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अध्याय 5: चित्रांगन

24 अगस्त 2023

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शरत् ने बहुमुखी प्रतिभा के धनी रवीन्द्रनाथ के समान न केवल साहित्य में बल्कि संगीत और चित्रकला में भी रुचि ली थी । यद्यपि इन क्षेत्रों में उसकी कोई उपलब्धि नहीं है, पर इस बात के प्रमाण अवश्य उपलब्ध है कि कई वर्ष तक उसने चित्रकला की साधना की और बहुत-से चित्र बनाये थे।

तीन वर्ष बाद अपने घर में आग लग जाने की सूचना देते हुए, उसने एक पत्र में अपने प्रिय मित्र प्रमथनाथ भट्ट को लिखा था -- “एक और समाचार तुम्हें देना बाकी है। लगभग तीन वर्ष पहले हृदय रोग के लक्षण प्रकट हुए थे, तब मैंने तैलचित्रांकन शुरू किया था। पढ़ना छोड़ दिया था। इन तीन वर्षों में बहुत-से चित्र इकट्ठे हो गए थे। वे भी खत्म हो गये हैं। अंकन का केवल सामान भर रह गया है। मुझे क्या करना उचित है, यदि यह बता दो तो तुम्हारे कहने के मुताबिक चेष्टा कर देखूंगा। नावेल, हिस्ट्री या पेंटिंग कौन-सा शुरू करूं?"

लेकिन ऐसा लगता है कि इस अग्निदाह के बाद चित्रकला में उसकी रुचि फिर नहीं जागी। केवल महाश्वेता के अधूरे चित्र को, जो किसी तरह अग्निदाह से बच गया था, वह पूरा कर सका 2 पर इन दिनों उसने अनेक चित्र बनाये थे। उसके मित्र और सहकर्मी योगेन्द्रनाथ सरकार ने लिखा है, "एक दिन रविवार को जाकर देखा कि एक कपड़े के आवरण के नीचे स्टैण्ड पर एक चित्र टंगा है। पूछा, "यह क्या है शरत् दा?"

""हंसकर शरत् ने उत्तर दिया, 'अच्छा पहले तुम्हीं बताओ तो यह क्या है?"

" और क्या होगा, तस्वीर । '

“यह क्या बात हुई, तस्वीर छोड़कर वहां और क्या हो सकता है? तुम्हारी कल्पनाशक्ति की बात तो तब है जब बता सको कि यह तस्वीर किसकी है?"

“यदि मैं कहूं कि नारदमुनि की है तो?"

“वही तो है देख!'

“यह कहते-कहते शरत् ने चित्र पर से पर्दा हटा दिया। मैं तो अवाक् रह गया सचमुच यह उस बूढ़े का चित्र था। गांव के तालाब के पास अस्त-व्यस्त वृक्षसमूह, उसके बीच में टेढ़ा मेढ़ा रास्ता और उस रास्ते के पास वृक्ष की छाया में बैठा हुआ एक वृद्ध, बिलकुल नारदमुनि जैसा। वार्धक्य और दारिद्रय के ऊपर निराशा की गहरी छाया किस प्रकार छायी हुई थी, यह तो देखने पर ही जाना जा सकता था ।.......'

सरकार उस चित्र को देख ही रहे थे कि वह बूढ़ा आ पहुंचा। सीढ़ी पर पैर रखते ही उसने पुकारा, "देवता घर में हैं क्या?”

शरत तुरन्त नीचे गया। बड़े आदर और प्रेम के साथ उस वृद्ध को सहारा देकर ऊपर ले आया। और वह तस्वीर उसके सामने लाकर रख दी। देखते ही उस वृद्ध के कोटर में धंसे हुए नेत्र ज्योति में भर उठे। बोला, “देवता! आपके दिमाग में इतना कुछ है!"

शरत् ने कहा, “देखो नारद! तुम्हें एक काम करना होगा। बहुत कठिन नहीं है। रोज सवेरे मेरे घर आकर बैठना होगा। चाय आदि लेते हुए मुझे यह चित्र बनाते हुए देखना होगा।”

चाय की बात सुनका वृद्ध नारद के मुंह में पानी भर आया। शरत् तुरन्त अन्दर से एक प्याला चाय ले आया। मधुर स्वर में बोला, “बड़ा कष्ट होता है तुम्हें । लो चाय पियो ।” वृद्ध ने झिझकते हुए पूछा, “आप पी चुके देवता?”

शरत् ने उत्तर दिया, “अजी देवता किसका इंतजार करते हैं। तुम जल्दी से पियो, नहीं तो ठण्डी हो जाएगी।

सरकार ने पूछा, “यह शिक्षा तुमने किससे ग्रहण की?”

अपने कपाल की ओर इशारा करते हुए शरत् ने कहा, “इस विद्या का गुरु मैं स्वयं हूं।” चित्रकला का अध्ययन उसने स्वयं किया था । प्रकृति चित्रण से बढ़कर उसे मानव आकृति के चित्रण से प्रेम था। उसका कहना था कि शरीर विज्ञान का पूरा-पूरा ज्ञान प्राप्त किए बिना मनुष्य की आकृति का अंकन नहीं हो सकता। जब तक कोई आकृति हूबहू जीवन्त न बने तब तक उसे छवि कैसे कहा जा सकेगा। चिथड़े के ऊपर रंग से कुछ आकृति बना देने से तो छवि नहीं बन जाती। वह चित्रकार विन्सेण्ट वान गाग की बात दोहरा रहा था। उसने कहा था, “यदि किसी को चित्र बनाना सीखना है तो उसे मनुष्य के शरीर का पूरा ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। यदि वह नहीं जानता तो वह केवल नकलची बनकर रह जाएगा।” एक दिन उसने सरकार से पूछा, “अच्छा बताओ संसार में सबसे बड़ा चित्रकार कौन है?"

सरकार ने उत्तर दिया, 'रैफेल!"

“न-न”, शरत् से कहा, 'रैफेल से तो माइकेल एंजिलो बड़ा है और बड़े-बड़े आलोचक तिसियन को सबसे बड़ा चित्रकार मानते हैं।”

तिसियन के संबंध में स्वयं शरत् की भी बड़ी ऊंची धारणा थी। वे इतलावी चित्रकला को सबसे श्रेष्ठ मानते थे। उसके बाद आती थी फ्लेमीश, डच और बरतानवी चित्रकला । उसका एक मित्र था चित्रकार बाथिन। 'छवि' कहानी में शरत्चन्द्र ने बाथिन को अमर कर दिया है। उसी से शायद उसने कला की प्रेरणा ली थी। साधारणतया बंगाली अपने में ही सीमित रहते हैं। लेकिन शरत् अपवाद था। कार्यालय के अतिरिक्त भी उसका अबंगालियों से मेलजोल था। उन्हीं में चित्रकार बाथिन था । एक दिन सतीशचन्द्रदास को साथ लेकर वह उससे मिलने भी गया था। दास ने लिखा है, “संध्या घिर आई थी। सर्वहारा भारतीयों की 'काला - बस्ती' में न तो प्रकाश का अच्छा बन्दोबस्त था, न कोई अच्छी सड़क ही थी।

मदिर में आरती की शंखध्वनि भी नहीं सुनाई दे रही थी। मैंने कहा, 'शरत् दा, कहां ले जा रहे हो? क्या आखिर गुण्डों-बदमाशों के हाथ जान देनी होगी ?"

“शरत् दा बोले, नहीं, नहीं, मेरे साथ चले आओ। गुण्डे-बदमाशों का यहां कोई काम नहीं । '

“तुम कुछ भी कहो दादा ! ऐसी खराब जगह नहीं जाना चाहिए। हम गांव के आदमी हैं, लेकिन यह तो उससे भी बदतर है। वर्षा ऋतु में तो यहां चलना भी कठिन होता होगा । एक-एक ईंट टुकड़े-टुकड़े होकर बस मिट्टी के साथ अटकी हुई है।'

“शरत् दा ने अब कोई जवाब नहीं दिया। मैं विवश होकर उनके पीछे चलता रहा। लेकिन बस्ती के कुत्तों की बात मन में आते ही छाती धक-धक कर उठती । बर्मियों के भी दो-चार काठ के घर थे। मिट्टी के तेल के दीवों के प्रकाश में देखा जा सकता था कि उनके घर के आगे लेटे हुए कुत्ते नवागंतुकों को देखकर उन पर झपटने के लिए अपने मालिक के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वहां के कुत्ते इतने शैतान थे कि किसी प्रकार का शोर किए बिना पीछे से आकर मुंह मार देते। मुझे इसका अनुभव था। मैंने कहा, 'शरत् दा इस बस्ती कुत्ते बड़े शैतान ---

“बात पूरी होने से पहले ही शरत् दा बोल उठे, 'डरो नहीं, मेरे साथ चले आओ। पशु हैं इससे क्या! वे भी आदमी को पहचानते हैं।'

कुछ दूर जाकर शरत् दा, एक काठ के घर के सामने खड़े हो गये । उनको देखकर एक अल्पायु की बर्मी स्त्री ने अपनी भाषा में उन्हें पुकारा । उन्होंने भी उसी भाषा में उत्तर दिया और फिर वे लोग भीतर चले गये। वहां एक लड़की बैठी हुई थी। स्त्री ने उससे कुछ कहा और वह तुरन्त बाहर चली गई। कुर्सी पर बैठकर शरत् दा उस स्त्री से परम आत्मीयता से बातें करने लगे। कुछ ही देर बाद उस लड़की के साथ बाधिन बाहर से लौट आये। शायद बहुत दिनों के बाद भेंट हुई थी, इसलिए वे बहुत देर तक एक-दूसरे के प्रति शिकवा - शिकायत करते रहे। इसके बाद सत्कार आरम्भ हुआ। मेज़ पर नाना प्रकार के खाद्य पदार्थ सजाए जाने लगे। शरत् दा ने मुझसे चुपचाप पूछा, 'खाओगे?'

"मैं वह सब देखकर ही अवाक् रह गया था। क्या कहता ? जिनको खाने-पीने का कोई विचार नहीं, उनके साथ खाकर क्या जात देनी होगी?

"और मैंने अपनी जात बचाकर हिन्दुस्तानी रीति से चाय और बिस्कूट ही लिए । किन्तु शरत् दा अपने मित्र के परिवार के साथ एक ही मेज़ पर खाते रहे और हास्य विनोद करते रहे। बहुत रात हो जाने पर मैंने कहा, चलो न, बहुत देर हो जाएगी।'

'शरत् दा उठ खड़े हुए। बर्मी मित्र गली के मोड़ तक रोशनी लेकर उनके साथ आए । उसके लौटने के बाद मैंने पूछा, यह कौन है? कैसे इसके साथ दोस्ती हुई? लगता है एक ही दफ्तर में काम करते हैं?"

"शरत् दा ने कहा, 'नहीं, यह व्यक्ति कुशल चित्रकार है। घर में जितने चित्र तुमने देखे, वे सब इसी के बनाए हुए हैं। पेगू में इसके साथ परिचय हुआ था।'

"मै बोला, मित्र की दृष्टि से भेंट करने आए, यह तो अच्छा है, लेकिन दादा, इनके साथ खाया कैसे?"

"शरत् दा हंस पड़े बोले, पागल और किसे कहते हैं? यह भी तो हिन्दू जाति की शाखा है। ये लोग अत्यन्त धर्मभीरु हैं। संकोच इनमें उतना नहीं हैं दो-एक दिन का परिचय होते ही ये व्यक्ति को अपना बना लेते हैं। हिंसा, घृणा और संकोच इनके धर्म के विरुद्ध है।"

वैसे शरत् को यह गुण पैतृकदाय के रूप में भी प्राप्त हुआ था। मोतीलाल अच्छे चित्रकार हो सकते थे, लेकिन वह कोई भी काम जमकर नहीं कर सके । शरत् में उनके सारे स्वप्न मानो साकार होने की चेष्टा कर रहे थे। बाधिन की मित्रता से इस चेष्टा को बल मिला और उसने कई चित्र बनाये। उनमें सबसे सुन्दर चित्र था भहाश्वेता' का । उसे देखकर मित्रों ने कहा, "आप इसे प्रदर्शनी में क्यों नहीं भेजते?"

ख्याति और प्रदर्शन से सदा दूर भागने वाला शरत् मित्रों के अनुरोध को कैसे स्वीकार कर सकता था। लेकिन पारखियों की दृष्टि में वह चित्र सचमुच सुन्दर था। योगेन्द्रनाथ सरकार ने लिखा है, "आलोक और छाया का इस प्रकार सम्मिश्रण हुआ था कि उसे देखकर यह कहना असम्भव था कि यह किसी अनगढ़ चित्रकार का बनाया हुआ है। शरीर विज्ञान, पृष्ठभूमि और पर्सपेक्टिव की दृष्टि से उसमें कोई कमी नहीं थी....... पुरुष और प्रकृति की कला के मिलन के समान तपस्विनी महाश्वेता की आकृति बहुत ही सुन्दर उतरी थी। वर्षा के दिन नदी के तीर पर सब कुछ कुहरे में आच्छादित और अस्पष्ट । उस पार सघन मेघों से घिरा हुआ आकाश और भी अस्पष्ट, इधर एक ओर से लजीला सूर्य मानो ताक - झांक कर रहा हो। किनारे पर वृक्ष के नीचे मुक्तकेशा, सद्यः स्नाता तपस्विनी महाश्वेता, रुदन करती हुई प्रकृति की एक जीवंत प्रतिमा थी।"

छोटे-से घर के एक कोने में, जिसमें आलोक भी कम था, उस छवि को इस प्रकार रखा हुआ था कि किवाड़ खोलने पर जितना प्रकाश उस घर में आए उसी की सहायता से उस छवि को अच्छी तरह समझा जा सके। शरत् ने उसी अवस्था में सरकार महोदय को वह चित्र दिखाया। उन्होंने लिखा है सभी उन्नत कलाओं में उसी चिर सुन्दर आनन्दघन रसमूर्ति के ही विकास-साधन की चेष्टा है। वास्तव में कुछ उदार दृष्टि से देखने पर एकदम कुत्सित वस्तु भी सुन्दर जान पड़ती है। वह चित्र नग्न सौंदर्य का चित्र नहीं था। नग्न होने पर भी उसे कुत्सित नहीं कहा जा सकता था। क्योंकि उसके साथ पृष्ठभूमि में प्रकृति का दृश्य अत्यन्त चमत्कारपूर्ण था ।" वह चित्र उसे भी प्रिय था। मामा गिरीन्द्रनाथ को उसने लिखा था , "अभी पूरा नहीं हुआ। कहोगे तो कर दूंगा। मर तो घर-द्वार है नहीं, तुम्हारे है। मुझे यह (चित्र) बहुत प्रिय है इसलिए, जिससे नष्ट न हो, तुम्हारे पास रखना चाहता हूं।"

लेकिन इस साधना के बावजूद शरत् का चित्रकला का ज्ञान नितान्त एकांगी था । उसके बनाए हुए चित्र उच्च श्रेणी के नहीं थे। फिर भी चिनगारी उसके अन्तर में थी अवश्य । जब वह विख्यात लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था तब कलकत्ता आर्ट कालेज के अध्यापक सतीशचन्द्र सिंह के घर उनका चित्रांकन देखते-देखते उसने 'मां और बेटे' का पेंसिल स्केच बनाया था और उनके बेटे को 'हर - पार्वती' का चित्र बनाते देखकर स्वयं भी 'हर-गौरी' का स्केच बना दिया था। वह चित्र आज भी कहीं सुरक्षित है।

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रचनाएँ
आवारा मसीहा
5.0
मूल हिंदी में प्रकाशन के समय से 'आवारा मसीहा' तथा उसके लेखक विष्णु प्रभाकर न केवल अनेक पुरस्कारों तथा सम्मानों से विभूषित किए जा चुके हैं, अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद प्रकाशित हो चुका है और हो रहा है। 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' तथा ' पाब्लो नेरुदा सम्मान' के अतिरिक्त बंग साहित्य सम्मेलन तथा कलकत्ता की शरत समिति द्वारा प्रदत्त 'शरत मेडल', उ. प्र. हिंदी संस्थान, महाराष्ट्र तथा हरियाणा की साहित्य अकादमियों और अन्य संस्थाओं द्वारा उन्हें हार्दिक सम्मान प्राप्त हुए हैं। अंग्रेजी, बांग्ला, मलयालम, पंजाबी, सिन्धी , और उर्दू में इसके अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं तथा तेलुगु, गुजराती आदि भाषाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। शरतचंद्र भारत के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे जिनका साहित्य भाषा की सभी सीमाएं लांघकर सच्चे मायनों में अखिल भारतीय हो गया। उन्हें बंगाल में जितनी ख्याति और लोकप्रियता मिली, उतनी ही हिंदी में तथा गुजराती, मलयालम तथा अन्य भाषाओं में भी मिली। उनकी रचनाएं तथा रचनाओं के पात्र देश-भर की जनता के मानो जीवन के अंग बन गए। इन रचनाओं तथा पात्रों की विशिष्टता के कारण लेखक के अपने जीवन में भी पाठक की अपार रुचि उत्पन्न हुई परंतु अब तक कोई भी ऐसी सर्वांगसंपूर्ण कृति नहीं आई थी जो इस विषय पर सही और अधिकृत प्रकाश डाल सके। इस पुस्तक में शरत के जीवन से संबंधित अंतरंग और दुर्लभ चित्रों के सोलह पृष्ठ भी हैं जिनसे इसकी उपयोगिता और भी बढ़ गई है। बांग्ला में यद्यपि शरत के जीवन पर, उसके विभिन्न पक्षों पर बीसियों छोटी-बड़ी कृतियां प्रकाशित हुईं, परंतु ऐसी समग्र रचना कोई भी प्रकाशित नहीं हुई थी। यह गौरव पहली बार हिंदी में लिखी इस कृति को प्राप्त हुआ है।
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भूमिका

21 अगस्त 2023
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संस्करण सन् 1999 की ‘आवारा मसीहा’ का प्रथम संस्करण मार्च 1974 में प्रकाशित हुआ था । पच्चीस वर्ष बीत गए हैं इस बात को । इन वर्षों में इसके अनेक संस्करण हो चुके हैं। जब पहला संस्करण हुआ तो मैं मन ही म

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भूमिका : पहले संस्करण की

21 अगस्त 2023
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कभी सोचा भी न था एक दिन मुझे अपराजेय कथाशिल्पी शरत्चन्द्र की जीवनी लिखनी पड़ेगी। यह मेरा विषय नहीं था। लेकिन अचानक एक ऐसे क्षेत्र से यह प्रस्ताव मेरे पास आया कि स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। हिन्दी

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तीसरे संस्करण की भूमिका

21 अगस्त 2023
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लगभग साढ़े तीन वर्ष में 'आवारा मसीहा' के दो संस्करण समाप्त हो गए - यह तथ्य शरद बाबू के प्रति हिन्दी भाषाभाषी जनता की आस्था का ही परिचायक है, विशेष रूप से इसलिए कि आज के महंगाई के युग में पैंतालीस या,

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" प्रथम पर्व : दिशाहारा " अध्याय 1 : विदा का दर्द

21 अगस्त 2023
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किसी कारण स्कूल की आधी छुट्टी हो गई थी। घर लौटकर गांगुलियो के नवासे शरत् ने अपने मामा सुरेन्द्र से कहा, "चलो पुराने बाग में घूम आएं। " उस समय खूब गर्मी पड़ रही थी, फूल-फल का कहीं पता नहीं था। लेकिन घ

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अध्याय 2: भागलपुर में कठोर अनुशासन

21 अगस्त 2023
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भागलपुर आने पर शरत् को दुर्गाचरण एम० ई० स्कूल की छात्रवृत्ति क्लास में भर्ती कर दिया गया। नाना स्कूल के मंत्री थे, इसलिए बालक की शिक्षा-दीक्षा कहां तक हुई है, इसकी किसी ने खोज-खबर नहीं ली। अब तक उसने

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अध्याय 3: राजू उर्फ इन्दरनाथ से परिचय

21 अगस्त 2023
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नाना के इस परिवार में शरत् के लिए अधिक दिन रहना सम्भव नहीं हो सका। उसके पिता न केवल स्वप्नदर्शी थे, बल्कि उनमें कई और दोष थे। वे हुक्का पीते थे, और बड़े होकर बच्चों के साथ बराबरी का व्यवहार करते थे।

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अध्याय 4: वंश का गौरव

22 अगस्त 2023
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मोतीलाल चट्टोपाध्याय चौबीस परगना जिले में कांचड़ापाड़ा के पास मामूदपुर के रहनेवाले थे। उनके पिता बैकुंठनाथ चट्टोपाध्याय सम्भ्रान्त राढ़ी ब्राह्मण परिवार के एक स्वाधीनचेता और निर्भीक व्यक्ति थे। और वह

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अध्याय 5: होनहार बिरवान .......

22 अगस्त 2023
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शरत् जब पांच वर्ष का हुआ तो उसे बाकायदा प्यारी (बन्दोपाध्याय) पण्डित की पाठशाला में भर्ती कर दिया गया, लेकिन वह शब्दश: शरारती था। प्रतिदिन कोई न कोई काण्ड करके ही लौटता। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया उस

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अध्याय 6: रोबिनहुड

22 अगस्त 2023
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तीन वर्ष नाना के घर में भागलपुर रहने के बाद अब उसे फिर देवानन्दपुर लौटना पड़ा। बार-बार स्थान-परिवर्तन के कारण पढ़ने-लिखने में बड़ा व्याघात होता था। आवारगी भी बढ़ती थी, लेकिन अनुभव भी कम नहीं होते थे।

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अध्याय 7: अच्छे विद्यार्थी से कथा - विद्या - विशारद तक

22 अगस्त 2023
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शरत् जब भागलपुर लौटा तो उसके पुराने संगी-साथी प्रवेशिका परीक्षा पास कर चुके थे। 2 और उसके लिए स्कूल में प्रवेश पाना भी कठिन था। देवानन्दपुर के स्कूल से ट्रांसफर सर्टिफिकेट लाने के लिए उसके पास पैसे न

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अध्याय 8: एक प्रेमप्लावित आत्मा

22 अगस्त 2023
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इन दुस्साहसिक कार्यों और साहित्य-सृजन के बीच प्रवेशिका परीक्षा का परिणाम - कभी का निकल चुका था और सब बाधाओं के बावजूद वह द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया था। अब उसे कालेज में प्रवेश करना था। परन्तु

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अध्याय 9: वह युग

22 अगस्त 2023
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जिस समय शरत्चन्द का जन्म हुआ क वह चहुंमुखी जागृति और प्रगति का का था। सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम की असफलता और सरकार के तीव्र दमन के कारण कुछ दिन शिथिलता अवश्य दिखाई दी थी, परन्तु वह तूफान से पूर्व

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अध्याय 10: नाना परिवार का विद्रोह

22 अगस्त 2023
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शरत जब दूसरी बार भागलपुर लौटा तो यह दलबन्दी चरम सीमा पर थी। कट्टरपन्थी लोगों के विरोध में जो दल सामने आया उसके नेता थे राजा शिवचन्द्र बन्दोपाध्याय बहादुर । दरिद्र घर में जन्म लेकर भी उन्होंने तीक्ष्ण

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अध्याय 11: ' शरत को घर में मत आने दो'

22 अगस्त 2023
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उस वर्ष वह परीक्षा में भी नहीं बैठ सका था। जो विद्यार्थी टेस्ट परीक्षा में उत्तीर्ण होते थे उन्हीं को अनुमति दी जाती थी। इसी परीक्षा के अवसर पर एक अप्रीतिकर घटना घट गई। जैसाकि उसके साथ सदा होता था, इ

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अध्याय 12: राजू उर्फ इन्द्रनाथ की याद

22 अगस्त 2023
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इसी समय सहसा एक दिन - पता लगा कि राजू कहीं चला गया है। फिर वह कभी नहीं लौटा। बहुत वर्ष बाद श्रीकान्त के रचियता ने लिखा, “जानता नहीं कि वह आज जीवित है या नहीं। क्योंकि वर्षों पहले एक दिन वह बड़े सुबह

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अध्याय 13: सृजिन का युग

22 अगस्त 2023
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इधर शरत् इन प्रवृत्तियों को लेकर व्यस्त था, उधर पिता की यायावर वृत्ति सीमा का उल्लंघन करती जा रही थी। घर में तीन और बच्चे थे। उनके पेट के लिए अन्न और शरीर के लिए वस्त्र की जरूरत थी, परन्तु इस सबके लि

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अध्याय 14: 'आलो' और ' छाया'

22 अगस्त 2023
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इसी समय निरुपमा की अंतरंग सखी, सुप्रसिद्ध भूदेव मुखर्जी की पोती, अनुपमा के रिश्ते का भाई सौरीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय भागलपुर पढ़ने के लिए आया। वह विभूति का सहपाठी था। दोनों में खूब स्नेह था। अक्सर आना-ज

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अध्याय 15 : प्रेम के अपार भूक

22 अगस्त 2023
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एक समय होता है जब मनुष्य की आशाएं, आकांक्षाएं और अभीप्साएं मूर्त रूप लेना शुरू करती हैं। यदि बाधाएं मार्ग रोकती हैं तो अभिव्यक्ति के लिए वह कोई और मार्ग ढूंढ लेता है। ऐसी ही स्थिति में शरत् का जीवन च

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अध्याय 16: निरूद्देश्य यात्रा

22 अगस्त 2023
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गृहस्थी से शरत् का कभी लगाव नहीं रहा। जब नौकरी करता था तब भी नहीं, अब छोड़ दी तो अब भी नहीं। संसार के इस कुत्सित रूप से मुंह मोड़कर वह काल्पनिक संसार में जीना चाहता था। इस दुर्दान्त निर्धनता में भी उ

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अध्याय 17: जीवनमन्थन से निकला विष

24 अगस्त 2023
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घूमते-घूमते श्रीकान्त की तरह एक दिन उसने पाया कि आम के बाग में धुंआ निकल रहा है, तुरन्त वहां पहुंचा। देखा अच्छा-खासा सन्यासी का आश्रम है। प्रकाण्ड धूनी जल रही हे। लोटे में चाय का पानी चढ़ा हुआ है। एक

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अध्याय 18: बंधुहीन, लक्ष्यहीन प्रवास की ओर

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इस जीवन का अन्त न जाने कहा जाकर होता कि अचानक भागलपुर से एक तार आया। लिखा था—तुम्हारे पिता की मुत्यु हो गई है। जल्दी आओ। जिस समय उसने भागलपुर छोड़ा था घर की हालत अच्छी नहीं थी। उसके आने के बाद स्थित

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" द्वितीय पर्व : दिशा की खोज" अध्याय 1: एक और स्वप्रभंग

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श्रीकान्त की तरह जिस समय एक लोहे का छोटा-सा ट्रंक और एक पतला-सा बिस्तर लेकर शरत् जहाज़ पर पहुंचा तो पाया कि चारों ओर मनुष्य ही मनुष्य बिखरे पड़े हैं। बड़ी-बड़ी गठरियां लिए स्त्री बच्चों के हाथ पकड़े व

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अध्याय 2: सभ्य समाज से जोड़ने वाला गुण

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वहां से हटकर वह कई व्यक्तियों के पास रहा। कई स्थानों पर घूमा। कई प्रकार के अनुभव प्राप्त किये। जैसे एक बार फिर वह दिशाहारा हो उठा हो । आज रंगून में दिखाई देता तो कल पेगू या उत्तरी बर्मा भाग जाता। पौं

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अध्याय 3: खोज और खोज

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वह अपने को निरीश्वरवादी कहकर प्रचारित करता था, लेकिन सारे व्यसनों और दुर्गुणों के बावजूद उसका मन वैरागी का मन था। वह बहुत पढ़ता था । समाज विज्ञान, यौन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, दर्शन, कुछ भी तो नहीं छू

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अध्याय 4: वह अल्पकालिक दाम्पत्य जीवन

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एक दिन क्या हुआ, सदा की तरह वह रात को देर से लौटा और दरवाज़ा खोलने के लिए धक्का दिया तो पाया कि भीतर से बन्द है । उसे आश्चर्य हुआ, अन्दर कौन हो सकता है । कोई चोर तो नहीं आ गया। उसने फिर ज़ोर से धक्का

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अध्याय 5: चित्रांगन

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शरत् ने बहुमुखी प्रतिभा के धनी रवीन्द्रनाथ के समान न केवल साहित्य में बल्कि संगीत और चित्रकला में भी रुचि ली थी । यद्यपि इन क्षेत्रों में उसकी कोई उपलब्धि नहीं है, पर इस बात के प्रमाण अवश्य उपलब्ध है

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अध्याय 6: इतनी सुंदर रचना किसने की ?

24 अगस्त 2023
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रंगून जाने से पहले शरत् अपनी सब रचनाएं अपने मित्रों के पास छोड़ गया था। उनमें उसकी एक लम्बी कहानी 'बड़ी दीदी' थी। वह सुरेन्द्रनाथ के पास थी। जाते समय वह कह गया था, “छपने की आवश्यकता नहीं। लेकिन छापना

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अध्याय 7: प्रेरणा के स्रोत

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एक ओर अंतरंग मित्रों के साथ यह साहित्य - चर्चा चलती थी तो दूसरी और सर्वहारा वर्ग के जीवन में गहरे पैठकर वह व्यक्तिगत अभिज्ञता प्राप्त कर रहा था। इन्ही में से उसने अपने अनेक पात्रों को खोजा था। जब वह

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अध्याय 8: मोक्षदा से हिरण्मयी

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शांति की मृत्यु के बाद शरत् ने फिर विवाह करने का विचार नहीं किया। आयु काफी हो चुकी थी । यौवन आपदाओं-विपदाओं के चक्रव्यूह में फंसकर प्रायः नष्ट हो गया था। दिन-भर दफ्तर में काम करता था, घर लौटकर चित्र

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अध्याय 9: गृहदाद

24 अगस्त 2023
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'चरित्रहीन' प्रायः समाप्ति पर था। 'नारी का इतिहास प्रबन्ध भी पूरा हो चुका था। पहली बार उसके मन में एक विचार उठा- क्यों न इन्हें प्रकाशित किया जाए। भागलपुर के मित्रों की पुस्तकें भी तो छप रही हैं। उनस

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अध्याय 10: हाँ , अब फिर लिखूंगा

24 अगस्त 2023
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गृहदाह के बाद वह कलकत्ता आया । साथ में पत्नी थी और था उसका प्यारा कुत्ता। अब वह कुत्ता लिए कलकत्ता की सड़कों पर प्रकट रूप में घूमता था । छोटी दाढ़ी, सिर पर अस्त-व्यस्त बाल, मोटी धोती, पैरों में चट्टी

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अध्याय 11: रामेर सुमित शरतेर सुमित

24 अगस्त 2023
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रंगून लौटकर शरत् ने एक कहानी लिखनी शुरू की। लेकिन योगेन्द्रनाथ सरकार को छोड़कर और कोई इस रहस्य को नहीं जान सका । जितनी लिख लेता प्रतिदिन दफ्तर जाकर वह उसे उन्हें सुनाता और वह सब काम छोड़कर उसे सुनते।

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अध्याय 12: सृजन का आवेग

24 अगस्त 2023
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‘रामेर सुमति' के बाद उसने 'पथ निर्देश' लिखना शुरू किया। पहले की तरह प्रतिदिन जितना लिखता जाता उतना ही दफ्तर में जाकर योगेन्द्रनाथ को पढ़ने के लिए दे देता। यह काम प्राय: दा ठाकुर की चाय की दुकान पर हो

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अध्याय 13: चरितहीन क्रिएटिंग अलामिर्ग सेंसेशन

25 अगस्त 2023
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छोटी रचनाओं के साथ-साथ 'चरित्रहीन' का सृजन बराबर चल रहा था और उसके प्रकाशन को 'लेकर काफी हलचल मच गई थी। 'यमुना के संपादक फणीन्द्रनाथ चिन्तित थे कि 'चरित्रहीन' कहीं 'भारतवर्ष' में प्रकाशित न होने लगे।

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अध्याय 14: ' भारतवर्ष' में ' दिराज बहू '

25 अगस्त 2023
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द्विजेन्द्रलाल राय शरत् के बड़े प्रशंसक थे। और वह भी अपनी हर रचना के बारे में उनकी राय को अन्तिम मानता था, लेकिन उन दिनों वे काव्य में व्यभिचार के विरुद्ध आन्दोलन कर रहे थे। इसलिए 'चरित्रहीन' को स्वी

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अध्याय 15 : विजयी राजकुमार

25 अगस्त 2023
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अगले वर्ष जब वह छः महीने की छुट्टी लेकर कलकत्ता आया तो वह आना ऐसा ही था जैसे किसी विजयी राजकुमार का लौटना उसके प्रशंसक और निन्दक दोनों की कोई सीमा नहीं थी। लेकिन इस बार भी वह किसी मित्र के पास नहीं ठ

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अध्याय 16: नये- नये परिचय

25 अगस्त 2023
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' यमुना' कार्यालय में जो साहित्यिक बैठकें हुआ करती थीं, उन्हीं में उसका उस युग के अनेक साहित्यिकों से परिचय हुआ उनमें एक थे हेमेन्द्रकुमार राय वे यमुना के सम्पादक फणीन्द्रनाथ पाल की सहायता करते थे। ए

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अध्याय 17: ' देहाती समाज ' और आवारा श्रीकांत

25 अगस्त 2023
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अचानक तार आ जाने के कारण शरत् को छुट्टी समाप्त होने से पहले ही और अकेले ही रंगून लौट जाना पड़ा। ऐसा लगता है कि आते ही उसने अपनी प्रसिद्ध रचना पल्ली समाज' पर काम करना शरू कर दिया था, लेकिन गृहिणी के न

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अध्याय 18: दिशा की खोज समाप्त

25 अगस्त 2023
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वह अब भी रंगून में नौकरी कर रहा था, लेकिन उसका मन वहां नहीं था । दफ्तर के बंधे-बंधाए नियमो के साथ स्वाधीन मनोवृत्ति का कोई मेल नही बैठता था। कलकत्ता से हरिदास चट्टोपाध्याय उसे बराबर नौकरी छोड़ देने क

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" तृतीय पर्व: दिशान्त " अध्याय 1: ' वह' से ' वे '

25 अगस्त 2023
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जिस समय शरत् ने कलकत्ता छोडकर रंगून की राह ली थी, उस समय वह तिरस्कृत, उपेक्षित और असहाय था। लेकिन अब जब वह तेरह वर्ष बाद कलकत्ता लौटा तो ख्यातनामा कथाशिल्पी के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। वह अब 'वह'

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अध्याय 2: सृजन का स्वर्ण युग

25 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र के जीवन का स्वर्णयुग जैसे अब आ गया था। देखते-देखते उनकी रचनाएं बंगाल पर छा गई। एक के बाद एक श्रीकान्त" ! (प्रथम पर्व), 'देवदास' 2', 'निष्कृति" 3, चरित्रहीन' और 'काशीनाथ' पुस्तक रूप में प्रक

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अध्याय 3: आवारा श्रीकांत का ऐश्वर्य

25 अगस्त 2023
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'चरित्रहीन' के प्रकाशन के अगले वर्ष उनकी तीन और श्रेष्ठ रचनाएं पाठकों के हाथों में थीं-स्वामी(गल्पसंग्रह - एकादश वैरागी सहित) - दत्ता 2 और श्रीकान्त ( द्वितीय पर्वों 31 उनकी रचनाओं ने जनता को ही इस प

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अध्याय 4: देश के मुक्ति का व्रत

25 अगस्त 2023
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जिस समय शरत्चन्द्र लोकप्रियता की चरम सीमा पर थे, उसी समय उनके जीवन में एक और क्रांति का उदय हुआ । समूचा देश एक नयी करवट ले रहा था । राजनीतिक क्षितिज पर तेजी के साथ नयी परिस्थितियां पैदा हो रही थीं। ब

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अध्याय 5: स्वाधीनता का रक्तकमल

26 अगस्त 2023
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चर्खे में उनका विश्वास हो या न हो, प्रारम्भ में असहयोग में उनका पूर्ण विश्वास था । देशबन्धू के निवासस्थान पर एक दिन उन्होंने गांधीजी से कहा था, "महात्माजी, आपने असहयोग रूपी एक अभेद्य अस्त्र का आविष्क

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अध्याय 6: निष्कम्प दीपशिखा

26 अगस्त 2023
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उस दिन जलधर दादा मिलने आए थे। देखा शरत्चन्द्र मनोयोगपूर्वक कुछ लिख रहे हैं। मुख पर प्रसन्नता है, आखें दीप्त हैं, कलम तीव्र गति से चल रही है। पास ही रखी हुई गुड़गुड़ी की ओर उनका ध्यान नहीं है। चिलम की

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अध्याय 7: समाने समाने होय प्रणयेर विनिमय

26 अगस्त 2023
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शरत्चन्द्र इस समय आकण्ठ राजनीति में डूबे हुए थे। साहित्य और परिवार की ओर उनका ध्यान नहीं था। उनकी पत्नी और उनके सभी मित्र इस बात से बहुत दुखी थे। क्या हुआ उस शरतचन्द्र का जो साहित्य का साधक था, जो अड

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अध्याय 8: राजनीतिज्ञ अभिज्ञता का साहित्य

26 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र कभी नियमित होकर नहीं लिख सके। उनसे लिखाया जाता था। पत्र- पत्रिकाओं के सम्पादक घर पर आकर बार-बार धरना देते थे। बार-बार आग्रह करने के लिए आते थे। भारतवर्ष' के सम्पादक रायबहादुर जलधर सेन आते,

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अध्याय 9: लिखने का दर्द

26 अगस्त 2023
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अपनी रचनाओं के कारण शरत् बाबू विद्यार्थियों में विशेष रूप से लोकप्रिय थे। लेकिन विश्वविद्यालय और कालेजों से उनका संबंध अभी भी घनिष्ठ नहीं हुआ था। उस दिन अचानक प्रेजिडेन्सी कालेज की बंगला साहित्य सभा

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अध्याय 10: समिष्ट के बीच

26 अगस्त 2023
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किसी पत्रिका का सम्पादन करने की चाह किसी न किसी रूप में उनके अन्तर में बराबर बनी रही। बचपन में भी यह खेल वे खेल चुके थे, परन्तु इस क्षेत्र में यमुना से अधिक सफलता उन्हें कभी नहीं मिली। अपने मित्र निर

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अध्याय 11: आवारा जीवन की ललक

26 अगस्त 2023
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राजनीतिक क्षेत्र में इस समय अपेक्षाकृत शान्ति थी । सविनय अवज्ञा आन्दोलन जैसा उत्साह अब शेष नहीं रहा था। लेकिन गांव का संगठन करने और चन्दा इकट्ठा करने में अभी भी वे रुचि ले रहे थे। देशबन्धु का यश ओर प

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अध्याय 12: ' हमने ही तोह उन्हें समाप्त कर दिया '

26 अगस्त 2023
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देशबन्धु की मृत्यु के बाद शरत् बाबू का मन राजनीति में उतना नहीं रह गया था। काम वे बराबर करते रहे, पर मन उनका बार-बार साहित्य के क्षेत्र में लौटने को आतुर हो उठता था। यद्यपि वहां भी लिखने की गति पहले

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अध्याय 13: पथेर दाबी

26 अगस्त 2023
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जिस समय वे 'पथेर दाबी ' लिख रहे थे, उसी समय उनका मकान बनकर तैयार हो गया था । वे वहीं जाकर रहने लगे थे। वहां जाने से पहले लगभग एक वर्ष तक वे शिवपुर टाम डिपो के पास कालीकुमार मुकर्जी लेने में भी रहे थे

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अध्याय 14: रूप नारायण का विस्तार

26 अगस्त 2023
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गांव में आकर उनका जीवन बिलकुल ही बदल गया। इस बदले हुए जीवन की चर्चा उन्होंने अपने बहुत-से पत्रों में की है, “रूपनारायण के तट पर घर बनाया है, आरामकुर्सी पर पड़ा रहता हूं।" एक और पत्र में उन्होंने लिख

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अध्याय 15: देहाती शरत

26 अगस्त 2023
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गांव में रहने पर भी शहर छूट नहीं गया था। अक्सर आना-जाना होता रहता था। स्वास्थ्य बहुत अच्छा न होने के कारण कभी-कभी तो बहुत दिनों तक वहीं रहना पड़ता था । इसीलिए बड़ी बहू बार-बार शहर में मकान बना लेने क

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अध्याय 16: दायोनिसस शिवानी से वैष्णवी कमललता तक

26 अगस्त 2023
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किशोरावस्था में शरत् बात् ने अनेक नाटकों में अभिनय करके प्रशंसा पाई थी। उस समय जनता को नाटक देखने का बहुत शौक था, लेकिन भले घरों के लड़के मंच पर आयें, यह कोई स्वीकार करना नहीं चाहता था। शरत बाबू थे ज

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अध्याय 17: तुम में नाटक लिखने की शक्ति है

26 अगस्त 2023
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शरत साहित्य की रीढ़, नारी के प्रति उनका दृष्टिकोण है। बार-बार अपने इसी दृष्टिकोण को उन्होंने स्पष्ट किया है। प्रसिद्धि के साथ-साथ उन्हें अनेक सभाओं में जाना पडता था और वहां प्रायः यही प्रश्न उनके साम

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अध्याय 18: नारी चरित्र के परम रहस्यज्ञाता

26 अगस्त 2023
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केवल नारी और विद्यार्थी ही नहीं दूसरे बुद्धिजीवी भी समय-समय पर उनको अपने बीच पाने को आतुर रहते थे। बड़े उत्साह से वे उनका स्वागत सम्मान करते, उन्हें नाना सम्मेलनों का सभापतित्व करने को आग्रहपूर्वक आ

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अध्याय 19: मैं मनुष्य को बहुत बड़ा करके मानता हूँ

26 अगस्त 2023
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चन्दन नगर की गोष्ठी में उन्होंने कहा था, “राजनीति में भाग लिया था, किन्तु अब उससे छुट्टी ले ली है। उस भीड़भाड़ में कुछ न हो सका। बहुत-सा समय भी नष्ट हुआ । इतना समय नष्ट न करने से भी तो चल सकता था । ज

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अध्याय 20: देश के तरुणों से में कहता हूँ

26 अगस्त 2023
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साधारणतया साहित्यकार में कोई न कोई ऐसी विशेषता होती है, जो उसे जनसाधारण से अलग करती है। उसे सनक भी कहा जा सकता है। पशु-पक्षियों के प्रति शरबाबू का प्रेम इसी सनक तक पहुंच गया था। कई वर्ष पूर्व काशी में

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अध्याय 21:  ऋषिकल्प

26 अगस्त 2023
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जब कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर सत्तर वर्ष के हुए तो देश भर में उनकी जन्म जयन्ती मनाई गई। उस दिन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट, कलकत्ता में जो उद्बोधन सभा हुई उसके सभापति थे महामहोपाध्याय श्री हरिप्रसाद शास्त

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अध्याय 22: गुरु और शिष्य

27 अगस्त 2023
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शरतचन्द्र 60 वर्ष के भी नहीं हुए थे, लेकिन स्वास्थ्य उनका बहुत खराब हो चुका था। हर पत्र में वे इसी बात की शिकायत करते दिखाई देते हैं, “म सरें दर्द रहता है। खून का दबाव ठीक नहीं है। लिखना पढ़ना बहुत क

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अध्याय 23: कैशोर्य का वह असफल प्रेम

27 अगस्त 2023
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शरत् बाबू की रचनाओं के आधार पर लिखे गये दो नाटक इसी युग में प्रकाशित हुए । 'विराजबहू' उपन्यास का नाट्य रूपान्तर इसी नाम से प्रकाशित हुआ। लेकिन दत्ता' का नाट्य रूपान्तर प्रकाशित हुआ 'विजया' के नाम से

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अध्याय 24: श्री अरविन्द का आशीर्वाद

27 अगस्त 2023
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गांव में रहते हुए शरत् बाबू को काफी वर्ष बीत गये थे। उस जीवन का अपना आनन्द था। लेकिन असुविधाएं भी कम नहीं थीं। बार-बार फौजदारी और दीवानी मुकदमों में उलझना पड़ता था। गांव वालों की समस्याएं सुलझाते-सुल

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अध्याय 25: तुब बिहंग ओरे बिहंग भोंर

27 अगस्त 2023
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राजनीति के क्षेत्र में भी अब उनका कोई सक्रिय योग नहीं रह गया था, लेकिन साम्प्रदायिक प्रश्न को लेकर उन्हें कई बार स्पष्ट रूप से अपने विचार प्रकट करने का अवसर मिला। उन्होंने बार-बार नेताओं की आलोचना की

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अध्याय 26: अल्हाह.,अल्हाह.

27 अगस्त 2023
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सर दर्द बहुत परेशान कर रहा था । परीक्षा करने पर डाक्टरों ने बताया कि ‘न्यूरालाजिक' दर्द है । इसके लिए 'अल्ट्रावायलेट रश्मियां दी गई, लेकिन सब व्यर्थ । सोचा, सम्भवत: चश्मे के कारण यह पीड़ा है, परन्तु

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अध्याय 27: मरीज की हवा दो बदल

27 अगस्त 2023
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हिरण्मयी देवी लोगों की दृष्टि में शरत्चन्द्र की पत्नी थीं या मात्र जीवनसंगिनी, इस प्रश्न का उत्तर होने पर भी किसी ने उसे स्वीकार करना नहीं चाहा। लेकिन इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि उनके प्रति शरत् बा

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अध्याय 28: साजन के घर जाना होगा

27 अगस्त 2023
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कलकत्ता पहुंचकर भी भुलाने के इन कामों में व्यतिक्रम नहीं हुआ। बचपन जैसे फिर जाग आया था। याद आ रही थी तितलियों की, बाग-बगीचों की और फूलों की । नेवले, कोयल और भेलू की। भेलू का प्रसंग चलने पर उन्होंने म

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अध्याय 29: बेशुमार यादें

27 अगस्त 2023
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इसी बीच में एक दिन शिल्पी मुकुल दे डाक्टर माके को ले आये। उन्होंने परीक्षा करके कहा, "घर में चिकित्सा नहीं ही सकती । अवस्था निराशाजनक है। किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। इन्हें तुरन्त नर्सिंग होम ले

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