिर नीचा किए हुए वे बीमारी की अर्ज़ी लिखवाने मेरे पास आते हैं। उस समय मैं उनकी बुरी आदत को भूल जाता हूं और केवल यही सोचता हूं कि हाय, ये अभागे मनुष्य कितने असहाय हैं?”

कहते-कहते शरत् की आंखें फिर सजल हो आईं।

वह क्रोध न करता हो यह बात नहीं, लेकिन घृणा कभी नहीं करता था। क्योंकि वह मानता था कि बुद्धि और हृदय की विशालता के मामले में शराब पीने वाले न पीनेवालों से क्षुद्र हैं, यह किसी भी तरह सत्य नही है । इसीलिए वे लोग उसका सम्मान करते थे और उसे 'बामुन दा' कहकर पुकारते थे। उनके साथ मिलकर उसने एक संकीर्तन दल का गठन भी किया था। यद्यपि उसका मन अभी तक ईश्वर के अस्तित्व को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया था तो भी उनके दुर्गुण छुड़ाने के उद्देश्य से वह खूब कीर्तन करता था और रामकृष्ण मिशन के उत्सव में भाग लेता था।

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि जो स्वयं शराब पीने और नाना प्रकार के दूसरे गुनाह करने के लिए बदनाम हो वह दूसरों के ये ही दुर्गुण छुड़ाने का प्रयत्न करे। अपने मित्रों को समय-समय पर लिखे गए पत्रों में उसने अपने इन दुर्गुणों का रस ले-लेकर बखान किया है। और इसी के आधार पर बहुत से लोगों ने बहुत-सी अविश्वसनीय घटनाओं की सृष्टि कर ली है। लेकिन ये सब अतिरंजित ही नहीं, झूठ भी है। सत्य केवल इतना ही लगता है कि उसके अन्तर में कई शरत् आसन जमाये बैठे थे और इसीलिए वह अपने चारों ओर एक रहस्यमय वातावरण बनाये रखना चाहता था। अपने को छिपाये रखने और उपचेतना में कुंडली मारकर बैठे हुए समाज से बदला लेने की भावना उससे यह सब काम करवाती रहती थी। वह 'कुछ' है, यही वह बताना चाहता था । अन्यथा पीकर माताल होते शायद ही किसी ने उसे देखा हो । पचास वर्ष बाद  उसके एक साथी के छोटे भाई ने कहा था, “उस दिन वे बहुत देर से लौटे। मेस के द्वार बन्द हो चुके थे। बार-बार पुकारने पर भी किसी ने उधर कान नहीं दिये। आखिर मैंने ही द्वार खोला। वे अन्दर आये। शायद बहुत पुकारने से उनका जी खराब हो गया था, उन्हें कै हो गई। उन्होंने पी रखी थी पर वह होश में थे। बड़े प्यार से उन्होंने मुझसे कहा, 'कनिष्ठ, तुम ही बस मुझे प्यार करते हो ।”

पीते और लोग भी थे। वह भी पीता था। लेकिन इसी कारण लक्ष्यभ्रष्ट वह कभी नहीं हुआ। उसका सबसे बड़ा अपराध यही था कि वह तथाकथित छोटे और चरित्रहीन लोगों के बीच में रहता था। यही नहीं, अवसर पाकर वह जावा, सुमात्रा, बोर्नियो आदि तत्काल बदनाम द्वीपों में घूमने निकल जाता और वहां के लोगों के बीच में उनका होकर जीवन को जीता। इस प्रवृत्ति के कारण उसने बहुत कुछ खोया पर बहुत कुछ पाया भी। शरीर एकदम जर्जर हो गया परन्तु अभिज्ञता का कोश बढ़ता ही गया।

और यह अमिज्ञता प्रकट हुई 'श्रीकान्त' में, 'चरित्रहीन' में और उन अनेक कहानियों में, जिन्होंने उस युग के मानव का मन मोह लिया था । और आज भी क्या वह उस मोह से मुक्ति पा सका है।

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रचनाएँ
आवारा मसीहा
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मूल हिंदी में प्रकाशन के समय से 'आवारा मसीहा' तथा उसके लेखक विष्णु प्रभाकर न केवल अनेक पुरस्कारों तथा सम्मानों से विभूषित किए जा चुके हैं, अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद प्रकाशित हो चुका है और हो रहा है। 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' तथा ' पाब्लो नेरुदा सम्मान' के अतिरिक्त बंग साहित्य सम्मेलन तथा कलकत्ता की शरत समिति द्वारा प्रदत्त 'शरत मेडल', उ. प्र. हिंदी संस्थान, महाराष्ट्र तथा हरियाणा की साहित्य अकादमियों और अन्य संस्थाओं द्वारा उन्हें हार्दिक सम्मान प्राप्त हुए हैं। अंग्रेजी, बांग्ला, मलयालम, पंजाबी, सिन्धी , और उर्दू में इसके अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं तथा तेलुगु, गुजराती आदि भाषाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। शरतचंद्र भारत के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे जिनका साहित्य भाषा की सभी सीमाएं लांघकर सच्चे मायनों में अखिल भारतीय हो गया। उन्हें बंगाल में जितनी ख्याति और लोकप्रियता मिली, उतनी ही हिंदी में तथा गुजराती, मलयालम तथा अन्य भाषाओं में भी मिली। उनकी रचनाएं तथा रचनाओं के पात्र देश-भर की जनता के मानो जीवन के अंग बन गए। इन रचनाओं तथा पात्रों की विशिष्टता के कारण लेखक के अपने जीवन में भी पाठक की अपार रुचि उत्पन्न हुई परंतु अब तक कोई भी ऐसी सर्वांगसंपूर्ण कृति नहीं आई थी जो इस विषय पर सही और अधिकृत प्रकाश डाल सके। इस पुस्तक में शरत के जीवन से संबंधित अंतरंग और दुर्लभ चित्रों के सोलह पृष्ठ भी हैं जिनसे इसकी उपयोगिता और भी बढ़ गई है। बांग्ला में यद्यपि शरत के जीवन पर, उसके विभिन्न पक्षों पर बीसियों छोटी-बड़ी कृतियां प्रकाशित हुईं, परंतु ऐसी समग्र रचना कोई भी प्रकाशित नहीं हुई थी। यह गौरव पहली बार हिंदी में लिखी इस कृति को प्राप्त हुआ है।
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भूमिका

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भूमिका : पहले संस्करण की

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कभी सोचा भी न था एक दिन मुझे अपराजेय कथाशिल्पी शरत्चन्द्र की जीवनी लिखनी पड़ेगी। यह मेरा विषय नहीं था। लेकिन अचानक एक ऐसे क्षेत्र से यह प्रस्ताव मेरे पास आया कि स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। हिन्दी

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तीसरे संस्करण की भूमिका

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" प्रथम पर्व : दिशाहारा " अध्याय 1 : विदा का दर्द

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इधर शरत् इन प्रवृत्तियों को लेकर व्यस्त था, उधर पिता की यायावर वृत्ति सीमा का उल्लंघन करती जा रही थी। घर में तीन और बच्चे थे। उनके पेट के लिए अन्न और शरीर के लिए वस्त्र की जरूरत थी, परन्तु इस सबके लि

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अध्याय 14: 'आलो' और ' छाया'

22 अगस्त 2023
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इसी समय निरुपमा की अंतरंग सखी, सुप्रसिद्ध भूदेव मुखर्जी की पोती, अनुपमा के रिश्ते का भाई सौरीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय भागलपुर पढ़ने के लिए आया। वह विभूति का सहपाठी था। दोनों में खूब स्नेह था। अक्सर आना-ज

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अध्याय 15 : प्रेम के अपार भूक

22 अगस्त 2023
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एक समय होता है जब मनुष्य की आशाएं, आकांक्षाएं और अभीप्साएं मूर्त रूप लेना शुरू करती हैं। यदि बाधाएं मार्ग रोकती हैं तो अभिव्यक्ति के लिए वह कोई और मार्ग ढूंढ लेता है। ऐसी ही स्थिति में शरत् का जीवन च

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अध्याय 16: निरूद्देश्य यात्रा

22 अगस्त 2023
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गृहस्थी से शरत् का कभी लगाव नहीं रहा। जब नौकरी करता था तब भी नहीं, अब छोड़ दी तो अब भी नहीं। संसार के इस कुत्सित रूप से मुंह मोड़कर वह काल्पनिक संसार में जीना चाहता था। इस दुर्दान्त निर्धनता में भी उ

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अध्याय 17: जीवनमन्थन से निकला विष

24 अगस्त 2023
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घूमते-घूमते श्रीकान्त की तरह एक दिन उसने पाया कि आम के बाग में धुंआ निकल रहा है, तुरन्त वहां पहुंचा। देखा अच्छा-खासा सन्यासी का आश्रम है। प्रकाण्ड धूनी जल रही हे। लोटे में चाय का पानी चढ़ा हुआ है। एक

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अध्याय 18: बंधुहीन, लक्ष्यहीन प्रवास की ओर

24 अगस्त 2023
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इस जीवन का अन्त न जाने कहा जाकर होता कि अचानक भागलपुर से एक तार आया। लिखा था—तुम्हारे पिता की मुत्यु हो गई है। जल्दी आओ। जिस समय उसने भागलपुर छोड़ा था घर की हालत अच्छी नहीं थी। उसके आने के बाद स्थित

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" द्वितीय पर्व : दिशा की खोज" अध्याय 1: एक और स्वप्रभंग

24 अगस्त 2023
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श्रीकान्त की तरह जिस समय एक लोहे का छोटा-सा ट्रंक और एक पतला-सा बिस्तर लेकर शरत् जहाज़ पर पहुंचा तो पाया कि चारों ओर मनुष्य ही मनुष्य बिखरे पड़े हैं। बड़ी-बड़ी गठरियां लिए स्त्री बच्चों के हाथ पकड़े व

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अध्याय 2: सभ्य समाज से जोड़ने वाला गुण

24 अगस्त 2023
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वहां से हटकर वह कई व्यक्तियों के पास रहा। कई स्थानों पर घूमा। कई प्रकार के अनुभव प्राप्त किये। जैसे एक बार फिर वह दिशाहारा हो उठा हो । आज रंगून में दिखाई देता तो कल पेगू या उत्तरी बर्मा भाग जाता। पौं

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अध्याय 3: खोज और खोज

24 अगस्त 2023
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वह अपने को निरीश्वरवादी कहकर प्रचारित करता था, लेकिन सारे व्यसनों और दुर्गुणों के बावजूद उसका मन वैरागी का मन था। वह बहुत पढ़ता था । समाज विज्ञान, यौन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, दर्शन, कुछ भी तो नहीं छू

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अध्याय 4: वह अल्पकालिक दाम्पत्य जीवन

24 अगस्त 2023
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एक दिन क्या हुआ, सदा की तरह वह रात को देर से लौटा और दरवाज़ा खोलने के लिए धक्का दिया तो पाया कि भीतर से बन्द है । उसे आश्चर्य हुआ, अन्दर कौन हो सकता है । कोई चोर तो नहीं आ गया। उसने फिर ज़ोर से धक्का

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अध्याय 5: चित्रांगन

24 अगस्त 2023
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शरत् ने बहुमुखी प्रतिभा के धनी रवीन्द्रनाथ के समान न केवल साहित्य में बल्कि संगीत और चित्रकला में भी रुचि ली थी । यद्यपि इन क्षेत्रों में उसकी कोई उपलब्धि नहीं है, पर इस बात के प्रमाण अवश्य उपलब्ध है

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अध्याय 6: इतनी सुंदर रचना किसने की ?

24 अगस्त 2023
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रंगून जाने से पहले शरत् अपनी सब रचनाएं अपने मित्रों के पास छोड़ गया था। उनमें उसकी एक लम्बी कहानी 'बड़ी दीदी' थी। वह सुरेन्द्रनाथ के पास थी। जाते समय वह कह गया था, “छपने की आवश्यकता नहीं। लेकिन छापना

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अध्याय 7: प्रेरणा के स्रोत

24 अगस्त 2023
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एक ओर अंतरंग मित्रों के साथ यह साहित्य - चर्चा चलती थी तो दूसरी और सर्वहारा वर्ग के जीवन में गहरे पैठकर वह व्यक्तिगत अभिज्ञता प्राप्त कर रहा था। इन्ही में से उसने अपने अनेक पात्रों को खोजा था। जब वह

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अध्याय 8: मोक्षदा से हिरण्मयी

24 अगस्त 2023
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शांति की मृत्यु के बाद शरत् ने फिर विवाह करने का विचार नहीं किया। आयु काफी हो चुकी थी । यौवन आपदाओं-विपदाओं के चक्रव्यूह में फंसकर प्रायः नष्ट हो गया था। दिन-भर दफ्तर में काम करता था, घर लौटकर चित्र

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अध्याय 9: गृहदाद

24 अगस्त 2023
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'चरित्रहीन' प्रायः समाप्ति पर था। 'नारी का इतिहास प्रबन्ध भी पूरा हो चुका था। पहली बार उसके मन में एक विचार उठा- क्यों न इन्हें प्रकाशित किया जाए। भागलपुर के मित्रों की पुस्तकें भी तो छप रही हैं। उनस

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अध्याय 10: हाँ , अब फिर लिखूंगा

24 अगस्त 2023
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गृहदाह के बाद वह कलकत्ता आया । साथ में पत्नी थी और था उसका प्यारा कुत्ता। अब वह कुत्ता लिए कलकत्ता की सड़कों पर प्रकट रूप में घूमता था । छोटी दाढ़ी, सिर पर अस्त-व्यस्त बाल, मोटी धोती, पैरों में चट्टी

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अध्याय 11: रामेर सुमित शरतेर सुमित

24 अगस्त 2023
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रंगून लौटकर शरत् ने एक कहानी लिखनी शुरू की। लेकिन योगेन्द्रनाथ सरकार को छोड़कर और कोई इस रहस्य को नहीं जान सका । जितनी लिख लेता प्रतिदिन दफ्तर जाकर वह उसे उन्हें सुनाता और वह सब काम छोड़कर उसे सुनते।

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अध्याय 12: सृजन का आवेग

24 अगस्त 2023
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‘रामेर सुमति' के बाद उसने 'पथ निर्देश' लिखना शुरू किया। पहले की तरह प्रतिदिन जितना लिखता जाता उतना ही दफ्तर में जाकर योगेन्द्रनाथ को पढ़ने के लिए दे देता। यह काम प्राय: दा ठाकुर की चाय की दुकान पर हो

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अध्याय 13: चरितहीन क्रिएटिंग अलामिर्ग सेंसेशन

25 अगस्त 2023
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छोटी रचनाओं के साथ-साथ 'चरित्रहीन' का सृजन बराबर चल रहा था और उसके प्रकाशन को 'लेकर काफी हलचल मच गई थी। 'यमुना के संपादक फणीन्द्रनाथ चिन्तित थे कि 'चरित्रहीन' कहीं 'भारतवर्ष' में प्रकाशित न होने लगे।

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अध्याय 14: ' भारतवर्ष' में ' दिराज बहू '

25 अगस्त 2023
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द्विजेन्द्रलाल राय शरत् के बड़े प्रशंसक थे। और वह भी अपनी हर रचना के बारे में उनकी राय को अन्तिम मानता था, लेकिन उन दिनों वे काव्य में व्यभिचार के विरुद्ध आन्दोलन कर रहे थे। इसलिए 'चरित्रहीन' को स्वी

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अध्याय 15 : विजयी राजकुमार

25 अगस्त 2023
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अगले वर्ष जब वह छः महीने की छुट्टी लेकर कलकत्ता आया तो वह आना ऐसा ही था जैसे किसी विजयी राजकुमार का लौटना उसके प्रशंसक और निन्दक दोनों की कोई सीमा नहीं थी। लेकिन इस बार भी वह किसी मित्र के पास नहीं ठ

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अध्याय 16: नये- नये परिचय

25 अगस्त 2023
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' यमुना' कार्यालय में जो साहित्यिक बैठकें हुआ करती थीं, उन्हीं में उसका उस युग के अनेक साहित्यिकों से परिचय हुआ उनमें एक थे हेमेन्द्रकुमार राय वे यमुना के सम्पादक फणीन्द्रनाथ पाल की सहायता करते थे। ए

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अध्याय 17: ' देहाती समाज ' और आवारा श्रीकांत

25 अगस्त 2023
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अचानक तार आ जाने के कारण शरत् को छुट्टी समाप्त होने से पहले ही और अकेले ही रंगून लौट जाना पड़ा। ऐसा लगता है कि आते ही उसने अपनी प्रसिद्ध रचना पल्ली समाज' पर काम करना शरू कर दिया था, लेकिन गृहिणी के न

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अध्याय 18: दिशा की खोज समाप्त

25 अगस्त 2023
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वह अब भी रंगून में नौकरी कर रहा था, लेकिन उसका मन वहां नहीं था । दफ्तर के बंधे-बंधाए नियमो के साथ स्वाधीन मनोवृत्ति का कोई मेल नही बैठता था। कलकत्ता से हरिदास चट्टोपाध्याय उसे बराबर नौकरी छोड़ देने क

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" तृतीय पर्व: दिशान्त " अध्याय 1: ' वह' से ' वे '

25 अगस्त 2023
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जिस समय शरत् ने कलकत्ता छोडकर रंगून की राह ली थी, उस समय वह तिरस्कृत, उपेक्षित और असहाय था। लेकिन अब जब वह तेरह वर्ष बाद कलकत्ता लौटा तो ख्यातनामा कथाशिल्पी के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। वह अब 'वह'

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अध्याय 2: सृजन का स्वर्ण युग

25 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र के जीवन का स्वर्णयुग जैसे अब आ गया था। देखते-देखते उनकी रचनाएं बंगाल पर छा गई। एक के बाद एक श्रीकान्त" ! (प्रथम पर्व), 'देवदास' 2', 'निष्कृति" 3, चरित्रहीन' और 'काशीनाथ' पुस्तक रूप में प्रक

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अध्याय 3: आवारा श्रीकांत का ऐश्वर्य

25 अगस्त 2023
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'चरित्रहीन' के प्रकाशन के अगले वर्ष उनकी तीन और श्रेष्ठ रचनाएं पाठकों के हाथों में थीं-स्वामी(गल्पसंग्रह - एकादश वैरागी सहित) - दत्ता 2 और श्रीकान्त ( द्वितीय पर्वों 31 उनकी रचनाओं ने जनता को ही इस प

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अध्याय 4: देश के मुक्ति का व्रत

25 अगस्त 2023
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जिस समय शरत्चन्द्र लोकप्रियता की चरम सीमा पर थे, उसी समय उनके जीवन में एक और क्रांति का उदय हुआ । समूचा देश एक नयी करवट ले रहा था । राजनीतिक क्षितिज पर तेजी के साथ नयी परिस्थितियां पैदा हो रही थीं। ब

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अध्याय 5: स्वाधीनता का रक्तकमल

26 अगस्त 2023
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चर्खे में उनका विश्वास हो या न हो, प्रारम्भ में असहयोग में उनका पूर्ण विश्वास था । देशबन्धू के निवासस्थान पर एक दिन उन्होंने गांधीजी से कहा था, "महात्माजी, आपने असहयोग रूपी एक अभेद्य अस्त्र का आविष्क

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अध्याय 6: निष्कम्प दीपशिखा

26 अगस्त 2023
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उस दिन जलधर दादा मिलने आए थे। देखा शरत्चन्द्र मनोयोगपूर्वक कुछ लिख रहे हैं। मुख पर प्रसन्नता है, आखें दीप्त हैं, कलम तीव्र गति से चल रही है। पास ही रखी हुई गुड़गुड़ी की ओर उनका ध्यान नहीं है। चिलम की

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अध्याय 7: समाने समाने होय प्रणयेर विनिमय

26 अगस्त 2023
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शरत्चन्द्र इस समय आकण्ठ राजनीति में डूबे हुए थे। साहित्य और परिवार की ओर उनका ध्यान नहीं था। उनकी पत्नी और उनके सभी मित्र इस बात से बहुत दुखी थे। क्या हुआ उस शरतचन्द्र का जो साहित्य का साधक था, जो अड

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अध्याय 8: राजनीतिज्ञ अभिज्ञता का साहित्य

26 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र कभी नियमित होकर नहीं लिख सके। उनसे लिखाया जाता था। पत्र- पत्रिकाओं के सम्पादक घर पर आकर बार-बार धरना देते थे। बार-बार आग्रह करने के लिए आते थे। भारतवर्ष' के सम्पादक रायबहादुर जलधर सेन आते,

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अध्याय 9: लिखने का दर्द

26 अगस्त 2023
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अपनी रचनाओं के कारण शरत् बाबू विद्यार्थियों में विशेष रूप से लोकप्रिय थे। लेकिन विश्वविद्यालय और कालेजों से उनका संबंध अभी भी घनिष्ठ नहीं हुआ था। उस दिन अचानक प्रेजिडेन्सी कालेज की बंगला साहित्य सभा

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अध्याय 10: समिष्ट के बीच

26 अगस्त 2023
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किसी पत्रिका का सम्पादन करने की चाह किसी न किसी रूप में उनके अन्तर में बराबर बनी रही। बचपन में भी यह खेल वे खेल चुके थे, परन्तु इस क्षेत्र में यमुना से अधिक सफलता उन्हें कभी नहीं मिली। अपने मित्र निर

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अध्याय 11: आवारा जीवन की ललक

26 अगस्त 2023
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राजनीतिक क्षेत्र में इस समय अपेक्षाकृत शान्ति थी । सविनय अवज्ञा आन्दोलन जैसा उत्साह अब शेष नहीं रहा था। लेकिन गांव का संगठन करने और चन्दा इकट्ठा करने में अभी भी वे रुचि ले रहे थे। देशबन्धु का यश ओर प

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अध्याय 12: ' हमने ही तोह उन्हें समाप्त कर दिया '

26 अगस्त 2023
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देशबन्धु की मृत्यु के बाद शरत् बाबू का मन राजनीति में उतना नहीं रह गया था। काम वे बराबर करते रहे, पर मन उनका बार-बार साहित्य के क्षेत्र में लौटने को आतुर हो उठता था। यद्यपि वहां भी लिखने की गति पहले

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अध्याय 13: पथेर दाबी

26 अगस्त 2023
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जिस समय वे 'पथेर दाबी ' लिख रहे थे, उसी समय उनका मकान बनकर तैयार हो गया था । वे वहीं जाकर रहने लगे थे। वहां जाने से पहले लगभग एक वर्ष तक वे शिवपुर टाम डिपो के पास कालीकुमार मुकर्जी लेने में भी रहे थे

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अध्याय 14: रूप नारायण का विस्तार

26 अगस्त 2023
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गांव में आकर उनका जीवन बिलकुल ही बदल गया। इस बदले हुए जीवन की चर्चा उन्होंने अपने बहुत-से पत्रों में की है, “रूपनारायण के तट पर घर बनाया है, आरामकुर्सी पर पड़ा रहता हूं।" एक और पत्र में उन्होंने लिख

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अध्याय 15: देहाती शरत

26 अगस्त 2023
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गांव में रहने पर भी शहर छूट नहीं गया था। अक्सर आना-जाना होता रहता था। स्वास्थ्य बहुत अच्छा न होने के कारण कभी-कभी तो बहुत दिनों तक वहीं रहना पड़ता था । इसीलिए बड़ी बहू बार-बार शहर में मकान बना लेने क

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अध्याय 16: दायोनिसस शिवानी से वैष्णवी कमललता तक

26 अगस्त 2023
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किशोरावस्था में शरत् बात् ने अनेक नाटकों में अभिनय करके प्रशंसा पाई थी। उस समय जनता को नाटक देखने का बहुत शौक था, लेकिन भले घरों के लड़के मंच पर आयें, यह कोई स्वीकार करना नहीं चाहता था। शरत बाबू थे ज

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अध्याय 17: तुम में नाटक लिखने की शक्ति है

26 अगस्त 2023
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शरत साहित्य की रीढ़, नारी के प्रति उनका दृष्टिकोण है। बार-बार अपने इसी दृष्टिकोण को उन्होंने स्पष्ट किया है। प्रसिद्धि के साथ-साथ उन्हें अनेक सभाओं में जाना पडता था और वहां प्रायः यही प्रश्न उनके साम

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अध्याय 18: नारी चरित्र के परम रहस्यज्ञाता

26 अगस्त 2023
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केवल नारी और विद्यार्थी ही नहीं दूसरे बुद्धिजीवी भी समय-समय पर उनको अपने बीच पाने को आतुर रहते थे। बड़े उत्साह से वे उनका स्वागत सम्मान करते, उन्हें नाना सम्मेलनों का सभापतित्व करने को आग्रहपूर्वक आ

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अध्याय 19: मैं मनुष्य को बहुत बड़ा करके मानता हूँ

26 अगस्त 2023
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चन्दन नगर की गोष्ठी में उन्होंने कहा था, “राजनीति में भाग लिया था, किन्तु अब उससे छुट्टी ले ली है। उस भीड़भाड़ में कुछ न हो सका। बहुत-सा समय भी नष्ट हुआ । इतना समय नष्ट न करने से भी तो चल सकता था । ज

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अध्याय 20: देश के तरुणों से में कहता हूँ

26 अगस्त 2023
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साधारणतया साहित्यकार में कोई न कोई ऐसी विशेषता होती है, जो उसे जनसाधारण से अलग करती है। उसे सनक भी कहा जा सकता है। पशु-पक्षियों के प्रति शरबाबू का प्रेम इसी सनक तक पहुंच गया था। कई वर्ष पूर्व काशी में

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अध्याय 21:  ऋषिकल्प

26 अगस्त 2023
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जब कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर सत्तर वर्ष के हुए तो देश भर में उनकी जन्म जयन्ती मनाई गई। उस दिन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट, कलकत्ता में जो उद्बोधन सभा हुई उसके सभापति थे महामहोपाध्याय श्री हरिप्रसाद शास्त

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अध्याय 22: गुरु और शिष्य

27 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र 60 वर्ष के भी नहीं हुए थे, लेकिन स्वास्थ्य उनका बहुत खराब हो चुका था। हर पत्र में वे इसी बात की शिकायत करते दिखाई देते हैं, “म सरें दर्द रहता है। खून का दबाव ठीक नहीं है। लिखना पढ़ना बहुत क

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अध्याय 23: कैशोर्य का वह असफल प्रेम

27 अगस्त 2023
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शरत् बाबू की रचनाओं के आधार पर लिखे गये दो नाटक इसी युग में प्रकाशित हुए । 'विराजबहू' उपन्यास का नाट्य रूपान्तर इसी नाम से प्रकाशित हुआ। लेकिन दत्ता' का नाट्य रूपान्तर प्रकाशित हुआ 'विजया' के नाम से

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अध्याय 24: श्री अरविन्द का आशीर्वाद

27 अगस्त 2023
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गांव में रहते हुए शरत् बाबू को काफी वर्ष बीत गये थे। उस जीवन का अपना आनन्द था। लेकिन असुविधाएं भी कम नहीं थीं। बार-बार फौजदारी और दीवानी मुकदमों में उलझना पड़ता था। गांव वालों की समस्याएं सुलझाते-सुल

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अध्याय 25: तुब बिहंग ओरे बिहंग भोंर

27 अगस्त 2023
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राजनीति के क्षेत्र में भी अब उनका कोई सक्रिय योग नहीं रह गया था, लेकिन साम्प्रदायिक प्रश्न को लेकर उन्हें कई बार स्पष्ट रूप से अपने विचार प्रकट करने का अवसर मिला। उन्होंने बार-बार नेताओं की आलोचना की

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अध्याय 26: अल्हाह.,अल्हाह.

27 अगस्त 2023
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सर दर्द बहुत परेशान कर रहा था । परीक्षा करने पर डाक्टरों ने बताया कि ‘न्यूरालाजिक' दर्द है । इसके लिए 'अल्ट्रावायलेट रश्मियां दी गई, लेकिन सब व्यर्थ । सोचा, सम्भवत: चश्मे के कारण यह पीड़ा है, परन्तु

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अध्याय 27: मरीज की हवा दो बदल

27 अगस्त 2023
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हिरण्मयी देवी लोगों की दृष्टि में शरत्चन्द्र की पत्नी थीं या मात्र जीवनसंगिनी, इस प्रश्न का उत्तर होने पर भी किसी ने उसे स्वीकार करना नहीं चाहा। लेकिन इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि उनके प्रति शरत् बा

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अध्याय 28: साजन के घर जाना होगा

27 अगस्त 2023
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कलकत्ता पहुंचकर भी भुलाने के इन कामों में व्यतिक्रम नहीं हुआ। बचपन जैसे फिर जाग आया था। याद आ रही थी तितलियों की, बाग-बगीचों की और फूलों की । नेवले, कोयल और भेलू की। भेलू का प्रसंग चलने पर उन्होंने म

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अध्याय 29: बेशुमार यादें

27 अगस्त 2023
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इसी बीच में एक दिन शिल्पी मुकुल दे डाक्टर माके को ले आये। उन्होंने परीक्षा करके कहा, "घर में चिकित्सा नहीं ही सकती । अवस्था निराशाजनक है। किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। इन्हें तुरन्त नर्सिंग होम ले

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